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नलकूप विभाग से पत्रावलियां ले गई जांच टीम
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फर्रुखाबाद। राजकीय नलकूप विभाग में लेखाकार के बिना हस्ताक्षर के करोड़ों के भुगतान के मामले में शासन से आई जांच टीम ने बुधवार को तीसरे दिन भी रिकार्ड खंगाले। इसके बाद पत्रावलियां कब्जे में लेकर वापस लखनऊ चली गई। बताया जा रहा है कि जांच में मामला फंसना तय है।
वित्तीय वर्ष के अंतिम माह में बजट खर्च करने के चक्कर में राजकीय नलकूप विभाग में लेखाकार के बिना हस्ताक्षर के करोड़ों का भुगतान कर दिया गया था। यह मामला शासन तक पहुंचने के बाद सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग के वित्त नियंत्रक राजीव कुमार सिंह ने चार सदस्यीय जांच टीम गठित की। सहायक लेखाधिकारी हीरालाल की अध्यक्षता में लेखाकार शिवकुमार, मुरारी मोहन श्रीवास्तव व राकेश कुमार ने सोमवार को नलकूप विभाग पहुंचकर जांच शुरू की।
आदेश के अनुसार लंबित ऑडिट मामलों की भी समीक्षा करनी थी। पता चला है कि जांच टीम ने मार्च में एक करोड़ 70 लाख के भुगतान के अलावा पूरे वर्ष में हुए भुगतान, टेंडर, वर्कआर्डर की प्रक्रिया, भुगतान बिलों पर लेखाकार के हस्ताक्षर न होना, विभागीय लेखाकार द्वारा लगाई गई आपत्तियों का निस्तारण न किया जाना, गैर जनपद की फर्मों से काम कराना, गुपचुप तरीके से टेंडर निकालना आदि बिंदु अपनी जांच रिपोर्ट में शामिल किए हैं। टीम ने वेतन बिलों के अलावा अन्य देयकों का भी कैशबुक से मिलान किया है।
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बुधवार को जांच पूरी कर टीम विभागीय पत्रावलियां साथ लेकर लखनऊ वापस चली गई। फिलहाल लेखाकार के बिना हस्ताक्षर भुगतान किए गए बिल व टेंडर संबंधी पत्रावली साथ ले जाने से विभागीय जिम्मेदार खासे परेशान हैं। वहीं लगातार तीन दिन खंड कार्यालय के बजाए अधिशासी अभियंता के सरकारी आवास पर पत्रावली मंगाकर जांच किए जाने से विभागीय कर्मचारी जांच टीम पर भी सवाल उठा रहे हैं।
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वित्तीय वर्ष के अंतिम माह में बजट खर्च करने के चक्कर में राजकीय नलकूप विभाग में लेखाकार के बिना हस्ताक्षर के करोड़ों का भुगतान कर दिया गया था। यह मामला शासन तक पहुंचने के बाद सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग के वित्त नियंत्रक राजीव कुमार सिंह ने चार सदस्यीय जांच टीम गठित की। सहायक लेखाधिकारी हीरालाल की अध्यक्षता में लेखाकार शिवकुमार, मुरारी मोहन श्रीवास्तव व राकेश कुमार ने सोमवार को नलकूप विभाग पहुंचकर जांच शुरू की।
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आदेश के अनुसार लंबित ऑडिट मामलों की भी समीक्षा करनी थी। पता चला है कि जांच टीम ने मार्च में एक करोड़ 70 लाख के भुगतान के अलावा पूरे वर्ष में हुए भुगतान, टेंडर, वर्कआर्डर की प्रक्रिया, भुगतान बिलों पर लेखाकार के हस्ताक्षर न होना, विभागीय लेखाकार द्वारा लगाई गई आपत्तियों का निस्तारण न किया जाना, गैर जनपद की फर्मों से काम कराना, गुपचुप तरीके से टेंडर निकालना आदि बिंदु अपनी जांच रिपोर्ट में शामिल किए हैं। टीम ने वेतन बिलों के अलावा अन्य देयकों का भी कैशबुक से मिलान किया है।
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बुधवार को जांच पूरी कर टीम विभागीय पत्रावलियां साथ लेकर लखनऊ वापस चली गई। फिलहाल लेखाकार के बिना हस्ताक्षर भुगतान किए गए बिल व टेंडर संबंधी पत्रावली साथ ले जाने से विभागीय जिम्मेदार खासे परेशान हैं। वहीं लगातार तीन दिन खंड कार्यालय के बजाए अधिशासी अभियंता के सरकारी आवास पर पत्रावली मंगाकर जांच किए जाने से विभागीय कर्मचारी जांच टीम पर भी सवाल उठा रहे हैं।