{"_id":"675f044401faaae02e0f484b","slug":"within-14-days-the-enemies-had-surrendered-before-the-brave-men-farrukhabad-news-c-222-1-ka11004-118639-2024-12-15","type":"story","status":"publish","title_hn":"Farrukhabad News: जांबाजों के आगे 14 दिन में ही दुश्मनों ने टेक दिए थे घुटने","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Farrukhabad News: जांबाजों के आगे 14 दिन में ही दुश्मनों ने टेक दिए थे घुटने
विज्ञापन
विजय दिवस पर विशेष...
-युद्ध के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी देश की सेना ने अपने पराक्रम से सिर्फ इतिहास ही नहीं रचा, बल्कि दुनिया के नक्शे पर एक नए देश बांग्लादेश का उदय कर भूगोल को भी बदल दिया। वर्ष 1971 में तीन से 16 दिसंबर यानी मात्र 14 दिनों की इस लड़ाई में भारतीय सैन्य रणनीति और सैनिकों के बुलंद हौसलों की वजह से 93 हजार से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। दुनिया के युद्ध इतिहास का यह एक अविस्मरणीय दिन बन गया। जिसे भारतीय सेना विजय दिवस के रूप में मनाती है।
फर्रुखाबाद। भारतीय सेवा के जवानों ने अपनी बेमिसाल बहादुरी और शहादत से 1971 के युद्ध में 14 दिन में ही पाकिस्तान सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। युद्ध में फतेहगढ़ स्थित सिखलाई रेजिमेंट के 102 जवान और अफसर शहीद हुए थे।
भारतीय सैनिकों की दिलेरी और बलिदान की बदौलत ही 16 दिसंबर को ढाका में 93 हजार पाकिस्तानी फौजियों ने लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने हथियार डाले थे। फतेहगढ़ स्थित सिखलाई रेजिमेंट की कई यूनिटों ने 1971 के ऐतिहासिक युद्ध में भाग लिया था। रेजिमेंट के बहादुर अफसर और जवानों ने कई मोर्चाें पर पाक सेना को धूल चटाकर बांग्लादेश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।
विज्ञापन
लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के नेतृत्व में पाक सेना पर भारतीय जवान मौत बनकर टूट पड़े थे। सिखलाई रेजिमेंट की आठवीं व 10वीं यूनिट के जवानों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए फतेहपुर और पर्वतअली सेक्टर को कब्जे में लेकर पाक सेना की कमर तोड़ दी थी। वहीं सातवीं रेजिमेंट ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जय श्री पोस्ट पर कब्जा कर बहादुरी की मिसाल पेश की। सिखलाईट रेजिमेंट के 102 जवान युद्ध में शहीद हुए थे। इनमें 32 जवान पूर्वी सेक्टर में दुश्मन की फौज पर भारी पड़े। इसके अतिरिक्त सैकड़ों जवान घायल भी हुए थे।
बहादुरी की कहानी सुनाता है वॉर मेमोरियल
सिखलाई रेजिमेंट सेंटर के संग्रहालय में 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना से बरामद किया गया सामान बड़े जतन से रखा गया है। इसे देखकर युद्ध में भारतीय सेना के जवानों की बहादुरी का अंदाजा लगाया जा सकता है। जंग के दौरान पाकिस्तानी बंकर में सन 1357 में छपी कुरान शरीफ के अलावा टेलीफोन, कुफरी, सड़क के नक्शे प्रदर्शित किए गए हैं।
पूर्वी व पश्चिमी क्षेत्र में लड़ा गया था युद्ध
वर्ष 1971 का युद्ध मुख्य रूप से पूर्वी और पश्चिम क्षेत्र में लड़ा गया था। पूर्वी क्षेत्र में सिखलाई रेजिमेंट की दूसरी, चौथी और छठी यूनिट के जवान तैनात किए गए थे। ब्रिगेडियर संत सिंह की अगुवाई में जवानों ने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए थे। अदम्य साहस के धनी ब्रिगेडियर संत सिंह भारतीय सैनिकों के साथ ढाका तक जा पहुंचे थे। सरकार ने उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया था। 1965 की लड़ाई में अपनी बहादुरी के लिए उन्हें पहली बार महावीर चक्र मिला था। सैन्य अधिकारियों की माने तो युद्ध के दौरान पाक फौजियों के बंकरों से काफी तादाद में सामान बरामद किया गया था। यह सामान फतेहगढ़ स्थित संग्रहालय में यहां आने वाले दर्शकों को भारतीय सैनिकों की बहादुरी को याद दिलाता है।
