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संकिसा को पर्यटन स्थल बनाने पर जोर, श्रृंगीरापुर भूले
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फर्रुखाबाद। धार्मिक व ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे जनपद में पर्यटन विकास काफी पिछड़ा है। बौद्ध तीर्थ स्थल को पर्यटन स्थल बनाने पर पूरा जोर है, लेकिन श्रृंगीरामपुर का अभी भी जिक्र भी होता नहीं दिख रहा है।
बौद्ध तीर्थ स्थल संकिसा से विदेशी यात्रियों की भी आस्था जुड़ी है। कई देशों से भगवान बुद्ध के अनुयायी आते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संकिसा को पर्यटन के मानचित्र पर लाने की घोषणा कर चुके हैं। इसकी कवायद भी चल रही है। पर्यटन विकास के लिए भूमि खरीदी जा रही है। बड़े स्तर पर विकास कार्य प्रस्तावित हैं। अभी तक मात्र एक हाल ही बना है। अब संकिसा को नगर पंचायत बनाया जा रहा है। इससे विकास और लोगों के रोजगार के साधन बढ़ने की उम्मीद जगी है।
सत्संग हाल, शौचालय व सीसी रोड तक सीमित विकास
- धार्मिक, पौराणिक दृष्टि से श्रृंगीरामपुर महत्वपूर्ण स्थल है। इसका वेद-शास्त्रों में भी उल्लेख है। यहां भी पर्यटन स्थल प्रस्तावित है, लेकिन पर्यटन विकास के नाम पर एक सत्संग हाल, सामुदायिक शौचालय व सीसी रोड तक ही सीमित है। इससे रोजगार के साधन नहीं बढ़ सके। महाभारत कालीन शहर से सटे गुरुगांव देवी मंदिर नवरात्र में भक्तों से खचाखच भरा रहता है। पर्यटन विभाग की ओर से यहां भी सत्संग हाल का निर्माण कराया गया है।
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नीबकरोरी में विकास की जरूरत
- मोहम्मदाबाद के नीबकरोरी धाम में भी कई जनपदों से भक्त दर्शन के लिए आते हैं। यहां भी पर्यटन विकास की संभावनाएं हैं। पर्यटन विभाग की ओर से विकास के नाम पर एक हाल व किचन का निर्माण कराया गया। इसके अलावा शमसाबाद के गांव नगला नान में पौराणिक चिंतामणि तालाब की पर्यटन विभाग की ओर से बाउंड्रीवाल निर्माण पर 20 लाख रुपये खर्च किये जा रहे हैं।
योजना न धन कैसे बढ़े पर्यटन
कंपिल। धार्मिक व ऐतिहासिक स्थलों से भरी धर्म नगरी कंपिल चारों युगों की धरोहरों के साथ महाभारत की द्रोपदी की जन्म स्थली है। जैन धर्म के दोनों संप्रदायों के मंदिर हैं। सरकारी तंत्र की उपेक्षा से यहां पर्यटन विकास के लिए न तो धन है और न ही कोई योजना।
प्रचलित है कि कंपिल का इतिहास गंगा के पृथ्वी पर अवतरण से भी पुराना है। सतयुग के महर्षि कपिल मुनि के नाम पर बसे इस छोटे से कस्बे में भगवान राम के अनुज शत्रुघ्न द्वारा स्थापित रामेश्वरनाथ मंदिर, महाभारत कालीन द्रोपदी कुंड, द्रुपद टीला मुगल कालीन विश्रांतें हैं। चरक संहिता यहीं लिखी गई। गुरु द्रोणाचार्य का यहां से गहरा नाता रहा। इसके बावजूद पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठाए गए।
नौ वर्ष पूर्व पर्यटन विभाग की ओर से 4.83 करोड़ रुपये से द्रोपदी कुंड, कपिल मुनि आश्रम, मुगल कालीन विश्रांतों की दशा तो सुधारी गई, लेकिन सड़क, शिक्षा, चिकित्सा के क्षेत्र अधूरे हैं।(संवाद)
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बौद्ध तीर्थ स्थल संकिसा से विदेशी यात्रियों की भी आस्था जुड़ी है। कई देशों से भगवान बुद्ध के अनुयायी आते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संकिसा को पर्यटन के मानचित्र पर लाने की घोषणा कर चुके हैं। इसकी कवायद भी चल रही है। पर्यटन विकास के लिए भूमि खरीदी जा रही है। बड़े स्तर पर विकास कार्य प्रस्तावित हैं। अभी तक मात्र एक हाल ही बना है। अब संकिसा को नगर पंचायत बनाया जा रहा है। इससे विकास और लोगों के रोजगार के साधन बढ़ने की उम्मीद जगी है।
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सत्संग हाल, शौचालय व सीसी रोड तक सीमित विकास
- धार्मिक, पौराणिक दृष्टि से श्रृंगीरामपुर महत्वपूर्ण स्थल है। इसका वेद-शास्त्रों में भी उल्लेख है। यहां भी पर्यटन स्थल प्रस्तावित है, लेकिन पर्यटन विकास के नाम पर एक सत्संग हाल, सामुदायिक शौचालय व सीसी रोड तक ही सीमित है। इससे रोजगार के साधन नहीं बढ़ सके। महाभारत कालीन शहर से सटे गुरुगांव देवी मंदिर नवरात्र में भक्तों से खचाखच भरा रहता है। पर्यटन विभाग की ओर से यहां भी सत्संग हाल का निर्माण कराया गया है।
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नीबकरोरी में विकास की जरूरत
- मोहम्मदाबाद के नीबकरोरी धाम में भी कई जनपदों से भक्त दर्शन के लिए आते हैं। यहां भी पर्यटन विकास की संभावनाएं हैं। पर्यटन विभाग की ओर से विकास के नाम पर एक हाल व किचन का निर्माण कराया गया। इसके अलावा शमसाबाद के गांव नगला नान में पौराणिक चिंतामणि तालाब की पर्यटन विभाग की ओर से बाउंड्रीवाल निर्माण पर 20 लाख रुपये खर्च किये जा रहे हैं।
योजना न धन कैसे बढ़े पर्यटन
कंपिल। धार्मिक व ऐतिहासिक स्थलों से भरी धर्म नगरी कंपिल चारों युगों की धरोहरों के साथ महाभारत की द्रोपदी की जन्म स्थली है। जैन धर्म के दोनों संप्रदायों के मंदिर हैं। सरकारी तंत्र की उपेक्षा से यहां पर्यटन विकास के लिए न तो धन है और न ही कोई योजना।
प्रचलित है कि कंपिल का इतिहास गंगा के पृथ्वी पर अवतरण से भी पुराना है। सतयुग के महर्षि कपिल मुनि के नाम पर बसे इस छोटे से कस्बे में भगवान राम के अनुज शत्रुघ्न द्वारा स्थापित रामेश्वरनाथ मंदिर, महाभारत कालीन द्रोपदी कुंड, द्रुपद टीला मुगल कालीन विश्रांतें हैं। चरक संहिता यहीं लिखी गई। गुरु द्रोणाचार्य का यहां से गहरा नाता रहा। इसके बावजूद पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठाए गए।
नौ वर्ष पूर्व पर्यटन विभाग की ओर से 4.83 करोड़ रुपये से द्रोपदी कुंड, कपिल मुनि आश्रम, मुगल कालीन विश्रांतों की दशा तो सुधारी गई, लेकिन सड़क, शिक्षा, चिकित्सा के क्षेत्र अधूरे हैं।(संवाद)