{"_id":"eb887759cfbdee6c2b450dc3cb17b869","slug":"polythene-order-so-how-will-it-stop-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"पॉलीथिन : आदेश तो बहुत, कैसे लगेगी रोक ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पॉलीथिन : आदेश तो बहुत, कैसे लगेगी रोक
ब्यूरो, अमर उजाला फीरोजाबाद
Updated Tue, 08 Dec 2015 06:39 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पॉलीथिन पर रोक लगाने के आदेश कई बार हुए, लेकिन आदेशों को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सके। अब हाईकोर्ट ने 31 दिसंबर तक प्रदेश सरकार को पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए हैं। ऐसे में प्रश्न है कि आखिर जिला और नगर निगम प्रशासन पॉलीथिन पर कैसे प्रतिबंध लगाएगा।
केंद्र सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के प्रावधान के तहत 40 माइक्रोन से कम की पॉलीथिन बैग पर पूर्णतया प्रतिबंध कर दिया है। पॉलीथिन के दुष्परिणाम को देखते हुए महाराष्ट्र, मेघालय, चंडीगढ़ और पश्चिम बंगाल में 40 माइक्रोन, पंजाब और केरल में 30 माइक्रोन से कम मोटाई की पॉलीथिन उपयोग से बाहर कर दी गई है, लेकिन उत्तर प्रदेश में आज भी पॉलीथिन को बहुतायत में प्रयोग किया जा रहा है। केंद्र व प्रदेश सरकार के आदेश पर जिला एवं नगर निगम द्वारा कई बार जागरूकता अभियान चलाए। जनता को जागरूक करने के लिए रैलियां निकाली गईं। वर्कशॉप का आयोजन कर पॉलीथिन के दुष्प्रभाव भी बताए गए, लेकिन कुछ दिन के बाद अभियान ने दम तोड़ दिया। अब हाईकोर्ट द्वारा 31 दिसंबर तक पूरे प्रदेश में पॉलीथिन पर रोक लगाने के आदेश जारी किए गए हैं।
बाक्स--
पॉलीथिन से हजारों पशु बने काल का ग्रास
पॉलीथिन का बहुतायत में प्रयोग पर्यावरण को बिगाड़ रहा है। पॉलीथिन का प्रयोग से हजारों निरीह पशु काल का ग्रास बन चुके हैं। यही नहीं पॉलीथिन उपजाऊ जमीन को भी बंजर बना रही है। इससे देश में लगातार उत्पादन क्षमता घटती जा रही है।
विज्ञापन
पालिका से निगम बनने के बाद भी नहीं लगी रोक
पालिका से नगर निगम बनने के बाद भी शहर में पॉलीथिन पर रोक नहीं लग सकी। पालिका बोर्ड में सिटी मजिस्ट्रेट के नेतृत्व में स्वास्थ्य विभाग द्वारा कई बार पॉलीथिन के खिलाफ छापामार अभियान चलाया गया। सैकड़ों टन पॉलीथिन जब्त कर गांधी पार्क पर उसकी होली जलाई गई। तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह के कार्यकाल में सेंट जोंस स्कूल में वर्कशॉप का आयोजन भी हुआ, जिसमें पॉलीथिन के दुष्परिणाम बताते हुए सख्ती से रोक लगाने का संकल्प भी लिया गया, लेकिन यह अभियान मात्र रैली और वर्कशॉप तक सीमित रह गया।
जॉयंट्स ग्रुप ने जगाई पॉलीथिन के खिलाफ अलख
जायंट्स ग्रुप द्वारा पॉलीथिन के खिलाफ लगातार अलख जगाई गई। जायंट्स इंटरनेशनल फेडरेशन-5 के पूर्व अध्यक्ष, संरक्षक मंडल के सदस्य डा. अशोक खुराना के नेतृत्व में जायंट्स ग्रुप महिला शक्ति और जायंट्स ग्रुप सहेली द्वारा कई बार जागरूकता रैली निकाली गईं। आमजन, दुकानदारों को पंफलेट वितरित कराए गए। ग्रुप के सभी सदस्यों के साथ-साथ दुकानदारों को कागज व कपड़े के थैले भी वितरित किए गए।
कांच उद्योग के लिए पॉलीथिन बनी अभिशाप
सुहागनगर के परंपरागत कांच उद्योग के लिए भी पॉलीथिन अभिशाप बन गई है। वर्षों पूर्व दवाईयां, पेय पदार्थ के साथ शराब की पैकिंग बोतलों में की जाती थी, लेकिन प्लास्टिक की बोतलों में पैकिंग करने की अनुमति मिलने से कांच उद्योग को भारी नुकसान हुआ। उद्यमियों का कहना है कि प्लास्टिक का प्रतिदिन करीब 11 मीट्रिक टन उत्पादन होता है, जो अधिकांशत: नष्ट नहीं होती है।
पॉलीथिन प्रयोग से हो रही गंभीर बीमारियों
