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हजरत इब्राहीम की सुन्नत है बकरीद
Fatehpur
Updated Mon, 06 Oct 2014 05:32 AM IST
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फतेहपुर। ईद-उल-जुहा का महीना इस्लामी कैलेंडर का आखिरी महीना है। कुरबानी हजरत इब्राहीम की सुन्नत है। हुजूर पाक ने फरमाया है कि खुशदिली के साथ कुरबानी पेश किया करो। सहाबा के पूछने पर कहा कि कुरबानी, ‘तुम्हारे पुरखों की सुन्नत है’। कुरान पाक में कुरबानी का जिक्र है। शहरकाजी शहीदुल इस्लाम अब्दुल्ला ने बताया कि हजरत इब्राहीम को अल्लाहताला ने ख्वाब में बशारत दी कि अल्लाह की राह में अपनी सबसे प्यारी चीज को कुरबान करो। हजरत इब्राहीम ने अगले दिन सुबह सौ ऊंटों की कुरबानी दी। इसके बाद दूसरे दिन भी वही ख्वाब दिखाई दिया तो उन्होंने अगले दिन सौ दुंबों (भेड़ों) की कुरबानी दी। इसके बाद भी ख्वाब दिखाई दिया कि सबसे प्यारी चीज की कुरबानी पेश करो। लगातार तीन दिनों तक ख्वाब देखने के बाद हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अगली सुबह उठकर अपनी चहेती औलाद हजरत इस्माइल अलैहिस्सलाम की कुरबानी देने का मन बनाया। यह बात उन्होंने अपने पुत्र हजरत इस्माइल से बताई तो वह राजी हो गए और कहा कि ऐसा न हो कि उनकी कुरबानी देते वक्त व हिचकिचाएं। इसलिए आंखों में पट्टी बांध लें। ऐसा ही किया और उन्होंने अपने बेटे की कुरबानी के लिए जैसे ही छुरी चलाई, उनकी जगह पर जन्नत से दुंबा (भेड़) आ गया। आंख से पट्टी उतारी तो देखा हजरत इस्माइल अलग खड़े थे और दुंबे की कुरबानी हो गई थी। इस तरह से अल्लाहताला ने उनका इम्तिहान लिया और यह दिखाया गया कि अल्लाह की राह में सबकुछ कुरबान रखने का जज्बा मुसलमानों में होना चाहिए। कुरबानी वाले जानवर के शरीर में हरेक बाल के बदले में कुरबानी कराने वाले को नेकी मिलती है। इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम में हजरत इमाम हुसैन ने अपने साथियों समेत कुरबानी दी तो आखिरी महीने बकरीद में भी कुरबानी दी गई।
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