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चूड़ियों को रंग देने वाली महिला श्रमिकों का जीवन बदरंग
ब्यूरो, अमर उजाला फिरोजाबाद
Updated Tue, 07 Mar 2017 11:25 PM IST
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एक चूड़ी कारखाने में काम करती महिलाएं।
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सुहागनगरी के कांच-चूड़ी उद्योग से जुड़ी महिला श्रमिकों को सेवायोजक निर्धारित मजदूरी तक नहीं देते। उनके हक पर ठेकेदार भी डाका डाल रहे हैं। इससे उन्हें बच्चों की शिक्षा तो दूर पेट पालने में मुश्किलें पैदा हो रहीं हैं।
दो सौ कांच और चूड़ी के कारखानों में दो से ढाई हजार महिलाएं भंगार (कांच की चूड़ियों के टुकड़े) बीनने के साथ अन्य कार्य करती हैं। कड़ी धूप एवं भट्टी की तपिश के आगे यहां महिलाएं घंटों तक भंगार बीनने में लग रहती हैं लेकिन दिनभर कार्य के बदले मिलने वाली मजदूरी से महिला श्रमिक संतुष्ट नहीं है। कारखाने में कार्य कर रही मंजू, देवकी, उर्मिला व मिथलेश ने बताया कि सुबह से शाम तक कार्य करने के बाद मात्र 220 रुपये मिलते हैं। हम लोग वर्षों से 300 रुपये मजदूरी देने की मांग रहे हैं लेकिन कोई नहीं सुनता है।
कच्ची चूड़ियां शहर के कई मोहल्लों में चूड़ी जुड़ाई और छंटाई के लिए जाती हैं। यहां भी महिला श्रमिकों का उत्पीड़न हो रहा है। काम लगी सुनीता और नीलम का कहना है कि 100 तोड़ों की जुड़ाई करने पर ठेकेदार उन्हें मात्र 600 रुपये देते हैं। हम लोग महीनों से 100 तोड़े जुड़ाई पर एक हजार रुपये की मांग रहे हैं लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ। इसी पैसे से हमें 50-60 रुपये लीटर मिट्टी का तेल भी खरीदना पड़ता है। बच्चों के पेट भी नहीं पाल पाते।
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श्रम विभाग के पास नहीं कोई योजना
कारखानों में भंगार बीनने, घर-घर में चूड़ी जुड़ाई और छंटाई कार्य में हजारों महिला श्रमिकों के लिए उद्धार के लिए श्रम विभाग के पास कोई योजना नहीं है। महिलाओं का विभाग में पंजीकरण तक नहीं है। सेवायोजकों ने भी इसमें कोई रुचि नहीं ली।
श्रम विभाग की ओर से अभी तक महिला श्रमिकों के लिए कोई योजना नहीं आई है। शासन ने महिला श्रमिकों के संबंध में कोई दिशा-निर्देश नहीं दिए।
नदीम अहमद
सहायक श्रमायुक्त
कारखानों में कार्य करने वाली महिला श्रमिकों को न्यूनतम वेतन दिलाने को उप्र सरकार तक आवाज उठाई है। महिलाओं को मात्र 50 रुपये मजदूरी मिलती थी। वर्तमान में 180-200 रुपये तक मजदूरी मिल रही है। श्रम विभाग की अनदेखी से सेवायोजक श्रमिकों का उत्पीड़न कर रहे हैं।
भूरी सिंह यादव
मंत्री-कांच उद्योग क्रांतिकारी मजदूर संघ
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दो सौ कांच और चूड़ी के कारखानों में दो से ढाई हजार महिलाएं भंगार (कांच की चूड़ियों के टुकड़े) बीनने के साथ अन्य कार्य करती हैं। कड़ी धूप एवं भट्टी की तपिश के आगे यहां महिलाएं घंटों तक भंगार बीनने में लग रहती हैं लेकिन दिनभर कार्य के बदले मिलने वाली मजदूरी से महिला श्रमिक संतुष्ट नहीं है। कारखाने में कार्य कर रही मंजू, देवकी, उर्मिला व मिथलेश ने बताया कि सुबह से शाम तक कार्य करने के बाद मात्र 220 रुपये मिलते हैं। हम लोग वर्षों से 300 रुपये मजदूरी देने की मांग रहे हैं लेकिन कोई नहीं सुनता है।
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कच्ची चूड़ियां शहर के कई मोहल्लों में चूड़ी जुड़ाई और छंटाई के लिए जाती हैं। यहां भी महिला श्रमिकों का उत्पीड़न हो रहा है। काम लगी सुनीता और नीलम का कहना है कि 100 तोड़ों की जुड़ाई करने पर ठेकेदार उन्हें मात्र 600 रुपये देते हैं। हम लोग महीनों से 100 तोड़े जुड़ाई पर एक हजार रुपये की मांग रहे हैं लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ। इसी पैसे से हमें 50-60 रुपये लीटर मिट्टी का तेल भी खरीदना पड़ता है। बच्चों के पेट भी नहीं पाल पाते।
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श्रम विभाग के पास नहीं कोई योजना
कारखानों में भंगार बीनने, घर-घर में चूड़ी जुड़ाई और छंटाई कार्य में हजारों महिला श्रमिकों के लिए उद्धार के लिए श्रम विभाग के पास कोई योजना नहीं है। महिलाओं का विभाग में पंजीकरण तक नहीं है। सेवायोजकों ने भी इसमें कोई रुचि नहीं ली।
श्रम विभाग की ओर से अभी तक महिला श्रमिकों के लिए कोई योजना नहीं आई है। शासन ने महिला श्रमिकों के संबंध में कोई दिशा-निर्देश नहीं दिए।
नदीम अहमद
सहायक श्रमायुक्त
कारखानों में कार्य करने वाली महिला श्रमिकों को न्यूनतम वेतन दिलाने को उप्र सरकार तक आवाज उठाई है। महिलाओं को मात्र 50 रुपये मजदूरी मिलती थी। वर्तमान में 180-200 रुपये तक मजदूरी मिल रही है। श्रम विभाग की अनदेखी से सेवायोजक श्रमिकों का उत्पीड़न कर रहे हैं।
भूरी सिंह यादव
मंत्री-कांच उद्योग क्रांतिकारी मजदूर संघ