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आज लेखनी लेलो मेरी, हाथों में भाला दो
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Gosthi
- फोटो : amar ujala
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शिकोहाबाद। साहित्यकार स्मृति सम्मान समिति ने सोमवार को नगर के साहित्य मनीषियों की स्मृति में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन ब्लूमिंग बड्स पब्लिक स्कूल में किया। जिसमें शहीदों की याद में कवियों ने अपनी रचनाएं पढ़ीं। अध्यक्षता कन्नौज के वरिष्ठ कवि विश्वनाथ द्विवेदी ने की।
कवि सम्मेलन का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर किया। इसके बाद गीतकार शिव सागर शर्मा ने पढ़ा- आलिंगन को व्याकुल हैं, चारों मीनारें ताज की, दो वाहें शाहजहां की हैं, दो बहियां हैं मुमताज की। नगर के कवि ब्रह्मानंद झा ने शहीदों को नमन किया- आज रात को स्वर्ग से आई ये आवाज, एक बार मौका मुझे दे दे धोखेबाज।
बुलंदशहर के कवि डॉ. आलोक बेजान ने कहा- जिसकी जो भी हद में उसी हद में रहेगा, कोई धोती में रहेगा, कोई तहमद में रहेगा। ये तय हुआ कि बागी तो चंबल में रहेंगे, डाकू तो कहीं का भी हो संसद में रहेगा। व्यंग्य कार प्रशांत उपाध्याय ने कहा- अब न इसे जरूरत है दया की, क्षमा की या प्यार की बोली की, इसे जरूरत है सिर्फ सीने पर गोली की। डॉ. मुकेश मणिकांचन ने पढ़ा- फूलों की अब नहीं मुझे तुम शूलों की माला दो, आज लेखनी लेलो मेरी, हाथों में भाला दो।
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दिल्ली से आए अरविंद पथिक ने पढ़ा जब तक है भारत टुकड़ों में तोष नहीं कर लेना, खंडित भारत भू से ही संतोष नहीं कर लेना। डॉ. राजकुमार रंजन, हरिश्चंद्र, कृपाशंकर शर्मा शूल, विजय चतुर्वेदी, यतीश चतुर्वेदी, महेश चंद्र मिश्रा और गिरीश चंद्र जैन आदि ने काव्य पाठ किया। संचालन प्रशांत उपाध्याय ने किया।
इस अवसर पर साहित्य प्रकाश दीक्षित, ब्रह्मानंद झा, राजबहादुर उपाध्याय, सोनम पालीवाल,प्रशांत चतुर्वेदी, क्रांति शर्मा, मुकेश बाबू मौजूद रहे। राज पचौरी ने आभार जताया।
फोटो
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कवि सम्मेलन का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर किया। इसके बाद गीतकार शिव सागर शर्मा ने पढ़ा- आलिंगन को व्याकुल हैं, चारों मीनारें ताज की, दो वाहें शाहजहां की हैं, दो बहियां हैं मुमताज की। नगर के कवि ब्रह्मानंद झा ने शहीदों को नमन किया- आज रात को स्वर्ग से आई ये आवाज, एक बार मौका मुझे दे दे धोखेबाज।
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बुलंदशहर के कवि डॉ. आलोक बेजान ने कहा- जिसकी जो भी हद में उसी हद में रहेगा, कोई धोती में रहेगा, कोई तहमद में रहेगा। ये तय हुआ कि बागी तो चंबल में रहेंगे, डाकू तो कहीं का भी हो संसद में रहेगा। व्यंग्य कार प्रशांत उपाध्याय ने कहा- अब न इसे जरूरत है दया की, क्षमा की या प्यार की बोली की, इसे जरूरत है सिर्फ सीने पर गोली की। डॉ. मुकेश मणिकांचन ने पढ़ा- फूलों की अब नहीं मुझे तुम शूलों की माला दो, आज लेखनी लेलो मेरी, हाथों में भाला दो।
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दिल्ली से आए अरविंद पथिक ने पढ़ा जब तक है भारत टुकड़ों में तोष नहीं कर लेना, खंडित भारत भू से ही संतोष नहीं कर लेना। डॉ. राजकुमार रंजन, हरिश्चंद्र, कृपाशंकर शर्मा शूल, विजय चतुर्वेदी, यतीश चतुर्वेदी, महेश चंद्र मिश्रा और गिरीश चंद्र जैन आदि ने काव्य पाठ किया। संचालन प्रशांत उपाध्याय ने किया।
इस अवसर पर साहित्य प्रकाश दीक्षित, ब्रह्मानंद झा, राजबहादुर उपाध्याय, सोनम पालीवाल,प्रशांत चतुर्वेदी, क्रांति शर्मा, मुकेश बाबू मौजूद रहे। राज पचौरी ने आभार जताया।
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