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अफसरों के गोद लिए गांव.....
Updated Mon, 18 Jun 2018 11:09 PM IST
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दुबिहां (गाजीपुर)। अपर मुख्य जिला पंचायत अधिकारी की ओर से गोद लिए बाराचंवर ब्लाक के खड़हरा गांव की बदहाली भी देखने लायक है। गांव में सरकारी योजनाएं अब तक दस्तक नहीं दे पाई हैं, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क जैसी कई मूलभूत सुविधाओं पर कोई कार्य नहीं हुआ है। खास बात यह है कि पूर्व में इस गांव का चयन लोहिया गांव के रूप में भी हो चुका है, लेकिन फिर भी विकास का दीप इस गांव में नहीं जला। आलम यह है कि पात्र गांव में पेंशन और राशन के लिए भटक रहे हैं। यहां घर-घर शौचालय और आवास की बात भी बेमानी साबित हो रही है।
खड़हरा गांव की आबादी करीब दो हजार है तथा इसे दो पुरवों बांट दिया गया है। लोहिया गांव के बाद इस अतिपिछड़े गांव को दोबारा तब खुशी मिली जब इसे अपर मुख्य जिला पंचायत अधिकारी ने गोद लिया। लेकिन यह खुशी अधिक दिनों तक नहीं रही। क्योंकि गोद लिए गांव में विकास का कार्य महज कागजी ही रहा। इसके पहले भी विकास के लिए गांव का चयन लोहिया ग्राम के रूप में किया गया था, लेकिन यहां कोई विकास नहीं हुआ। गांव में लोगों को समय पर इलाज के लिए एक अस्पताल तक नहीं है। यहां के लोगों को छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी कहीं अन्यत्र स्वास्थ्य केंद्र पर जाना पड़ता है।
गांव में आंगनबाड़ी केंद्र भी नहीं है। ऐसा न होने से महिलाओं और बच्चों के पोषण की योजनाएं धरी की धरी रह जाती है। बच्चों में कुपोषण बढ़ रहा है। गांव में सड़क तो बनी है, लेकिन वह भी जर्जर होती जा रही है। साफ-सफाई की बेहतर व्यवस्था न होने के चलते गर्मी में ही नालियों से बदबू आता है। जबकि अभी पूरी बरसात बाकी है। लोगों में संक्रमण का खतरा बना हुआ है। गांव में पेयजल का भी संकट बरकरार है। आबादी के हिसाब से सरकारी हैंडपंपों की संख्या बहुत कम है। ग्रामीणों को कतार लगा कर पानी लेना पड़ता है। सही क्रियान्वयन के अभाव में पेंशन, राशन कार्ड, शौचालय, आवास आदि योजनाएं अभी तक पूरी नहीं हुई। कई पात्र राशन कार्ड और पेंशन की सुविधा से वंचित हैं।
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खड़हरा के ग्राम प्रधान रामलाल कश्यप ने बताया कि अति पिछड़े गांव को विकास की मुख्य धारा में लाने के लिए अभी विकास का बहुत काम बाकी है। गोद लेने के बाद अपर मुख्य जिला पंचायत अधिकारी इस गांव में व्यवस्थाओं का हाल जानने के लिए अब तक आए ही नहीं। बताया कि हमें जरा भी सहयोग मिल जाए तो विकास का काम जोर-शोर से कराया जाएगा। आलमगीर ने बताया की पीने की पानी की समस्या इस कदर है कि लोगों को घरों से दूर जाकर पीने का पानी लाना पड़ता है। पानी के लिए लगे हैंडपंप पर्याप्त नहीं है। कई हैंडपंप खराब हो चुके हैं। गलियों का निर्माण न होने तथा जल निकासी की समुचित व्यवस्था न होने के चलते नालियां जाम रहती हैं तथा बदबू आती रहती है। नंदलाल बिंद ने बताया की जब गांव में कोई बीमार पड़ जाता है, तो उसे इलाज के लिए दूर के अस्पताल ले जाना पड़ता है। साधन के अभाव में कई मरीजों को तड़पना पड़ता है। सबसे दयनीय हालत गर्भवती महिलाओँ की हो जाती है। आजादी के इतने साल बाद भी हमारे लिए बेहतरीन स्वास्थ्य की सेवा सेवा दुष्कर हो गया है। गांव के प्रभु बिंद ने बताया कि सबसे दया यहां के युवकों को देख कर आती है। रोजगार के अभाव में वह इधर-ऊधर भटक रहे हैं। मनरेगा योजना भी यहां ठीक से नहीं लागू है, जिसके चलते आमदनी का पूरा रास्ता ही बंद है। रोजगार पाने के इच्छुक इन युवकों को देख कर काफी मायूसी होती है।
