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नहाय-खाय के साथ डाला छठ का व्रत शुरू

Tue, 24 Oct 2017 11:46 PM IST
Updated Tue, 24 Oct 2017 11:46 PM IST
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नहाय-खाय के साथ डाला छठ का व्रत शुरू
गाजीपुर। लोक आस्था का पर्व डाला छठ भारत में सूर्योपासना के लिए जाना जाता है। सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। मंगलवार को नहाए-खाए से महापर्व की शुरूआत व्रती महिलाओं ने की। पहले दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाए’ के रूप में मनाया गया। सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र किया गया। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर शुद्ध शाकाहारी भोजन को ग्रहण कर व्रत की शुरुआत की। घर के सभी सदस्य व्रति के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण किए। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया गया। दाल चने की बनाई गई थी। दूसरे दिन बुधवार को कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिनभर का उपवास रखकर शाम को भोजन करती हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आसपास के सभी लोगों को आमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी लगी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
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भगवान सूर्य की उपासना का महापर्व डाला छठ मंगलवार से आरंभ हो गया। पहले दिन महिलाओं ने लौकी-भात खाकर व्रत रखा और घरों में छठ मइया की आराधना में पूरी तरह से लीन हो गई। घरों में छठी मइया के गीत भी गाए गए। पर्व को लेकर परिवार की अन्य सदस्यों में भी उत्साह देखने को मिला। जिले में डाला छठ का पर्व धूमधाम से मनाया गया। पिछले कई दिनों से घर-घर में इसकी तैयारी हो रही थी। मंगलवार को सुबह से ही व्रती महिलाओं में डाला छठ के व्रत को लेकर जबरदस्त उत्साह नजर आ रहा था। परंपरा के तहत छठ पर्व के दो दिन पहले से ही शरीर की शुद्धि का उपाय शुरू कर दिया जाता है। पहले दिन नहाय-खाय का क्रम चला। इसके तहत मंगलवार को स्नान के बाद व्रती महिलाओं ने लौका-भात या कद्दू-चने की दाल और चावल ग्रहण कर व्रत धारण किया। इसे लेकर व्रती महिलाओं के घर वाले भी व्यस्त रहे। बताया जाता है कि लौका-भात जहां आसानी से पच जाता है, वहीं इससे शुद्धता भी बनी रहती है। सभी घरों में इस परंपरा का निर्वहन पूरी आस्था और विश्वास के साथ किया जाता है। डाला छठ का व्रत शुरू होने के साथ ही घरों में छठ मइया की पूजा का भी दौर शुरू हो गया। व्रती महिलाएं पूरी तरह से छठ मइया की अराधना मेें लीन हो गई है और उनके द्वारा छठ मइया का गीत भी गाने के साथ ही गुनगुनाया जा रहा है। कई घरों में साउंडों में छठ मइया की गीत बजना शुरु हो गया है, जिससे आसपास का माहौल पूरी तरह से छठ मय हो गया है। डाला छठ के दूसरे दिन बुधवार को व्रती महिलाएं खरना करेंगी। खरना में दिनभर व्रत रहने के बाद शाम के समय पूड़ी तथा खीर खाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि करीब 24 घंटे के निर्जला व्रत को करने से पहले खरना के रुप में किए जाने वाले इस व्रत से शरीर की स्वस्थता बनी रहती है। छठ पर्व के एक दिन पहले इस खरना के बाद से ही व्रत शुरु हो जाता है। इसके बाद महिलाएं छठ की पूजा-पाठ में पूरी तरह से जुट जाती हैं। घरों में ठेकुआ, खाजा, कसार आदि पकवान बनाया जाता है। व्रत का यह क्रम तीसरे दिन भोर में भगवान भाष्कर को अर्घ्य देने के बाद समाप्त होता है। करीब 36 घंटे बाद पूजा सम्पन्न हो जाने पर महिलाएं प्रसाद ग्रहण कर व्रत को तोड़ती हैं।
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