{"_id":"62f7eea765d325068f0155ec","slug":"freedom-fighter-firozabad-news-agr5433759144","type":"story","status":"publish","title_hn":"पहले आजादी, फिर सेनानियों के लिए संघर्षरत रहे ठा. मोहन सिंह","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पहले आजादी, फिर सेनानियों के लिए संघर्षरत रहे ठा. मोहन सिंह
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फिरोजाबाद। ठा. मोहन सिंह जुल्म सहते रहे और आजादी के लिए सतत संघर्ष करते रहे। संघर्ष का यह क्रम आजादी के बाद भी जारी रहा। आजादी के बाद वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को हक दिलाने के लिए अंतिम समय तक संघर्षरत रहे।
जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में अलग पहचान रखने वाले मोहन सिंह मूलरूप से नारखी के गांव बरतरा के निवासी थे। पिता ठाकुर हीरा सिंह के दो बेटों में वह छोटे थे। उनका जन्म 15 मार्च 1909 को हुआ। बाल्यावस्था में मोहन सिंह के सिर से माता-पिता का साया उठ गया। वर्ष 1929 में वे कोलकाता गए। वहां 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। जब धर्म तल्ला किले के मैदान में जुलूस पहुंचा तो पुलिस कमिश्नर मिस्टर टेगर ने नेसुभाषचंद्र बोस को तो गिरफ्तार कर लिया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर घोड़े छुड़वा दिए। इसमें काफी संख्या में स्वतंत्रता सेनानी घायल हो गए। नमक सत्याग्रह में भी गांधीजी के निर्देश पर शामिल हुए। कोलकाता से 14 किलोमीटर दूर महेश बघान नामक स्थान पर तीन कैंप चल रहे थे। स्वामी परमोनंद ब्रह्मचारी के संचालन वाले कैंप में वे रहने लगे। ब्रिटिश सेना ने इस कैंप पर हमला कर दिया, इसके बाद ठाकुर मोहन सिंह ने मोर्चा संभाला था। 16 मई 1930 को मछुआ बाजार से नमक बिक्री करते समय उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
आठ मार्च 1932 को जनरल पोस्ट ऑफिस कोलकाता के सामने प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तारी देने के साथ ही नौ मार्च को छह माह जेल की सजा सुनाई गई। उन्हें सेंट्रल जेल में बंद रहना पड़ा। आजादी के लिए वे सतत संघर्षरत रहे। 1961 में कोटला सहकारी संघ के अध्यक्ष,1962 में कोटला ब्लॉक के प्रमुख चुने गए। 11 वर्ष बाद काफी संघर्ष के साथ दोबारा से ब्लाक प्रमुख चुने गए थे।
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मरणोपरांत जितना सम्मान मिलना चाहिए था वह नहीं मिला
ठाकुर मोहन सिंह के पौत्र विनय प्रताप सिंह कहता हैं कि बाबा ने देश को आजाद होने के बाद जिले के अफसरों के समक्ष हमेशा सही बात कहने में कभी नहीं हिचके थे। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को भी उनका हक दिलाने की लडाई लड़ी थी। अफसरों के समक्ष अपनी बात को प्रभावी ढंग से रखना उनकी खासियत थी। मरणोपरांत जितना उनको सम्मान मिलना चाहिेए वह नहीं मिला। परिवार के सदस्यों को भी कुछ राहत मिलनी चाहिए थ।
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जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में अलग पहचान रखने वाले मोहन सिंह मूलरूप से नारखी के गांव बरतरा के निवासी थे। पिता ठाकुर हीरा सिंह के दो बेटों में वह छोटे थे। उनका जन्म 15 मार्च 1909 को हुआ। बाल्यावस्था में मोहन सिंह के सिर से माता-पिता का साया उठ गया। वर्ष 1929 में वे कोलकाता गए। वहां 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। जब धर्म तल्ला किले के मैदान में जुलूस पहुंचा तो पुलिस कमिश्नर मिस्टर टेगर ने नेसुभाषचंद्र बोस को तो गिरफ्तार कर लिया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर घोड़े छुड़वा दिए। इसमें काफी संख्या में स्वतंत्रता सेनानी घायल हो गए। नमक सत्याग्रह में भी गांधीजी के निर्देश पर शामिल हुए। कोलकाता से 14 किलोमीटर दूर महेश बघान नामक स्थान पर तीन कैंप चल रहे थे। स्वामी परमोनंद ब्रह्मचारी के संचालन वाले कैंप में वे रहने लगे। ब्रिटिश सेना ने इस कैंप पर हमला कर दिया, इसके बाद ठाकुर मोहन सिंह ने मोर्चा संभाला था। 16 मई 1930 को मछुआ बाजार से नमक बिक्री करते समय उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
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आठ मार्च 1932 को जनरल पोस्ट ऑफिस कोलकाता के सामने प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तारी देने के साथ ही नौ मार्च को छह माह जेल की सजा सुनाई गई। उन्हें सेंट्रल जेल में बंद रहना पड़ा। आजादी के लिए वे सतत संघर्षरत रहे। 1961 में कोटला सहकारी संघ के अध्यक्ष,1962 में कोटला ब्लॉक के प्रमुख चुने गए। 11 वर्ष बाद काफी संघर्ष के साथ दोबारा से ब्लाक प्रमुख चुने गए थे।
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मरणोपरांत जितना सम्मान मिलना चाहिए था वह नहीं मिला
ठाकुर मोहन सिंह के पौत्र विनय प्रताप सिंह कहता हैं कि बाबा ने देश को आजाद होने के बाद जिले के अफसरों के समक्ष हमेशा सही बात कहने में कभी नहीं हिचके थे। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को भी उनका हक दिलाने की लडाई लड़ी थी। अफसरों के समक्ष अपनी बात को प्रभावी ढंग से रखना उनकी खासियत थी। मरणोपरांत जितना उनको सम्मान मिलना चाहिेए वह नहीं मिला। परिवार के सदस्यों को भी कुछ राहत मिलनी चाहिए थ।