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Farrukhabad News: सीटें न भर पाने से डीएलएड कॉलेजों ने 60 प्रतिशत फीस घटाई

Wed, 02 Sep 2026 11:53 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Wed, 02 Sep 2026 11:53 PM IST
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D.El.Ed. colleges reduced fees by 60 percent due to unfilled seats.
फर्रुखाबाद/कमालगंज। डीएलएड कॉलेजों में इस साल दाखिले का रुझान और भी कम हो गया। इससे डीएलएड की फीस 60 प्रतिशत तक कम कर दी गई है। दो साल के चारों सेमेस्टर की 82 हजार रुपये निर्धारित फीस के स्थान पर 28 हजार रुपये तक में दाखिले हो रहे हैं।
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जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) रजलामई शमसाबाद को मिलाकर 33 शिक्षण संस्थानों में डीएलएड है। डायट व छह निजी कॉलेजों में 50-50 सीटें हैं। जबकि गांधी शांतिनगर राजेपुर ब्लाक के एक कॉलेज में सबसे ज्यादा 150 सीटें हैं। शेष शिक्षण संस्थानों में 100-100 सीटें हैं। डीएलएड में फीस जमा होने का दूसरा चरण समाप्त हो गया है। अब तीसरे चरण में सात से 10 सितंबर तक पांच हजार रुपये फीस जमा कर दाखिले के लिए पंजीकरण करना होगा। फिलहाल ज्यादातर कॉलेजों में दाखिले का दौर मंदा चल रहा है। इसके चलते प्रशिक्षण संस्थान फीस घटा रहे हैं। ज्यादातर संस्थानों में 40 हजार से 28 हजार तक में दाखिला हो रहा है। शहर के एक बालिका डिग्री कॉलेज में सबसे अधिक 50 हजार फीस है। जबकि बढ़पुर ब्लाक के एक ग्रामीण कॉलेज में 28 हजार में दाखिले हो रहे हैं।
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चार सेमेस्टर की पढ़ाई, एक-एक माह स्कूल में प्रशिक्षण
- डिप्लोमा ऑफ एलीमेंट्री एजुकेशन (पूर्व बीटीसी) में चार सेमेस्टर की पढ़ाई होती है। साथ ही हर सेमेस्टर में एक-एक माह प्राथमिक विद्यालय में शिक्षण अभ्यास का प्रशिक्षण होता है। प्रशिक्षु को विद्यालय में बच्चों को पढ़ाकर शिक्षण का व्यावहारिक अभ्यास करना पड़ता है। साथ ही विद्यालय में सभी अभिलेखों को तैयार करने व अन्य क्रियाकलापों का भी प्रशिक्षण लिया जाता है।
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सात साल से भर्ती न होने व प्राथमिक स्तर में बंध जाने से रुझान घटा
- डीएलएड प्रशिक्षुओं का कहना है कि यूपी में प्राथमिक शिक्षकों की पिछली भर्ती दिसंबर 2018 में हुई थी। उस समय 69 हजार पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया चली थी। उसके बाद भर्ती न होने से रुझान घटा है। बीएड डिग्री को अब पीजीटी (प्रवक्ता) पदों पर भी आवश्यक कर दिया गया। बीएड के बाद एमएड व अन्य अवसर भी रहते हैं। लेकिन डीएलएड में अभ्यर्थी प्राथमिक शिक्षक पद के लिए ही पात्रता में बंधकर रह जाता है। इसलिए रुझान कम हो रहा। इससे कॉलेज प्रबंधकों को अपने आप फीस कम करनी पड़ी और छात्रों व अभिभावकों को राहत मिली है।
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