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खरपतवारों को नियंत्रित करने के बारे में जानकारी दी
Updated Thu, 06 Jul 2017 11:43 PM IST
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गाजीपुर। कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से सेवारत कर्मियों के लिए धान की फसल में एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन प्रशिक्षण का आयोजन गुरुवार को किया गया। केंद्र के सीनियर साइंटिस्ट एंड हेड डॉ. दिनेश ने धान की प्रमुख प्रजातियों के बारे में प्रशिक्षणार्थियों को बताया। फार्म मैनेजर डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने सेवारत कर्मियों को धान में उगने वाले खरपतवारों को नियंत्रित करने के बारे में विस्तृत जानकारी दी।
प्रशिक्षण में केंद्र के मृदा वैज्ञानिक डॉ. डीके सिंह ने बताया कि किसी भी फसल में ताजे गोबर का प्रयोग कतई न करें। हमेशा सड़ी हुई गोबर की खाद का ही प्रयोग करना चाहिए, जिससे पौधा आसानी से प्राप्त कर सके। इसके अलावा प्रशिक्षणार्थियों को मुख्य पोषक तत्व जैसे-नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, सल्फर, जिंक एवं आयरन तत्व के कार्य, महत्व एवं इसके प्रयोग विधि के बारे में विस्तृत जानकारी दी। बताया कि जिले के अंदर पाई जाने वाली मिट्टी के अंदर जिंक की कमी के लक्षण देखने को मिलते हैं जिसकी कमी के कारण धान की फसल में खैरा नामक रोग लगता है। इसकी कमी के कारण पौधा भोजन नहीं बना पाता है और पौधे की वृद्धि एवं विकास अवरूद्ध हो जाता है जिस कारण कुछ दिनों बाद पौधा सूख जाता है। ऐसी दशा में किसानों को खड़ी फसल में जिंक सल्फेट का प्रयोग 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करने की सलाह दी। इसके साथ इसका प्रयोग पानी के अंदर घोल बनाकर भी इसका छिड़काव खड़ी फसल में किया जा सकता है। प्रशिक्षण में कृषि विभाग के 18 सेवारत कर्मियों ने सहभागिता की।
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प्रशिक्षण में केंद्र के मृदा वैज्ञानिक डॉ. डीके सिंह ने बताया कि किसी भी फसल में ताजे गोबर का प्रयोग कतई न करें। हमेशा सड़ी हुई गोबर की खाद का ही प्रयोग करना चाहिए, जिससे पौधा आसानी से प्राप्त कर सके। इसके अलावा प्रशिक्षणार्थियों को मुख्य पोषक तत्व जैसे-नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, सल्फर, जिंक एवं आयरन तत्व के कार्य, महत्व एवं इसके प्रयोग विधि के बारे में विस्तृत जानकारी दी। बताया कि जिले के अंदर पाई जाने वाली मिट्टी के अंदर जिंक की कमी के लक्षण देखने को मिलते हैं जिसकी कमी के कारण धान की फसल में खैरा नामक रोग लगता है। इसकी कमी के कारण पौधा भोजन नहीं बना पाता है और पौधे की वृद्धि एवं विकास अवरूद्ध हो जाता है जिस कारण कुछ दिनों बाद पौधा सूख जाता है। ऐसी दशा में किसानों को खड़ी फसल में जिंक सल्फेट का प्रयोग 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करने की सलाह दी। इसके साथ इसका प्रयोग पानी के अंदर घोल बनाकर भी इसका छिड़काव खड़ी फसल में किया जा सकता है। प्रशिक्षण में कृषि विभाग के 18 सेवारत कर्मियों ने सहभागिता की।
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