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जल संकट: जिले में आदर्श जलाशय योजना की निकली हवा
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गाजीपुर। जल संचयन के उद्देश्य से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना और आदर्श जलाशय योजना के तहत खोदे गए तालाब-पोखरे सूखे पड़े हैं। हालात यह है कि पशु-पक्षियों के सामने भी पेयजल का संकट गहराने वाला है। गर्मी की शुरूआत में ही जलस्तर तेजी से नीचे खिसकने लगा है। मार्च में यह हाल है तो मई -जून में क्या होगा। यह सोच लोग परेशान हैं। जिला प्रशासन इन दिनों चुनाव में व्यस्त है और वह केवल कागजी घोड़े दौड़ा रहा है। तालाबों की खुदाई और सुंदरीकरण पर पिछले कुछ सालों में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए, लेकिन तालाब मौजूदा समय में स्वयं प्यासे हैं। विभिन्न विकास खंडों में 744 आदर्श तालाबों की दशा मौजूदा समय में अत्यंत दयनीय है। न तो तालाबों में पानी है और न ही अन्य कोई सुविधा।
जनपद के विभिन्न गांवों में वर्ष 09-10 में आदर्श तालाब योजना चलाई गई थी। योजना के तहत आदर्श तालाब के चारों तरफ बैरीकेडिंग कर सुंदरीकरण के नाम पर पेड़-पैधे भी लगाए गए थे। योजना का लाभ ग्रामीणों को देने के लिए जनपद की 1233 ग्राम पंचायतों के सापेक्ष 744 ग्राम पंचायतों में आदर्श तालाब निर्माण के लिए चयन किया गया था। इनके निर्माण के लिए 21 करोड़ से अधिक की धनराशि शासन द्वारा संबंधित विभाग को उपलब्ध भी कराई गई थी। विभाग की माने तो जनपद में कुल तलाबों की संख्या वर्तमान में 2544 है। जिसमें से करीब 1800 तालाबों को मत्स्य विभाग की ओर से पट्टे पर दे दिया गया है। जबकि करीब 744 तालाब निष्प्रयोज्य बने हुए हैं। पानी की समस्या को देखते हुए सरकार की ओर से हर ग्राम पंचायतों में आदर्श जलाशय योजना चलाई गई थी।
इन तालाबों पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन रख-रखाव के अभाव में तलाब गर्मी शुरू होते ही सूख जाते हैं। जल संरक्षण न होने से इनका उपयोग तक नहीं होता। खुदाई के नाम पर भी खानापूर्ति की जाती है। आधे से अधिक तालाबों का मत्स्य पालन विभाग को पट्टा दिया जाता है। इन तालाबों की दशा भी बहुत बेहतर नहीं है। तालाबों के लिए सरकार विभिन्न योजनाएं चला रही है। लेकिन सब कागजों में है। वर्तमान में जिले के 40 फीसदी जलाशय निष्प्रयोज्य बने हुए हैं। आलम यह है कि कई तालाबों में आज भी दरारें पड़ी हैं और घास-फूंस से ढके हुए हैं। नगर के गाजीपुर घाट स्थित प्राचीन पोखरे की दशा भी बद से बदतर है।
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दुबिहां संवाददाता के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण की स्थिति दयनीय बनी है। तालाबों, पोखरों आदि जलाशयों की देख भाल करने वाला कोई नहीं है। भू-गर्भ का जलस्तर गिरता जा रहा है। बारांचवर ब्लाक में आदर्श जलाशय योजना बेकार साबित हो गई। जलाशयों के नाम पर लाखों खर्च तो किया गया, लेकिन परवान चढने से पहले ही धराशाई हो गई। बरसात के इस मौसम में तालाबों में पानी की जगह घास फूस नजर आ रहे हैं। विकास खंड के 83 ग्राम पंचायतों में जल संचय धराशाई है। वर्ष 2008 में सरकार ने एक योजना चलाई जिससे किसानों को सिंचाई संकट से जूझना न पड़े और पशु -पक्षियों को गर्मी में पानी मिल सके। मनरेगा के तहत बनाए गए आदर्श जलाशय योजना आए में धन की जन कर बंदरबांट की गई। सूखे हुए पोखरों में पानी भरवाने की जिम्मेदारी ग्राम प्रधानों की है। इनकी तलहटी में दरारें दिखाई दे रही है। इन पोखरों की खुदाई तथा रख-रखाव, पोखरे तक पहुंचने के लिए सीढिय़ां, बैठने ब्रेंच आदि भी बनवाना था।
