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व्यक्ति के अंदर मानवता का होना जरूरी
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गाजीपुर। मानव धर्म प्रसार समाज सेवी संस्था श्री गंगा आश्रम बयेपुर देवकली की शाखा अतरौली का 21वां सम्मेलन आश्रम पर बुधवार की देर शाम आयोजित किया गया। इस अवसर पर अवधेश जी ने महाराज ने कहा कि व्यक्ति के अंदर मानवता होना बहुत जरूरी है। सच्चे संत के शरण में जाने से ही हमारा कल्याण होगा। सत्संग में मनुष्य कि बुद्धि पवित्र होती है और वह सत्य के रास्ते पर चलने लगता है।
युवा व्यास श्री माधवकृष्ण जी ने कहा कि जब मानव जन्म लेता है, तभी से ही वह मानव धर्म का पालन करने लगता है। व्यक्ति अपने नियत-कर्म को अच्छे ढंग से करे, वहीं मानव धर्म है। मनुष्य अपने कर्म के अनुसार भगवान को प्राप्त कर लेता है। रामजी ने कहा कि भगवान अपने भक्तों की परीक्षा लेते है। गुण और दोष से यह मानव शरीर बना है। अच्छा गुण जिसमें भरा है, वही संत है। वर्तमान समय में श्री महाराज जी ने कल्याण का मार्ग दिया है। मानस मर्मज्ञ रामायन जी ने कहा कि परमात्मा ने इस जीवन को तीन भागों में बांटा है। पहला और अंतिम भाग परमात्मा के हाथ में होता है। बीच वाला भाग हमारे हाथ में होता है और इसी काल में अपने जीवन को सुधार सकते है। अपने वाणी को पवित्र रखे। अपने अंदर अहंकार न लाए। व्यक्ति की वाणी हमेशा शीतल होनी चाहिए। व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु उसका अहंकार है।
इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ ईश प्रार्थना और आश्रम के महंत श्री भोलादास जी महाराज द्वारा झंडारोहण एवं महाराज जी के चित्र पर धूप-दीप जलाकर पूजन-अर्चन से हुआ। विरेंद्र जी ने वंदना प्रस्तुत किया। सभा का संचालन तेजबहादुर जी ने किया। इस अवसर पर मोहन ,राजेंद्र जी, सुनील, सोनू, होरीलाल, पवन, अच्छेलाल, वीरेंद्र जी सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
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युवा व्यास श्री माधवकृष्ण जी ने कहा कि जब मानव जन्म लेता है, तभी से ही वह मानव धर्म का पालन करने लगता है। व्यक्ति अपने नियत-कर्म को अच्छे ढंग से करे, वहीं मानव धर्म है। मनुष्य अपने कर्म के अनुसार भगवान को प्राप्त कर लेता है। रामजी ने कहा कि भगवान अपने भक्तों की परीक्षा लेते है। गुण और दोष से यह मानव शरीर बना है। अच्छा गुण जिसमें भरा है, वही संत है। वर्तमान समय में श्री महाराज जी ने कल्याण का मार्ग दिया है। मानस मर्मज्ञ रामायन जी ने कहा कि परमात्मा ने इस जीवन को तीन भागों में बांटा है। पहला और अंतिम भाग परमात्मा के हाथ में होता है। बीच वाला भाग हमारे हाथ में होता है और इसी काल में अपने जीवन को सुधार सकते है। अपने वाणी को पवित्र रखे। अपने अंदर अहंकार न लाए। व्यक्ति की वाणी हमेशा शीतल होनी चाहिए। व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु उसका अहंकार है।
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इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ ईश प्रार्थना और आश्रम के महंत श्री भोलादास जी महाराज द्वारा झंडारोहण एवं महाराज जी के चित्र पर धूप-दीप जलाकर पूजन-अर्चन से हुआ। विरेंद्र जी ने वंदना प्रस्तुत किया। सभा का संचालन तेजबहादुर जी ने किया। इस अवसर पर मोहन ,राजेंद्र जी, सुनील, सोनू, होरीलाल, पवन, अच्छेलाल, वीरेंद्र जी सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
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