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लवणीय मृदा सुधार में मिट्टी परीक्षण की भूमिका प्रमुख
Updated Tue, 22 May 2018 11:12 PM IST
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गाजीपुर। कृषि विज्ञान केंद्र के सभागार में सरकारी विभाग के सेवारत कर्मियों के लिए लवण प्रभावित मृदा का सुधार विषय पर प्रशिक्षण केंद्र परिसर में मंगलवार को आयोजित किया गया। केंद्र के सीनियर साइंटिस्ट एंड हेड डॉ. दिनेश सिंह ने कहा कि लवणीय मृदा सुधार में मिट्टी परीक्षण की प्रमुख भूमिका होती है। उन्होंने मिट्टी परीक्षण कराकर स्वायल हेल्थ कार्ड के अनुसार ही रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किए जाने की सलाह दी।
प्रशिक्षण में केंद्र के मृदा वैज्ञानिक डॉ. डीके सिंह ने बताया कि हमारे देश में लगभग 13.9 मिलियन हेक्टेयर भूमि बंजर एवं अनुपजाऊ है, जिसमें से क्षारीय एवं लवणीय मृदा का हिस्सा 7.5 मिलियन हेक्टेयर है। ऐसी मृदा में शुष्क महीनों में किसी भी प्रकार की वनस्पति नहीं दिखाई देती है। वर्षा के मौसम में जल निकास के अभाव में पानी भर जाता है तथा सूखने पर मृदा की सतह कठोर हो जाती है, जिससे पानी का मृदा में अवशोषण बहुत ही धीमी गति से होता है। मृदा में विभिन्न गहराइयों पर कठोर परतें पायी जाती हैं, जिनके कारण जल एवं पौधों की जड़ें मृदा की निचली सतहों तक प्रवेश नहीं कर सकती है। मृदा में क्षारीय एवं लवणीय तत्वों की प्रचुर मात्रा तथा जल भराव होने से बोयी गई फसलें और पौधे नष्ट हो जाते हैं तथा सामान्य रूप से बढ़वार नहीं हो पाती है। भूमि की भौतिक एव रासायनिक दशा क्षीण होने के कारण उपजाऊ एवं उर्वरा शक्ति का ह्रास हो जाता है, जिससे पौधों की वृद्धि संतोषजनक नहीं होती है। बताया कि जांच के बाद मांग के अनुसार बारीक जिप्सम को मृदा में बुरक कर 10-15 सेमी गहराई तक मिला लेना चाहिए। क्षारीय भूमि के सुधार के लिए गंधक, गंधक चूना, गंधक का अम्ल आदि रसायनों का प्रयोग भी लाभप्रद है, जिसकी मात्रा मृदा के पीएच एवं किस्म पर निर्भर करती है। उन्होंने बताया कि क्षारीय और लवणीय मृदा की उर्वरा एवं उपजाऊ शक्ति को बनाये रखने के लिए कृषि एवं कृषि प्रबंधन क्रिया अपनाना अत्यंत आवश्यक है। जहां सिंचाई जल क्षारीय अथवा लवणीय हो, वहां ड्रिप या फव्वारा पद्धति से सिंचाई करना चाहिए। फसलों की बुवाई मेड़ बनाकर करें। प्रशिक्षण में कृषि विभाग के 26 प्रसार कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।
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प्रशिक्षण में केंद्र के मृदा वैज्ञानिक डॉ. डीके सिंह ने बताया कि हमारे देश में लगभग 13.9 मिलियन हेक्टेयर भूमि बंजर एवं अनुपजाऊ है, जिसमें से क्षारीय एवं लवणीय मृदा का हिस्सा 7.5 मिलियन हेक्टेयर है। ऐसी मृदा में शुष्क महीनों में किसी भी प्रकार की वनस्पति नहीं दिखाई देती है। वर्षा के मौसम में जल निकास के अभाव में पानी भर जाता है तथा सूखने पर मृदा की सतह कठोर हो जाती है, जिससे पानी का मृदा में अवशोषण बहुत ही धीमी गति से होता है। मृदा में विभिन्न गहराइयों पर कठोर परतें पायी जाती हैं, जिनके कारण जल एवं पौधों की जड़ें मृदा की निचली सतहों तक प्रवेश नहीं कर सकती है। मृदा में क्षारीय एवं लवणीय तत्वों की प्रचुर मात्रा तथा जल भराव होने से बोयी गई फसलें और पौधे नष्ट हो जाते हैं तथा सामान्य रूप से बढ़वार नहीं हो पाती है। भूमि की भौतिक एव रासायनिक दशा क्षीण होने के कारण उपजाऊ एवं उर्वरा शक्ति का ह्रास हो जाता है, जिससे पौधों की वृद्धि संतोषजनक नहीं होती है। बताया कि जांच के बाद मांग के अनुसार बारीक जिप्सम को मृदा में बुरक कर 10-15 सेमी गहराई तक मिला लेना चाहिए। क्षारीय भूमि के सुधार के लिए गंधक, गंधक चूना, गंधक का अम्ल आदि रसायनों का प्रयोग भी लाभप्रद है, जिसकी मात्रा मृदा के पीएच एवं किस्म पर निर्भर करती है। उन्होंने बताया कि क्षारीय और लवणीय मृदा की उर्वरा एवं उपजाऊ शक्ति को बनाये रखने के लिए कृषि एवं कृषि प्रबंधन क्रिया अपनाना अत्यंत आवश्यक है। जहां सिंचाई जल क्षारीय अथवा लवणीय हो, वहां ड्रिप या फव्वारा पद्धति से सिंचाई करना चाहिए। फसलों की बुवाई मेड़ बनाकर करें। प्रशिक्षण में कृषि विभाग के 26 प्रसार कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।
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