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अब नहीं दिखते ठेलों और दुकानों पर रंगों ढेर
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 02 Mar 2017 12:25 AM IST
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दुकानों पर रंगों ढेर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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समय के साथ सभी कुछ संकुचित होता जा रहा है। मान्यताएं और परंपराएं सीमित हो गईं हैं। नगर में जहां होली के 15 दिन पहले से ही रंग-गुलाल के ऊंचे ढेर वालीं दुकानें सज जातीं थीं। वहीं, ठेलों पर रंगों और गुलाल के ढेर लगाकर दुकानदार खरीददारों को आकर्षित करतेे हुए दिखाई देते थे। अब बाजार में ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता।
फाल्गुन मास लगते ही बाजार में दुकानदार 15-20 दिन पहले से ही रंग-गुलाल के ढेर सजाने लगते थे। इन रंगों के प्रदर्शन के लिए दुकानदारों की आपस में होली भी होती थी ताकि रंग पक्के होने का सबूत खरीददार को स्पष्ट दिखायी दे लेकिन अब यह सब होली से मात्र एक-दो दिन पहले ही कुछ एक दुकानों पर ही दिखाई पड़ते हैं। अधिकतर लोग पैकिंग में ब्रांडेड रंग लेना ही पसंद करते हैं। यह ब्रांडेड रंग परचूनी विक्रेता ही अपनी दुकानों पर लाकर रख लेते हैं। इससे ठेलों पर इनकी बिक्री नाममात्र की ही रह गई है।
लोगों का मानना है कि होली के रंगों में मिलावट भी है। गुलाल में रंग मिला हुआ आ रहा है तो वहीं केमिकल युक्त रंग होने पर शरीर पर अपना असर छोड़ जाते हैं। इसी का असर है कि रंगों की बिक्री पर पड़ रहा है। इस दौरान लोग आपस में गुलाल लगा और जौ आदि दे गले मिलना ही अब काफी समझते हैं। यही कारण है कि जो होली पूर्व में दो-दो दिन पड़वा व दौज तक चलती थी वह अब मात्र तीन-चार घंटे की ही सिमटकर रह गयी है।
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फाल्गुन मास लगते ही बाजार में दुकानदार 15-20 दिन पहले से ही रंग-गुलाल के ढेर सजाने लगते थे। इन रंगों के प्रदर्शन के लिए दुकानदारों की आपस में होली भी होती थी ताकि रंग पक्के होने का सबूत खरीददार को स्पष्ट दिखायी दे लेकिन अब यह सब होली से मात्र एक-दो दिन पहले ही कुछ एक दुकानों पर ही दिखाई पड़ते हैं। अधिकतर लोग पैकिंग में ब्रांडेड रंग लेना ही पसंद करते हैं। यह ब्रांडेड रंग परचूनी विक्रेता ही अपनी दुकानों पर लाकर रख लेते हैं। इससे ठेलों पर इनकी बिक्री नाममात्र की ही रह गई है।
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लोगों का मानना है कि होली के रंगों में मिलावट भी है। गुलाल में रंग मिला हुआ आ रहा है तो वहीं केमिकल युक्त रंग होने पर शरीर पर अपना असर छोड़ जाते हैं। इसी का असर है कि रंगों की बिक्री पर पड़ रहा है। इस दौरान लोग आपस में गुलाल लगा और जौ आदि दे गले मिलना ही अब काफी समझते हैं। यही कारण है कि जो होली पूर्व में दो-दो दिन पड़वा व दौज तक चलती थी वह अब मात्र तीन-चार घंटे की ही सिमटकर रह गयी है।
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