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Farrukhabad News: आग बुझाने तक के नहीं रहते इंतजाम
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फर्रुखाबाद। स्लीपर बसों में बनी अमानक डिकी और छतों पर 50-50 क्विंटल तक बिना बिल वाउचर वाला माल ढोया जाता है। इनमें आग बुझाने के भी पर्याप्त इंतजाम नहीं होते हैं। इसके चलते ही आग लगते ही बस आग का गोला बन जाती है। थाने के सामने से गुजरती बसें किसी को भी नहीं दिखाई देतीं।
शहर के आईटीआई चौराहे से स्लीपर बसों का मुख्य रूप से संचालन होता है। यह बसें जिले के जिले के अधिकांश कस्बों के साथ हरदोई, शाहजहांपुर से भी संचालित होकर कादरीगेट, आईटीआई से गुजरती हैं। बसें यात्रियों के साथ बड़ी मात्रा में व्यापारिक सामान को ढोने का काम करती हैं। इन बसों के नीचे अमानक बड़ी डिकी बनी हैं। छत पर भी सामान भरकर जिले में लाया जाता है। इनमें कपड़ा, प्लास्टिक का सामान भी शामिल होता है। यही कारण है कि बस में आग की दुर्घटना होने के बाद बस चंद मिनट में ही आग का गोला का रूप ले लेती हैं। संकरी गैलरी, आगे की ओर एकमात्र निकास, पीछे दो-ढाई फीट की खिड़की आपातकाल में यात्रियों के निकलने के लिए नाकाफी साबित होती है। जनहानि की यही मुख्य वजह भी है। जानकार बताते हैं कि फोन से बुक होने वाला सामान दिल्ली और जयपुर में लगे एजेंटों के जरिये बसों तक पहुंचा दिया जाता है। माल के साथ उसका मालिक नहीं होता। अधिकांश सामान दो नंबर में ही लाया जाता है।
तीन-तीन सौ किमी हाईवे और राज्यमार्गों से होकर यहां तक पहुंचने वाली बसों की छतों पर लदा माल किसी भी जिम्मेदार को नहीं दिखता।
दिल्ली व जयपुर से ग्रामीण क्षेत्रों में खुले बुकिंग काउंटर
स्लीपर बसों के संचालकों के दिल्ली व जयपुर में 10-10 स्थानों पर बुकिंग काउंटर खुले हैं। वहां वेतनभोगी कर्मचारी तैनात हैं। यही नहीं जिले के अधिकांश स्टॉपेज पर भी बुकिंग काउंटर खुले हैं। शहर के रोडवेज बस अड्डा, आईटीआई, कादरीगेट चौराहा पर भी सड़क किनारे बुकिंग काउंटर चल रहे हैं।
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आग बुझाने के संयंत्रों में भी खानापूरी
अधिकांश बसों में आग बुझाने के संयंत्रों की भी व्यवस्था नहीं है। पांच-पांच किलो वाले संयंत्र होने के मानक के विपरीत दो-चार बसों में छोटे संयंत्र हैं। एक्सपायर होने के बाद भी इन्हें दोबारा नहीं भरवाया जाता। आग पर काबू न पाने में यह भी मुख्य वजह रहती है।
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शहर के आईटीआई चौराहे से स्लीपर बसों का मुख्य रूप से संचालन होता है। यह बसें जिले के जिले के अधिकांश कस्बों के साथ हरदोई, शाहजहांपुर से भी संचालित होकर कादरीगेट, आईटीआई से गुजरती हैं। बसें यात्रियों के साथ बड़ी मात्रा में व्यापारिक सामान को ढोने का काम करती हैं। इन बसों के नीचे अमानक बड़ी डिकी बनी हैं। छत पर भी सामान भरकर जिले में लाया जाता है। इनमें कपड़ा, प्लास्टिक का सामान भी शामिल होता है। यही कारण है कि बस में आग की दुर्घटना होने के बाद बस चंद मिनट में ही आग का गोला का रूप ले लेती हैं। संकरी गैलरी, आगे की ओर एकमात्र निकास, पीछे दो-ढाई फीट की खिड़की आपातकाल में यात्रियों के निकलने के लिए नाकाफी साबित होती है। जनहानि की यही मुख्य वजह भी है। जानकार बताते हैं कि फोन से बुक होने वाला सामान दिल्ली और जयपुर में लगे एजेंटों के जरिये बसों तक पहुंचा दिया जाता है। माल के साथ उसका मालिक नहीं होता। अधिकांश सामान दो नंबर में ही लाया जाता है।
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तीन-तीन सौ किमी हाईवे और राज्यमार्गों से होकर यहां तक पहुंचने वाली बसों की छतों पर लदा माल किसी भी जिम्मेदार को नहीं दिखता।
दिल्ली व जयपुर से ग्रामीण क्षेत्रों में खुले बुकिंग काउंटर
स्लीपर बसों के संचालकों के दिल्ली व जयपुर में 10-10 स्थानों पर बुकिंग काउंटर खुले हैं। वहां वेतनभोगी कर्मचारी तैनात हैं। यही नहीं जिले के अधिकांश स्टॉपेज पर भी बुकिंग काउंटर खुले हैं। शहर के रोडवेज बस अड्डा, आईटीआई, कादरीगेट चौराहा पर भी सड़क किनारे बुकिंग काउंटर चल रहे हैं।
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आग बुझाने के संयंत्रों में भी खानापूरी
अधिकांश बसों में आग बुझाने के संयंत्रों की भी व्यवस्था नहीं है। पांच-पांच किलो वाले संयंत्र होने के मानक के विपरीत दो-चार बसों में छोटे संयंत्र हैं। एक्सपायर होने के बाद भी इन्हें दोबारा नहीं भरवाया जाता। आग पर काबू न पाने में यह भी मुख्य वजह रहती है।