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जनपद के विभिन्न गांवों में वर्ष 09-10 में आदर्श तालाब योजना चलाई गई थी। योजना के तहत आदर्श तालाब के चारों तरफ बैरीकेडिंग कर सुंदरीकरण के नाम पर पेड़-पैधे भी लगाए गए थे। योजना का लाभ ग्रामीणों को देने के लिए जनपद की 1233 ग्राम पंचायतों के सापेक्ष 744 ग्राम पंचायतों में आदर्श तालाब निर्माण के लिए चयन किया गया था। इनके निर्माण के लिए 21 करोड़ से अधिक की धनराशि शासन द्वारा संबंधित विभाग को उपलब्ध भी कराई गई थी। विभाग की माने तो जनपद में कुल तलाबों की संख्या वर्तमान में 2544 है। जिसमें से करीब 1800 तालाबों को मत्स्य विभाग की ओर से पट्टे पर दे दिया गया है। जबकि करीब 744 तालाब निष्प्रयोज्य बने हुए हैं। पानी की समस्या को देखते हुए सरकार की ओर से हर ग्राम पंचायतों में आदर्श जलाशय योजना चलाई गई थी।
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इन तालाबों पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन रख-रखाव के अभाव में तलाब गर्मी शुरू होते ही सूख जाते हैं। जल संरक्षण न होने से इनका उपयोग तक नहीं होता। खुदाई के नाम पर भी खानापूर्ति की जाती है। आधे से अधिक तालाबों का मत्स्य पालन विभाग को पट्टा दिया जाता है। इन तालाबों की दशा भी बहुत बेहतर नहीं है। तालाबों के लिए सरकार विभिन्न योजनाएं चला रही है। लेकिन सब कागजों में है। वर्तमान में जिले के 40 फीसदी जलाशय निष्प्रयोज्य बने हुए हैं। आलम यह है कि कई तालाबों में आज भी दरारें पड़ी हैं और घास-फूंस से ढके हुए हैं। नगर के गाजीपुर घाट स्थित प्राचीन पोखरे की दशा भी बद से बदतर है।
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दुबिहां संवाददाता के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण की स्थिति दयनीय बनी है। तालाबों, पोखरों आदि जलाशयों की देख भाल करने वाला कोई नहीं है। भू-गर्भ का जलस्तर गिरता जा रहा है। बारांचवर ब्लाक में आदर्श जलाशय योजना बेकार साबित हो गई। जलाशयों के नाम पर लाखों खर्च तो किया गया, लेकिन परवान चढने से पहले ही धराशाई हो गई। बरसात के इस मौसम में तालाबों में पानी की जगह घास फूस नजर आ रहे हैं। विकास खंड के 83 ग्राम पंचायतों में जल संचय धराशाई है। वर्ष 2008 में सरकार ने एक योजना चलाई जिससे किसानों को सिंचाई संकट से जूझना न पड़े और पशु -पक्षियों को गर्मी में पानी मिल सके। मनरेगा के तहत बनाए गए आदर्श जलाशय योजना आए में धन की जन कर बंदरबांट की गई। सूखे हुए पोखरों में पानी भरवाने की जिम्मेदारी ग्राम प्रधानों की है। इनकी तलहटी में दरारें दिखाई दे रही है। इन पोखरों की खुदाई तथा रख-रखाव, पोखरे तक पहुंचने के लिए सीढिय़ां, बैठने ब्रेंच आदि भी बनवाना था।
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