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बटवारे के बाद भी खत्म नहीं हुआ पुत्रों में तनाव, वृद्ध दंपति दुखी
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फर्रुखाबाद के मोहम्मदाबाद में परिवार में लाकडाउन से उपजे विवाद के बाद पोते-पोतियों के साथ दुखी ब?
- फोटो : FARRUKHABAD
प्रवासियों की घर वापसी पैदा करने लगी घरों में दरार
मोहम्मदाबाद (फर्रुखाबाद)। कोरोना और लॉकडाउन से घर वापसी को मजबूर हुए मजदूर परिवारों से घर की खुशी दूर होने लगी है। दूसरे शहरों से लौटे बेटों-बहुओं का गांव में बसे परिवार के सदस्यों से तालमेल नहीं बैठ पा रहा है। कहीं घर में दरार पड़ रही है तो कहीं दीवार खिंच रही है।
ऐसे ही हालात का सामना कर रहे हैं ग्राम कान्हेपुर निवासी बुजुर्ग सुरेश चंद्र। बेटे तेजराम और मसू ने सब्जी की खेती और बिक्री का पुश्तैनी काम संभाला तो कुछ वर्षों से वह निश्चिंत हो गए थे। तीन अन्य बेटे बालेश्वर, सरमन, नीलू के कानपुर में बतौर मजदूर पांव जमा लेने से उनकी तरफ से भी बेफिक्री रहती थी।
अचानक लॉकडाउन का दौर आने से कानपुर में मजदूरी करने वाले तीनों बेटे पत्नी और बच्चों के साथ गांव लौट आए। घर-परिवार हरा-भरा नजर आने से कुछ दिन तो आंगन में खुशियों की किलकारी गूंजी लेकिन जल्द ही दृश्य बदलने लगा। पांच बेटे और पांच बहुओं के साथ उनके 14 बच्चों के बीच तालमेल की कमी परिवार की खुशियों में आड़े आने लगी। बात कहासुनी से झगड़े तक पहुंची और फिर बंटवारे की नौबत भी आ गई।
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हालात से दुखी सुरेश चंद्र ने पत्नी बिट्टन देवी को रजामंद करके पांचों बेटों के बीच मकान का एक-एक कमरा बांट दिया है। पांच कमरों के मकान में बुजुर्ग दंपति ने खुद के लिए बरामदे में जगह बनाई है। दस बीघा खेत में पांच पुत्रों के अलावा वृद्ध ने अपना हिस्सा भी रखा है।
इससे प्रत्येक पुत्र के हिस्से में डेढ़-डेढ़ बीघा के आसपास खेती आई है। खेत के बंटवारे बाद छोटे-छोटे हिस्से में कौन क्या पैदा करेगा और कितना कमाएगा, यह फिक्र सुरेश चंद्र पर हावी है। कहते हैं कि फिलहाल हालात से समझौता करने के अलावा कोई चारा नहीं है।
चूर हुआ साझे में बोलेरो दौड़ाने का सपना
मोहम्मदाबाद। बेटे-बहुओं-पोतों की घर वापसी से अच्छे दिन की उम्मीद कर रहे सुरेश चंद्र मौजूदा हालात से टूट गए हैं। बताते हैं कि आगे बढ़ने के सपनों को किसी की नजर लग गई। फरवरी में छोटे बेटे सरमन की शादी थी। चारों बेटों ने मिलजुलकर भाई की शादी काफी धूमधाम से की थी। इसके बाद पांचों बेटों ने मिलकर बोलेरो खरीदने और किराये पर चलाकर घर की आमदनी बढ़ाने की योजना बनाई थी। अब ऐसी उम्मीद बाकी नहीं बची।
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मोहम्मदाबाद (फर्रुखाबाद)। कोरोना और लॉकडाउन से घर वापसी को मजबूर हुए मजदूर परिवारों से घर की खुशी दूर होने लगी है। दूसरे शहरों से लौटे बेटों-बहुओं का गांव में बसे परिवार के सदस्यों से तालमेल नहीं बैठ पा रहा है। कहीं घर में दरार पड़ रही है तो कहीं दीवार खिंच रही है।
ऐसे ही हालात का सामना कर रहे हैं ग्राम कान्हेपुर निवासी बुजुर्ग सुरेश चंद्र। बेटे तेजराम और मसू ने सब्जी की खेती और बिक्री का पुश्तैनी काम संभाला तो कुछ वर्षों से वह निश्चिंत हो गए थे। तीन अन्य बेटे बालेश्वर, सरमन, नीलू के कानपुर में बतौर मजदूर पांव जमा लेने से उनकी तरफ से भी बेफिक्री रहती थी।
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अचानक लॉकडाउन का दौर आने से कानपुर में मजदूरी करने वाले तीनों बेटे पत्नी और बच्चों के साथ गांव लौट आए। घर-परिवार हरा-भरा नजर आने से कुछ दिन तो आंगन में खुशियों की किलकारी गूंजी लेकिन जल्द ही दृश्य बदलने लगा। पांच बेटे और पांच बहुओं के साथ उनके 14 बच्चों के बीच तालमेल की कमी परिवार की खुशियों में आड़े आने लगी। बात कहासुनी से झगड़े तक पहुंची और फिर बंटवारे की नौबत भी आ गई।
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हालात से दुखी सुरेश चंद्र ने पत्नी बिट्टन देवी को रजामंद करके पांचों बेटों के बीच मकान का एक-एक कमरा बांट दिया है। पांच कमरों के मकान में बुजुर्ग दंपति ने खुद के लिए बरामदे में जगह बनाई है। दस बीघा खेत में पांच पुत्रों के अलावा वृद्ध ने अपना हिस्सा भी रखा है।
इससे प्रत्येक पुत्र के हिस्से में डेढ़-डेढ़ बीघा के आसपास खेती आई है। खेत के बंटवारे बाद छोटे-छोटे हिस्से में कौन क्या पैदा करेगा और कितना कमाएगा, यह फिक्र सुरेश चंद्र पर हावी है। कहते हैं कि फिलहाल हालात से समझौता करने के अलावा कोई चारा नहीं है।
चूर हुआ साझे में बोलेरो दौड़ाने का सपना
मोहम्मदाबाद। बेटे-बहुओं-पोतों की घर वापसी से अच्छे दिन की उम्मीद कर रहे सुरेश चंद्र मौजूदा हालात से टूट गए हैं। बताते हैं कि आगे बढ़ने के सपनों को किसी की नजर लग गई। फरवरी में छोटे बेटे सरमन की शादी थी। चारों बेटों ने मिलजुलकर भाई की शादी काफी धूमधाम से की थी। इसके बाद पांचों बेटों ने मिलकर बोलेरो खरीदने और किराये पर चलाकर घर की आमदनी बढ़ाने की योजना बनाई थी। अब ऐसी उम्मीद बाकी नहीं बची।