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फल, फूल अर्पित कर महागौरी की पूजा
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फतेहपुर। चैत्र नवरात्र के आठवें दिन मां दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा हुई। भक्तों ने घर में ही मां दुर्गा के स्थापित किए गए कलश के पास दीपक जलाकर फल, फूल और नैवेद्य अर्पित किए। इस बार कन्याभोज व लंगर के आयोजन नहीं कराए गए। इसके बदले भक्तों ने गरीबों को भोजन बांटा, कन्याओं को उनके आवास जाकर मां का प्रसाद और मुद्राएं दीं। कई महिला व पुरुषों ने अष्टमी का व्रत भी रखा।
मान्यता है कि सच्चे मन से अगर महागौरी को पूजा जाए तो सभी संचित पाप नष्ट हो जाते हैं और भक्त को अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती हैं। महागौरी की पूजा के बाद कन्या पूजन का विधान है। इसमें नौ कन्याओं को घर में बुलाकर उनको माता का प्रसाद खिलाया जाता है, लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण की वजह से भक्तों ने मां दुर्गा की पूजा अर्चना घर में ही कर ली है।
नौ कन्याओं को खिलाने की बजाय गरीबों में दान किया। कन्याओं को घर में न बुलाकर अलग-अलग स्थान पर पहुंचकर उन्हें प्रसाद दिया और साथ में मुद्राएं दीं। आचार्य दुर्गादत्त शास्त्री कहते हैं कि महागौरी ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है।
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देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान उन्हें स्वीकार करते हैं और उनके शरीर को गंगाजल से धोते हैं। ऐसा करने से देवी अत्यंत कांतिमान और गौर वर्ण की हो जाती हैं। तभी से उनका नाम गौरी पड़ गया। महागौरी का वर्ण एकदम सफेद है। इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद रंग के हैं।
इसलिए श्वेताम्बरधरा भी कहा जाता है। इनकी चार भुजाएं हैं। उनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा है और नीचे वाले हाथ में त्रिशूल है। मां ने ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू धारण किया हुआ है और नीचे वाला हाथ वर मुद्रा है। मां सिंह की सवारी भी करती हैं।
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मान्यता है कि सच्चे मन से अगर महागौरी को पूजा जाए तो सभी संचित पाप नष्ट हो जाते हैं और भक्त को अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती हैं। महागौरी की पूजा के बाद कन्या पूजन का विधान है। इसमें नौ कन्याओं को घर में बुलाकर उनको माता का प्रसाद खिलाया जाता है, लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण की वजह से भक्तों ने मां दुर्गा की पूजा अर्चना घर में ही कर ली है।
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नौ कन्याओं को खिलाने की बजाय गरीबों में दान किया। कन्याओं को घर में न बुलाकर अलग-अलग स्थान पर पहुंचकर उन्हें प्रसाद दिया और साथ में मुद्राएं दीं। आचार्य दुर्गादत्त शास्त्री कहते हैं कि महागौरी ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है।
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देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान उन्हें स्वीकार करते हैं और उनके शरीर को गंगाजल से धोते हैं। ऐसा करने से देवी अत्यंत कांतिमान और गौर वर्ण की हो जाती हैं। तभी से उनका नाम गौरी पड़ गया। महागौरी का वर्ण एकदम सफेद है। इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद रंग के हैं।
इसलिए श्वेताम्बरधरा भी कहा जाता है। इनकी चार भुजाएं हैं। उनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा है और नीचे वाले हाथ में त्रिशूल है। मां ने ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू धारण किया हुआ है और नीचे वाला हाथ वर मुद्रा है। मां सिंह की सवारी भी करती हैं।