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धनुष टूटते ही श्रीराम के गले में सीता ने डाला वरमाला
Updated Fri, 13 Oct 2017 10:42 PM IST
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करीमुद्दीनपुर। असावर क्रांतिकारी युवा संघ रामलीला समिति के रंगमंच पर फुलवारी तथा धनुष यज्ञ का मंचन गुरुवार की रात किया गया। रामलीला की शुरूआत महर्षि विश्वामित्र के साथ सीता स्वयंबर के लिए भगवान श्रीराम जनकपुर पहुंचे। श्रीराम और लक्ष्मण ने गुरु विश्वामित्र से नगर घुमने की इजाजत ली और नगर घुमने चल दिए। इसका चित्रण और मनमोहक झांकी ने लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करने का काम किया। इसके बाद मिथिला नरेश महाराज जनक अपनी बेटी सीता का स्वयंवर रचे। जिसमें प्रतिज्ञा किया कि जो वीर भगवान शिव के धनुष को तोड़ेगा उसी से मैं अपनी पुत्री सीता का विवाह करूंगा। सीता स्वयंवर में देश के कोने-कोने से राजागण पधारे हुए थे। वहां गुरु विश्वामित्र भी राम और लक्ष्मण के साथ स्वयंवर में आमंत्रित थे। उनके वहां पहुंचने पर राजा जनक ने सदानंद जी को बुलाकर महर्षि विश्वामित्र सहित राम लक्ष्मण को उचित स्थान दिलाने के लिए भेजते हैं। इसके बाद स्वयंबर में आए राजागण धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए प्रयास करने लगे, लेकिन धनुष टस से मस नहीं हुआ। तभी भ्रमण करते देवर्षि नारद भी स्वयंवर में पहुंच कर महाराज जनक से इस आयोजन की जानकारी लेने के बाद दानवेंद्र बाणासुर और लंका नरेश रावण को भी इस बात की जानकारी दी। इस बात की खबर लगते ही रावण और बाणासुर भी जनकपुर पहुंचते हैं। दोनों के एक ही साथ पहुंचने के कारण दोनों में संवाद होता है और रावण ज्योंहि धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए आगे बढ़ता है आकाशवाणी होती है कि हे रावण तुम्हारी बहन कुंभी निशा को कोई राक्षस हरण कर ले जा रहा है, पहले उसे बचाओ। उसके बाद धनुष पर अपना बल दिखाना। आकाशवाणी की आवाज सुनते ही रावण अपनी बहन को बचाने के लिए चल देता है और बाणासुर भगवान शिव के धनुष को नतमस्तक होकर वापस चला जाता है। इसके बाद एक-एक कर राजा अपना जोर आजमाइश करते हैं और थक हार कर निराश हो शर्मिंदगी से अपना सर नीचे कर लेते हैं। मिथिला नरेश जनक ने सभी राजाओं को धिक्कारते हुए कहते हैं कि हे दीप दीप के राजागण हम किसे कहें बलसाली हैं, आज मुझे यह पता चला पृथ्वी वीरों से खाली है । आप सभी लोग वापस जाइए अब हमें यह विश्वास हो गया है कि यह पृथ्वी वीर विहीन हो चुकी है। अब मेरी पुत्री कुंवारी रहेगी। यह कटु वचन सुन लक्ष्मण से रहा नहीं गया और उन्होंने कहा कि धरती पर क्षत्रियों के होते ऐसा भी कोई कह सकता है कि पृथ्वी वीरों से खाली है। मैं गुरु और बड़े भाई का आदेश पाऊँ तो इस धनुष को तोड़ मरोड़ कर रख दूं। महर्षि विश्वामित्र समय और परिस्थिति को पहचान कर श्रीराम को आदेशित करते हैं। आदेश मिलते ही श्रीरामचंद्र जी ने भगवान शिव के धनुष को खंड-खंड कर डाला और सीता ने श्रीराम के गले में वरमाला डाल दी। सभी खुशी से झूम उठे और पूरा पंडाल श्रीरामचंद्र की जय करने लगा। उसी समय शिव के धनुष टूटने की आवाज सुनकर परशुराम जी स्वयंवर में पहुंचते हैं और पूछते हैं कि बताओ शिव के धनुष को किसने तोड़ा है। चारो ओर संनाटा छा जाता है, तब महाराज जनक ने उन्हें सारी जानकारी दी। इसके बाद भी परशुराम जी के न मानने पर भगवान श्रीराम समझाते हैं न मानने पर लक्ष्मण जी उलझ जाते हैं और परशुराम- लक्ष्मण संवाद बड़ा ही रोचक और सजीव तरीके से पेश किया जाता है। यह दर्शकों में काफी सराहा गया। परशुराम जी के कहने पर धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाकर श्रीराम द्वारा परशुराम जी की शंका का समाधान किया गया। परशुराम जी समझ जाते हैं कि भगवान का अवतार हो चुका है। रामलीला में आनन्द तिवारी-जनक ,आदर्श राय-रावण, चमन राय-बाणा सुर, रामू यादव -परशुराम, अभिषेक राय-लक्ष्मण, विनय तिवारी ने राम की भूमिका निभाई।
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