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आतंकवाद की हार है कसाब की फांसी
Firozabad
Updated Thu, 22 Nov 2012 12:00 PM IST
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फीरोजाबाद। क्या.. बोले कसाब को फांसी। बात सही है क्या...। नहीं मानते तो टीवी खोलो। फिर क्या था खबर देख बोले चलो ठीक हुआ। आतंकी को सजा मिलनी चाहिए। मुंबई में हुए आतंकी हमले के दोषी अजमल कसाब को सुबह साढ़े सात बजे फांसी देने की खबर से सुहागनगरी के बाशिंदे दस बजे तक अनजान थे। अधिकांश यही बोले कि देर से ही सही लेकिन जो हुआ ठीक हुआ।
नजारा नं. एक
चंद्रवारगेट पुल के समीप। अशोक चाय वालों की दुकान पर रखी टीवी चल रही थी। सवाल किया आपको पता है कि कसाब को फांसी दे दी। नत्थू सिंह चौहान तपाक से बोले मुंबई वाले आतंकी को। यह तो ठीक हुआ। कितने बेकसूर लोग मारे थे। फिल्म को भूलकर लोगों ने समाचारों का चैनल लगा लिया। घड़ी की सुइयां दस बजा रहीं थी।
नजारा नं. दो
पेमेश्वर गेट पुल के समीप घड़ी सवा दस बजा रही थी। सोमदत्त गुप्ता दुकान खोलने जा रहे थे। बुजुर्ग राम भरोसी लालगुप्ता अखबार पढ़ने में मग्न थे। परिवार के अन्य सदस्य मौजूद थे। कसाब को फांसी दे दी गई, शायद सुन नहीं पाए बोले फांसी सरकार को देनी चाहिए, लेकिन बचाने के प्रयास हो रहे हैं। जब बताया फांसी दे दी गई। बोले कब। आज सुबह। हमें नहीं पता, यह ठीक हुआ।
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नजारा नं. तीन
स्थान हुंडावाला चौक, सचिन शर्मा चूड़ी की गद्दी पर बैठे थे। निकट बैठे रामरतन स्वर्णकार अखबार की खबरों में नजर गढ़ाए हुए थे। सामने बैठे उमेशचंद्र शर्मा भी कुछ तर्क दे रहे थे। बाइक देख बोले मीडिया वाले कैसे घूम रहे हैं। जवाब मिला कसाब को फांसी दे दी गई। सचिन तेज आवाज में बोले हमें पता है ठीक हुआ। देशद्रोहियों को इसी तरह फांसी देनी चाहिए।
नजारा नं. चार
स्थान बगिया मोहल्ला। चूड़ी का गोदाम खुलता जा रहा था। एक दुकान पर तीन लोग कुर्सियों पर जमे थे। परिचय के साथ सवाल किया कि अजमल कसाब को फांसी दे दी गई। चौंके बोले कब। अखबारों में तो आया नहीं। अमर उजाला और उर्दू का अखबार उठाकर देखा। अब्दुल हक अंसारी बोले दोषी को सजा तो मिलनी चाहिए। शफीक अहमद, नौशे अंसारी, सगीर अहमद अंसारी, मोहम्मद असलम की नजरें टीवी पर लग गईं।
नजारा नं. पांच
स्थान सदर बाजार। आठ बजे जैसे ही समाचार देखने को टीवी खोली तो चौंक गया। कसाब को फांसी देने की ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी। हम यही बोले चलो ठीक हुआ। गलत लोगों को सजा मिलनी चाहिए। यह कहना था महेंद्र जैन का। शूट बिक्री करने वाले राकेश अग्रवाल इस पूरे घटनाक्रम से अनजान थे। वे यही बोले क्या वास्तव में फांसी दे दी गई। हमें तो पता ही नहीं था।
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नजारा नं. एक
चंद्रवारगेट पुल के समीप। अशोक चाय वालों की दुकान पर रखी टीवी चल रही थी। सवाल किया आपको पता है कि कसाब को फांसी दे दी। नत्थू सिंह चौहान तपाक से बोले मुंबई वाले आतंकी को। यह तो ठीक हुआ। कितने बेकसूर लोग मारे थे। फिल्म को भूलकर लोगों ने समाचारों का चैनल लगा लिया। घड़ी की सुइयां दस बजा रहीं थी।
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नजारा नं. दो
पेमेश्वर गेट पुल के समीप घड़ी सवा दस बजा रही थी। सोमदत्त गुप्ता दुकान खोलने जा रहे थे। बुजुर्ग राम भरोसी लालगुप्ता अखबार पढ़ने में मग्न थे। परिवार के अन्य सदस्य मौजूद थे। कसाब को फांसी दे दी गई, शायद सुन नहीं पाए बोले फांसी सरकार को देनी चाहिए, लेकिन बचाने के प्रयास हो रहे हैं। जब बताया फांसी दे दी गई। बोले कब। आज सुबह। हमें नहीं पता, यह ठीक हुआ।
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नजारा नं. तीन
स्थान हुंडावाला चौक, सचिन शर्मा चूड़ी की गद्दी पर बैठे थे। निकट बैठे रामरतन स्वर्णकार अखबार की खबरों में नजर गढ़ाए हुए थे। सामने बैठे उमेशचंद्र शर्मा भी कुछ तर्क दे रहे थे। बाइक देख बोले मीडिया वाले कैसे घूम रहे हैं। जवाब मिला कसाब को फांसी दे दी गई। सचिन तेज आवाज में बोले हमें पता है ठीक हुआ। देशद्रोहियों को इसी तरह फांसी देनी चाहिए।
नजारा नं. चार
स्थान बगिया मोहल्ला। चूड़ी का गोदाम खुलता जा रहा था। एक दुकान पर तीन लोग कुर्सियों पर जमे थे। परिचय के साथ सवाल किया कि अजमल कसाब को फांसी दे दी गई। चौंके बोले कब। अखबारों में तो आया नहीं। अमर उजाला और उर्दू का अखबार उठाकर देखा। अब्दुल हक अंसारी बोले दोषी को सजा तो मिलनी चाहिए। शफीक अहमद, नौशे अंसारी, सगीर अहमद अंसारी, मोहम्मद असलम की नजरें टीवी पर लग गईं।
नजारा नं. पांच
स्थान सदर बाजार। आठ बजे जैसे ही समाचार देखने को टीवी खोली तो चौंक गया। कसाब को फांसी देने की ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी। हम यही बोले चलो ठीक हुआ। गलत लोगों को सजा मिलनी चाहिए। यह कहना था महेंद्र जैन का। शूट बिक्री करने वाले राकेश अग्रवाल इस पूरे घटनाक्रम से अनजान थे। वे यही बोले क्या वास्तव में फांसी दे दी गई। हमें तो पता ही नहीं था।