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नीति आयोग की इबारत बनी हिमांशु की प्राकृतिक खेती
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चंद्रशेखर आजाद विश्व विद्यालय कानपुर में हिमांशु गंगवार को सम्मानित करते कृषि मंत्री सूर्य प्र?
- फोटो : FARRUKHABAD
फर्रुखाबाद। काम कोई भी हो, यदि मेहनत और लगन से किया जाए तो नाम रोशन हो ही जाता है। शमसाबाद के क्षेत्र के गांव कुइयां धीर निवासी हिमांशु और सुधांशु ने भी मेहनत व लगन से प्राकृतिक खेती की सफलता का उदाहरण पेश किया है। दोनों भाइयों की इबारत नीति आयोग के पन्नों पर लिखी गई और उन्हें कृषि मंत्री से सम्मान भी मिला।
समाज की भले ही यह सोच हो कि खेती कम पढ़े-लिखे लोग मजबूरी में करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। शमसाबाद क्षेत्र के गांव कुइयांधीर निवासी हिमांशु गंगवार ने मेकेनिकल इंजीनियर की नौकरी छोड़कर अपने स्नातक भाई सुधांशु गंगवार के सहयोग से प्राकृतिक खेती कर जिले का नाम रोशन कर दिया है। वे प्राकृतिक खेती से अच्छी आय करने के साथ गोवंश सेवा, पर्यावरण और जल का संरक्षण भी कर रहे हैं।
दोनों जुड़वा भाई प्राकृतिक खेती के लिए 2020 में विशिष्ट कृषक का पुरस्कार पा चुके हैं और वे इसका प्रशिक्षण देकर किसानों को उन्नति की राह दिखा रहे हैं। सफलता का आसमान इस तरह छुआ कि दोनों भाइयों की कहानी नीति आयोग ने अपनी किताब में लिखी है।
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जो एक इबारत बन गई है। 13 मई को चंद्रशेखर कृषि विश्वविद्यालय कानपुर में कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही ने कृषि नवाचार एवं प्राकृतिक खेती में उत्कृष्ट योजना के लिए हिमांशु गंगवार को श्रेष्ठ कृषक पुरस्कार से सम्मानित किया।
हिमांशु गंगवार ने बताया कि उनके पास 100 बीघा खेत हैं। वर्ष 2000 में उन्होंने जैविक खेती शुरू की तो अधूरी जानकारी होने से फेल हो गए। 2009 में कानपुर में लगे शिविर में उनकी मुलाकात सुभाष पालेकर से हुई। शिविर में प्रशिक्षण लेकर प्राकृतिक खेती शुरू की। देसी गाय के गोबर और मूत्र से वह जीवामृत और धन जीवामृत बनाते हैं। यह फसलों में खाद व कीटनाशक का काम करता है। इससे फसल को नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश व सभी सूक्ष्म तत्व मिल जाते हैं और कोई बीमारी भी नहीं लगती है। इस खाद से होने वाली फसल से उपज भी अधिक होती है। बाजार भाव भी अच्छा मिलने से आय भी अधिक होती है।
हिमांशु ने बताया कि उन्होंने गोमूत्र व गोबर से जीवामृत, धन जीवामृत बनाने के लिए निराश्रित 28 गोवंश पाल रखे हैं। प्राकृतिक खेती में वह मुख्य रूप से गन्ना, पपीता आदि फसल करते हैं। गन्ना में मूंग और हल्दी, पपीता में अदरक, हल्दी व अरहर की सहफसल भी लेते हैं। इसके अलावा जौ, गेहूं, जई की फसलें भी करते हैं। वह सबसे स्वादिष्ट कुफरी चंद्रमुखी आलू की खेती करते हैं। वह आलू 3500 रुपये प्रति क्विंटल बिकने से अच्छी आय देता है। प्राकृतिक खेती के गन्ने से वह आर्गेनिक गुड़ बनाते हैं जो सामान्य गुड़ से काफी महंगा बिकता है। बताया कि प्रदेश में लोक भारती संस्थान के सहयोग से 20 शिविर लगाकर 2000 किसानों को वह प्रशिक्षण दे चुके हैं। 25 अप्रैल को नीति आयोग दिल्ली में उन्हें बुलाया गया था। वहां उन्होंने किसानों को प्रशिक्षण दिया था। वहीं से उनका चयन किया गया और उनकी कहानी नीति आयोग की किताब में लिखी गई है।
