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आक्रोश’ युवा पीढ़ी की भीषण यातनाओं की महागाथा
Updated Fri, 24 Nov 2017 11:46 PM IST
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गाजीपुर। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित डा. केदारनाथ सिंह ने कहा कि रामावतार का उपन्यास ‘आक्रोश’ युवा पीढ़ी की भीषण यातनाओं की महागाथा है। इस कृति में समाधान नहीं दिया है, यह बहुत अच्छी बात है। कथाकार को समाधान देना भी नहीं चाहिए। यह काम पाठकों पर छोड़ देना चाहिए। वह ‘समकालीन सोच’ परिवार की ओर से गुरुवार की शाम गौतमबुद्ध कालोनी में आयोजित पुस्तक ‘आक्रोश’ के विमोचन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि इसमें युवा पीढ़ी की यातनाओं, समस्याओं और संवेदनाओं का जीवंत चित्रांकन और रेखांकन है। रामावतार का पिछला उपन्यास भी मुझे बहुत अच्छा लगा था। अध्यक्षता कर रहे समाजवादी चिंतक डा. पीएन सिंह ने कहा कि मेरे कहने पर रामावतार ने यह उपन्यास दो प्लाटों का लिखा है। इनसे हिंदी जगत को बहुत अपेक्षाएं हैं। कमला शंकर यादव ने कहा कि यह उपन्यास भाषा की दृष्टि से जैनेंद्र और सच्चाइयों की संवेदनात्मक दृष्टि से भीष्म साहनी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘तमस’ की याद दिलाता है। डा. एसबी सिंह ने कहा कि अपनी मनोवैज्ञानिक दृष्टि, युवा पीढ़ी के प्रति गहन संवेदना और चुस्त संवाद के कारण यह उपन्यास आदि से अंत तक पाठकों को बांधे रहता है। कथाकार रामावतार ने उपन्यास की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर धर्मनारायण मिश्र, डा. बद्री सिंह, अमितेश सिंह, संजय कुमार, डा. हारून रशीद खां, अनिल कुमार शर्मा, गंगाधर सिंह, रामनगीना कुशवाहा, प्रमोद कुमार राय आदि उपस्थित थे। संचालन कवि डा. गजाधर शर्मा गंगेश ने किया।
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उन्होंने कहा कि इसमें युवा पीढ़ी की यातनाओं, समस्याओं और संवेदनाओं का जीवंत चित्रांकन और रेखांकन है। रामावतार का पिछला उपन्यास भी मुझे बहुत अच्छा लगा था। अध्यक्षता कर रहे समाजवादी चिंतक डा. पीएन सिंह ने कहा कि मेरे कहने पर रामावतार ने यह उपन्यास दो प्लाटों का लिखा है। इनसे हिंदी जगत को बहुत अपेक्षाएं हैं। कमला शंकर यादव ने कहा कि यह उपन्यास भाषा की दृष्टि से जैनेंद्र और सच्चाइयों की संवेदनात्मक दृष्टि से भीष्म साहनी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘तमस’ की याद दिलाता है। डा. एसबी सिंह ने कहा कि अपनी मनोवैज्ञानिक दृष्टि, युवा पीढ़ी के प्रति गहन संवेदना और चुस्त संवाद के कारण यह उपन्यास आदि से अंत तक पाठकों को बांधे रहता है। कथाकार रामावतार ने उपन्यास की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर धर्मनारायण मिश्र, डा. बद्री सिंह, अमितेश सिंह, संजय कुमार, डा. हारून रशीद खां, अनिल कुमार शर्मा, गंगाधर सिंह, रामनगीना कुशवाहा, प्रमोद कुमार राय आदि उपस्थित थे। संचालन कवि डा. गजाधर शर्मा गंगेश ने किया।
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