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रघुवर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन...
ब्यूरो अमर उजाला फीरोजाबाद
Updated Thu, 08 Oct 2015 11:18 PM IST
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गुरु विश्वामित्र की आज्ञा पाकर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम श्रीराम ने जैसे ही शिव का धनुष तोड़ा तो राजा जनक खुशी से झूम उठे। तपस्या में लीन परशुराम धनुष टूटते ही क्रोधित हो उठे। माता जानकी ने जैसे श्रीराम के गले में वरमाला डाली तभी देवताओं ने प्रसन्न होकर पुष्प वर्षा शुरू कर दी।
श्री सनातन धर्म रामलीला महोत्सव समिति के तत्वावधान में रामलीला मैदान में भगवान श्रीराम का डोला पहुंचते लीला का मंचन शुरू होता है। गुरू विश्वामित्र की आज्ञा पाकर भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ मिथलापुरी देखते हुए पुष्प वाटिका से पुष्प लेने जाते हैं। राजा जनक ने सीता स्वयंवर की घोषणा कर दी कि जो कोई शिव के धनुष को तोड़ेगा उसी को जनक दुलारी अपना वर चुनेगी। बड़े-बड़े राजा महाराज बुलाए गए। गुरु विश्वामित्र के साथ भगवान राम, लक्ष्मण भी स्वयंवर में पहुंचे। इधर जनक दुलारी अपनी सखियों के साथ गौरी पूजन के लिए जाती हैं। यहां वह मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की छवि को देखकर मोहित हो जाती हैं। शिव का धनुष तोडने को बड़े-बड़े राजाओं ने जोर आजमाइश की, परंतु कोई धनुष को उठाकर चाप चढ़ाना तो दूर हिला भी नहीं सका। यह देख राजा जनक विचलित हो उठे।
गुरु की आज्ञा पाकर श्रीराम ने शिव धनुष का चाप चढ़ाया वैसे ही वह टूट गया। धनुष की टंकार से आसमान में देवता पुष्प वर्षा करने लगे। धनुष टूटते ही तीनों लोक हिल गए और जनक हर्षित हो उठे। इधर भगवान परशुराम की तपस्या भंग हो गई। गुस्से से तमतमाये परशुराम जनकपुरी जा पहुंचे। परशुराम, लक्ष्मण के बीच काफी देर तक संवाद हुआ, परंतु भगवान श्रीराम का असली रूप देख उन्होंने श्रीराम की आरती उतारी। रामलीला मैदान में उपस्थित हजारों दर्शक रामलीला मंचन देख गदगद हो गए। आचार्य महावीर प्रसाद शर्मा, वीके दीक्षित, कृष्णकांत दीक्षित, श्रीनिवास दुबे ने लीलाओं का मंचन कराया।
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रामलीला मंचन के दौरान डा. दिलीप यादव, पं. मुन्नालाल शास्त्री, आरपी सिंह यादव, नीतेश अग्रवाल, प्रभात कुमार नगीना, मनोज यादव, उमेश यादव, श्याम सिंह यादव, राकेश अग्रवाल आदि मौजूद थे।
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श्री सनातन धर्म रामलीला महोत्सव समिति के तत्वावधान में रामलीला मैदान में भगवान श्रीराम का डोला पहुंचते लीला का मंचन शुरू होता है। गुरू विश्वामित्र की आज्ञा पाकर भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ मिथलापुरी देखते हुए पुष्प वाटिका से पुष्प लेने जाते हैं। राजा जनक ने सीता स्वयंवर की घोषणा कर दी कि जो कोई शिव के धनुष को तोड़ेगा उसी को जनक दुलारी अपना वर चुनेगी। बड़े-बड़े राजा महाराज बुलाए गए। गुरु विश्वामित्र के साथ भगवान राम, लक्ष्मण भी स्वयंवर में पहुंचे। इधर जनक दुलारी अपनी सखियों के साथ गौरी पूजन के लिए जाती हैं। यहां वह मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की छवि को देखकर मोहित हो जाती हैं। शिव का धनुष तोडने को बड़े-बड़े राजाओं ने जोर आजमाइश की, परंतु कोई धनुष को उठाकर चाप चढ़ाना तो दूर हिला भी नहीं सका। यह देख राजा जनक विचलित हो उठे।
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गुरु की आज्ञा पाकर श्रीराम ने शिव धनुष का चाप चढ़ाया वैसे ही वह टूट गया। धनुष की टंकार से आसमान में देवता पुष्प वर्षा करने लगे। धनुष टूटते ही तीनों लोक हिल गए और जनक हर्षित हो उठे। इधर भगवान परशुराम की तपस्या भंग हो गई। गुस्से से तमतमाये परशुराम जनकपुरी जा पहुंचे। परशुराम, लक्ष्मण के बीच काफी देर तक संवाद हुआ, परंतु भगवान श्रीराम का असली रूप देख उन्होंने श्रीराम की आरती उतारी। रामलीला मैदान में उपस्थित हजारों दर्शक रामलीला मंचन देख गदगद हो गए। आचार्य महावीर प्रसाद शर्मा, वीके दीक्षित, कृष्णकांत दीक्षित, श्रीनिवास दुबे ने लीलाओं का मंचन कराया।
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रामलीला मंचन के दौरान डा. दिलीप यादव, पं. मुन्नालाल शास्त्री, आरपी सिंह यादव, नीतेश अग्रवाल, प्रभात कुमार नगीना, मनोज यादव, उमेश यादव, श्याम सिंह यादव, राकेश अग्रवाल आदि मौजूद थे।