पॉलीथिन का प्रयोग होने के कारण लोग हार्ट अटैक, शुगर, कैंसर, मेमोरी लॉस जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। प्लास्टिक की बोतल में शराब पीने से कैंसर, गुर्दे फेल होना, लीवर खराब होने, नपुंसकता जैसी बीमारियां हो रही हैं। बच्चों की दूध की बोतल में खतरनाक रसायन होते हैं। इससे दुधमुंहे बच्चे भी गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।
विज्ञापन
केंद्र सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के प्रावधान के तहत 40 माइक्रोन से कम की पॉलीथिन बैग पर पूर्णतया प्रतिबंध कर दिया है। पॉलीथिन के दुष्परिणाम को देखते हुए महाराष्ट्र, मेघालय, चंडीगढ़ और पश्चिम बंगाल में 40 माइक्रोन, पंजाब और केरल में 30 माइक्रोन से कम मोटाई की पॉलीथिन उपयोग से बाहर कर दी गई है, लेकिन उत्तर प्रदेश में आज भी पॉलीथिन को बहुतायत में प्रयोग किया जा रहा है। केंद्र व प्रदेश सरकार के आदेश पर जिला एवं नगर निगम द्वारा कई बार जागरूकता अभियान चलाए। जनता को जागरूक करने के लिए रैलियां निकाली गईं। वर्कशॉप का आयोजन कर पॉलीथिन के दुष्प्रभाव भी बताए गए, लेकिन कुछ दिन के बाद अभियान ने दम तोड़ दिया। अब हाईकोर्ट द्वारा 31 दिसंबर तक पूरे प्रदेश में पॉलीथिन पर रोक लगाने के आदेश जारी किए गए हैं।
विज्ञापन
बाक्स--
पॉलीथिन से हजारों पशु बने काल का ग्रास
पॉलीथिन का बहुतायत में प्रयोग पर्यावरण को बिगाड़ रहा है। पॉलीथिन का प्रयोग से हजारों निरीह पशु काल का ग्रास बन चुके हैं। यही नहीं पॉलीथिन उपजाऊ जमीन को भी बंजर बना रही है। इससे देश में लगातार उत्पादन क्षमता घटती जा रही है।
विज्ञापन
पालिका से निगम बनने के बाद भी नहीं लगी रोक
पालिका से नगर निगम बनने के बाद भी शहर में पॉलीथिन पर रोक नहीं लग सकी। पालिका बोर्ड में सिटी मजिस्ट्रेट के नेतृत्व में स्वास्थ्य विभाग द्वारा कई बार पॉलीथिन के खिलाफ छापामार अभियान चलाया गया। सैकड़ों टन पॉलीथिन जब्त कर गांधी पार्क पर उसकी होली जलाई गई। तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह के कार्यकाल में सेंट जोंस स्कूल में वर्कशॉप का आयोजन भी हुआ, जिसमें पॉलीथिन के दुष्परिणाम बताते हुए सख्ती से रोक लगाने का संकल्प भी लिया गया, लेकिन यह अभियान मात्र रैली और वर्कशॉप तक सीमित रह गया।
जॉयंट्स ग्रुप ने जगाई पॉलीथिन के खिलाफ अलख
जायंट्स ग्रुप द्वारा पॉलीथिन के खिलाफ लगातार अलख जगाई गई। जायंट्स इंटरनेशनल फेडरेशन-5 के पूर्व अध्यक्ष, संरक्षक मंडल के सदस्य डा. अशोक खुराना के नेतृत्व में जायंट्स ग्रुप महिला शक्ति और जायंट्स ग्रुप सहेली द्वारा कई बार जागरूकता रैली निकाली गईं। आमजन, दुकानदारों को पंफलेट वितरित कराए गए। ग्रुप के सभी सदस्यों के साथ-साथ दुकानदारों को कागज व कपड़े के थैले भी वितरित किए गए।
कांच उद्योग के लिए पॉलीथिन बनी अभिशाप
सुहागनगर के परंपरागत कांच उद्योग के लिए भी पॉलीथिन अभिशाप बन गई है। वर्षों पूर्व दवाईयां, पेय पदार्थ के साथ शराब की पैकिंग बोतलों में की जाती थी, लेकिन प्लास्टिक की बोतलों में पैकिंग करने की अनुमति मिलने से कांच उद्योग को भारी नुकसान हुआ। उद्यमियों का कहना है कि प्लास्टिक का प्रतिदिन करीब 11 मीट्रिक टन उत्पादन होता है, जो अधिकांशत: नष्ट नहीं होती है।
पॉलीथिन प्रयोग से हो रही गंभीर बीमारियों
पॉलीथिन का प्रयोग होने के कारण लोग हार्ट अटैक, शुगर, कैंसर, मेमोरी लॉस जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। प्लास्टिक की बोतल में शराब पीने से कैंसर, गुर्दे फेल होना, लीवर खराब होने, नपुंसकता जैसी बीमारियां हो रही हैं। बच्चों की दूध की बोतल में खतरनाक रसायन होते हैं। इससे दुधमुंहे बच्चे भी गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।