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खड़हरा गांव की आबादी करीब दो हजार है तथा इसे दो पुरवों बांट दिया गया है। लोहिया गांव के बाद इस अतिपिछड़े गांव को दोबारा तब खुशी मिली जब इसे अपर मुख्य जिला पंचायत अधिकारी ने गोद लिया। लेकिन यह खुशी अधिक दिनों तक नहीं रही। क्योंकि गोद लिए गांव में विकास का कार्य महज कागजी ही रहा। इसके पहले भी विकास के लिए गांव का चयन लोहिया ग्राम के रूप में किया गया था, लेकिन यहां कोई विकास नहीं हुआ। गांव में लोगों को समय पर इलाज के लिए एक अस्पताल तक नहीं है। यहां के लोगों को छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी कहीं अन्यत्र स्वास्थ्य केंद्र पर जाना पड़ता है।
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गांव में आंगनबाड़ी केंद्र भी नहीं है। ऐसा न होने से महिलाओं और बच्चों के पोषण की योजनाएं धरी की धरी रह जाती है। बच्चों में कुपोषण बढ़ रहा है। गांव में सड़क तो बनी है, लेकिन वह भी जर्जर होती जा रही है। साफ-सफाई की बेहतर व्यवस्था न होने के चलते गर्मी में ही नालियों से बदबू आता है। जबकि अभी पूरी बरसात बाकी है। लोगों में संक्रमण का खतरा बना हुआ है। गांव में पेयजल का भी संकट बरकरार है। आबादी के हिसाब से सरकारी हैंडपंपों की संख्या बहुत कम है। ग्रामीणों को कतार लगा कर पानी लेना पड़ता है। सही क्रियान्वयन के अभाव में पेंशन, राशन कार्ड, शौचालय, आवास आदि योजनाएं अभी तक पूरी नहीं हुई। कई पात्र राशन कार्ड और पेंशन की सुविधा से वंचित हैं।
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खड़हरा के ग्राम प्रधान रामलाल कश्यप ने बताया कि अति पिछड़े गांव को विकास की मुख्य धारा में लाने के लिए अभी विकास का बहुत काम बाकी है। गोद लेने के बाद अपर मुख्य जिला पंचायत अधिकारी इस गांव में व्यवस्थाओं का हाल जानने के लिए अब तक आए ही नहीं। बताया कि हमें जरा भी सहयोग मिल जाए तो विकास का काम जोर-शोर से कराया जाएगा। आलमगीर ने बताया की पीने की पानी की समस्या इस कदर है कि लोगों को घरों से दूर जाकर पीने का पानी लाना पड़ता है। पानी के लिए लगे हैंडपंप पर्याप्त नहीं है। कई हैंडपंप खराब हो चुके हैं। गलियों का निर्माण न होने तथा जल निकासी की समुचित व्यवस्था न होने के चलते नालियां जाम रहती हैं तथा बदबू आती रहती है। नंदलाल बिंद ने बताया की जब गांव में कोई बीमार पड़ जाता है, तो उसे इलाज के लिए दूर के अस्पताल ले जाना पड़ता है। साधन के अभाव में कई मरीजों को तड़पना पड़ता है। सबसे दयनीय हालत गर्भवती महिलाओँ की हो जाती है। आजादी के इतने साल बाद भी हमारे लिए बेहतरीन स्वास्थ्य की सेवा सेवा दुष्कर हो गया है। गांव के प्रभु बिंद ने बताया कि सबसे दया यहां के युवकों को देख कर आती है। रोजगार के अभाव में वह इधर-ऊधर भटक रहे हैं। मनरेगा योजना भी यहां ठीक से नहीं लागू है, जिसके चलते आमदनी का पूरा रास्ता ही बंद है। रोजगार पाने के इच्छुक इन युवकों को देख कर काफी मायूसी होती है।