विज्ञापन
-युद्ध के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी देश की सेना ने अपने पराक्रम से सिर्फ इतिहास ही नहीं रचा, बल्कि दुनिया के नक्शे पर एक नए देश बांग्लादेश का उदय कर भूगोल को भी बदल दिया। वर्ष 1971 में तीन से 16 दिसंबर यानी मात्र 14 दिनों की इस लड़ाई में भारतीय सैन्य रणनीति और सैनिकों के बुलंद हौसलों की वजह से 93 हजार से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। दुनिया के युद्ध इतिहास का यह एक अविस्मरणीय दिन बन गया। जिसे भारतीय सेना विजय दिवस के रूप में मनाती है।
फर्रुखाबाद। भारतीय सेवा के जवानों ने अपनी बेमिसाल बहादुरी और शहादत से 1971 के युद्ध में 14 दिन में ही पाकिस्तान सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। युद्ध में फतेहगढ़ स्थित सिखलाई रेजिमेंट के 102 जवान और अफसर शहीद हुए थे।
विज्ञापन
भारतीय सैनिकों की दिलेरी और बलिदान की बदौलत ही 16 दिसंबर को ढाका में 93 हजार पाकिस्तानी फौजियों ने लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने हथियार डाले थे। फतेहगढ़ स्थित सिखलाई रेजिमेंट की कई यूनिटों ने 1971 के ऐतिहासिक युद्ध में भाग लिया था। रेजिमेंट के बहादुर अफसर और जवानों ने कई मोर्चाें पर पाक सेना को धूल चटाकर बांग्लादेश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।
विज्ञापन
लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के नेतृत्व में पाक सेना पर भारतीय जवान मौत बनकर टूट पड़े थे। सिखलाई रेजिमेंट की आठवीं व 10वीं यूनिट के जवानों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए फतेहपुर और पर्वतअली सेक्टर को कब्जे में लेकर पाक सेना की कमर तोड़ दी थी। वहीं सातवीं रेजिमेंट ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जय श्री पोस्ट पर कब्जा कर बहादुरी की मिसाल पेश की। सिखलाईट रेजिमेंट के 102 जवान युद्ध में शहीद हुए थे। इनमें 32 जवान पूर्वी सेक्टर में दुश्मन की फौज पर भारी पड़े। इसके अतिरिक्त सैकड़ों जवान घायल भी हुए थे।
बहादुरी की कहानी सुनाता है वॉर मेमोरियल
सिखलाई रेजिमेंट सेंटर के संग्रहालय में 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना से बरामद किया गया सामान बड़े जतन से रखा गया है। इसे देखकर युद्ध में भारतीय सेना के जवानों की बहादुरी का अंदाजा लगाया जा सकता है। जंग के दौरान पाकिस्तानी बंकर में सन 1357 में छपी कुरान शरीफ के अलावा टेलीफोन, कुफरी, सड़क के नक्शे प्रदर्शित किए गए हैं।
पूर्वी व पश्चिमी क्षेत्र में लड़ा गया था युद्ध
वर्ष 1971 का युद्ध मुख्य रूप से पूर्वी और पश्चिम क्षेत्र में लड़ा गया था। पूर्वी क्षेत्र में सिखलाई रेजिमेंट की दूसरी, चौथी और छठी यूनिट के जवान तैनात किए गए थे। ब्रिगेडियर संत सिंह की अगुवाई में जवानों ने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए थे। अदम्य साहस के धनी ब्रिगेडियर संत सिंह भारतीय सैनिकों के साथ ढाका तक जा पहुंचे थे। सरकार ने उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया था। 1965 की लड़ाई में अपनी बहादुरी के लिए उन्हें पहली बार महावीर चक्र मिला था। सैन्य अधिकारियों की माने तो युद्ध के दौरान पाक फौजियों के बंकरों से काफी तादाद में सामान बरामद किया गया था। यह सामान फतेहगढ़ स्थित संग्रहालय में यहां आने वाले दर्शकों को भारतीय सैनिकों की बहादुरी को याद दिलाता है।