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चंदे से घर आया एयरफोर्स जवान का शव

Sat, 05 Dec 2015 01:52 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Sat, 05 Dec 2015 01:52 AM IST
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ex airforce man body came from donation
एयरफोर्स के दिवंगत जवान महेश चंद्र वाजपेई के घर वालों ने सपने में भी न सोचा होगा कि बेटे की आंख बंद होते ही अधिकारी मुंह फेर लेंगे। उसके ताबूत को घर लाने में साथियों के चंदे की जरूरत पड़ जाएगी।
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डेंगू से पीड़ित देश के ‘लाल’ के शव को घर लेकर पहुंचे परिजनों ने नम आंखों से अपना दुख ‘अमर उजाला’ से बयान साझा किया। कहा कि मामले की शिकायत गृह मंत्रालय से करेंगे।
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घाटमपुर भीतरगांव ब्लाक के पसेमा गांव के संदीप वाजपेई ने बताया कि उनका भतीजा महेश वर्ष 2006 में वायु सेना में भर्ती हुआ था। वह दीपावली की छुट्टी पर गांव आया था तो डेंगू से पीड़ित हो गया।
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फिर भी वह 25 नवंबर को ड्यूटी पर बंगलूरू पहुंच गया। 27 नवंबर को उसकी हालत बिगड़ने पर बहू प्रीती ने वहीं एयरफोर्स अस्पताल में भर्ती कराया। हालत बिगड़ने की सूचना पर महेश के पिता महेंद्र, उसके ससुर सुनील तिवारी के अलावा संदीप भी अपनी पत्नी अंजलि के साथ वहां पहुंच गए।

बुधवार दोपहर 3 बजे महेश की मौत हो गई। बकौल संदीप इसके बाद हम लोगों ने वहां अफसरों से महेश के पार्थिव शरीर को घर ले जाने की बात कही। आरोप है कि अफसरों ने इसका इंतजाम न करने की बात कहकर हाथ खड़े कर दिए और वहीं पर अंतिम संस्कार करने का दबाव बनाने लगे।

इसका हम लोगों ने विरोध किया। चूंकि हम लोग अचानक वहां पहुंचे थे, इसलिए हमारे पास इतने रुपये नहीं थे कि हम लोग फ्लाइट से शव लेकर आ सकें। यह जानकारी यूनिट के साथियों को लगी तो उन्होंने आपस में चंदा करके हम सभी का फ्लाइट का टिकट बनवाकर दिया।

एक टिकट 11 हजार रुपये का है। इस बीच सांसद मुरली मनोहर जोशी से संपर्क साधने के लिए भाजपा नेता अतुल मिश्रा से संपर्क किया। उन्होंने मदद का भरोसा दिया। हमारे पास पास समय की बहुत कमी थी। इसलिए मजबूरी में चंदे का सहारा लेना पड़ा।


यह पल जीवन में कभी नहीं भूलेगा। वहां प्लेन शुक्रवार सुबह 11:30 बजे रवाना हुआ और दोपहर 1:30 बजे लखनऊ एयरपोर्ट पहुंचा। फिर सड़क मार्ग से शव गांव ले जाया गया। परिजनों ने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने चलते समय दो महीने में क्वार्टर भी खाली करने की बात कही।

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