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समाज की भले ही यह सोच हो कि खेती कम पढ़े-लिखे लोग मजबूरी में करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। शमसाबाद क्षेत्र के गांव कुइयांधीर निवासी हिमांशु गंगवार ने मेकेनिकल इंजीनियर की नौकरी छोड़कर अपने स्नातक भाई सुधांशु गंगवार के सहयोग से प्राकृतिक खेती कर जिले का नाम रोशन कर दिया है। वे प्राकृतिक खेती से अच्छी आय करने के साथ गोवंश सेवा, पर्यावरण और जल का संरक्षण भी कर रहे हैं।
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दोनों जुड़वा भाई प्राकृतिक खेती के लिए 2020 में विशिष्ट कृषक का पुरस्कार पा चुके हैं और वे इसका प्रशिक्षण देकर किसानों को उन्नति की राह दिखा रहे हैं। सफलता का आसमान इस तरह छुआ कि दोनों भाइयों की कहानी नीति आयोग ने अपनी किताब में लिखी है।
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जो एक इबारत बन गई है। 13 मई को चंद्रशेखर कृषि विश्वविद्यालय कानपुर में कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही ने कृषि नवाचार एवं प्राकृतिक खेती में उत्कृष्ट योजना के लिए हिमांशु गंगवार को श्रेष्ठ कृषक पुरस्कार से सम्मानित किया।
हिमांशु गंगवार ने बताया कि उनके पास 100 बीघा खेत हैं। वर्ष 2000 में उन्होंने जैविक खेती शुरू की तो अधूरी जानकारी होने से फेल हो गए। 2009 में कानपुर में लगे शिविर में उनकी मुलाकात सुभाष पालेकर से हुई। शिविर में प्रशिक्षण लेकर प्राकृतिक खेती शुरू की। देसी गाय के गोबर और मूत्र से वह जीवामृत और धन जीवामृत बनाते हैं। यह फसलों में खाद व कीटनाशक का काम करता है। इससे फसल को नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश व सभी सूक्ष्म तत्व मिल जाते हैं और कोई बीमारी भी नहीं लगती है। इस खाद से होने वाली फसल से उपज भी अधिक होती है। बाजार भाव भी अच्छा मिलने से आय भी अधिक होती है।
हिमांशु ने बताया कि उन्होंने गोमूत्र व गोबर से जीवामृत, धन जीवामृत बनाने के लिए निराश्रित 28 गोवंश पाल रखे हैं। प्राकृतिक खेती में वह मुख्य रूप से गन्ना, पपीता आदि फसल करते हैं। गन्ना में मूंग और हल्दी, पपीता में अदरक, हल्दी व अरहर की सहफसल भी लेते हैं। इसके अलावा जौ, गेहूं, जई की फसलें भी करते हैं। वह सबसे स्वादिष्ट कुफरी चंद्रमुखी आलू की खेती करते हैं। वह आलू 3500 रुपये प्रति क्विंटल बिकने से अच्छी आय देता है। प्राकृतिक खेती के गन्ने से वह आर्गेनिक गुड़ बनाते हैं जो सामान्य गुड़ से काफी महंगा बिकता है। बताया कि प्रदेश में लोक भारती संस्थान के सहयोग से 20 शिविर लगाकर 2000 किसानों को वह प्रशिक्षण दे चुके हैं। 25 अप्रैल को नीति आयोग दिल्ली में उन्हें बुलाया गया था। वहां उन्होंने किसानों को प्रशिक्षण दिया था। वहीं से उनका चयन किया गया और उनकी कहानी नीति आयोग की किताब में लिखी गई है।