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ग्रामीणों की चिकित्सा आशा के हवाले
चंद्रपाल सिंह सेंगर,फर्रुखाबाद
Updated Tue, 29 Mar 2016 12:18 AM IST
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प्रदेश के सभी अस्पतालों में सरकार विभिन्न दवाएं मुफ्त में दे रही हैं।
- फोटो : demo
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राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में अब आशा (एक्रीडेटेड सोशल हेल्थ एक्टीवेस्ट) को बुखार से पीड़ित होने पर रोगियों की रक्त पट्टिकाएं बनाकर एलटी से जांच कराने के बाद दवा देने का काम सौंप गया है। स्वास्थ्य विभाग ने यह निर्णय एमपीडब्लू( बहुउद्देश्यीय पुरुष कार्यकर्ताओं) की बेहद कमी को पूरा करने के लिए प्रदेश भर में लिया है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बुखार के रोगियोें के खून के नमूने लेकर उनकी जांच और उन्हें दवा देने का कार्य प्रशिक्षित बहुउद्देश्यी कार्यकर्ता करते है। जिले में 77 पद एमपीडब्लू के सृजित थे और 1989 तक लगभग इनका कोरम पूरा रहा। धीरे-धीरे एमपीडब्लू सेवानिवृत्त होते गए और उनके स्थान पर नए लोगों की नियुक्ति नहीं की गई।
नतीजतन इनकी कमी से ग्रामीण क्षेत्रों में बुखार से पीड़ित रोगियों के नमूने लेकर उनकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर जांच कराने की व्यवस्था पूरी तरह से डगमगा गई। जिले भर में मौजूदा समय में केवल पांच एमपीडब्लू कार्य कर रहे हैं। शेष पद रिक्त चल रहे हैं। गर्मी के मौसम में तैयार हो रही मच्छरों की फौज से लड़ने का विकल्प सरकार और कुछ नहीं खोज पाई।
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सरकार ने एनआरएचएम योजना के तहत सीएमओ को आदेश दिए कि वह आशा बहुओं से बुखार के पीड़ित रोगियों के खून के नमूने लेकर रक्त पट्टिकाओं को जांच के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर एलटी के पास भिजवाए। मलेरिया निकलने पर उन रोगियों को यह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से क्लोरोक्विन और प्रेमाक्विन की गोलियां ले जाकर खिलवाएं। शासन ने ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य की पूरी बागडोर कम पढ़ी लिखी आशा के हाथों में सौंप दी है, जो कि झोलाछाप से कई गुना अधिक खतरनाक साबित हो सकती है।
सीएमओ डा. राकेश कुमार ने बताया कि एमपीडब्लू की जिले में ही नहीं प्रदेश भर में बेहद कमी है। इस कमी को देखते हुए एनआरएचएम योजना के तहत आशा को बुखार से पीड़ित रोगियों की रक्त पट्टिकाएं बनाने का कार्य सौंप दिया गया है। इसके एवज में आशा को प्रति रक्त पट्टिका 15 रुपये के हिसाब से पारिश्रमिक दिया जाएगा।
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ग्रामीण क्षेत्रों में बुखार के रोगियोें के खून के नमूने लेकर उनकी जांच और उन्हें दवा देने का कार्य प्रशिक्षित बहुउद्देश्यी कार्यकर्ता करते है। जिले में 77 पद एमपीडब्लू के सृजित थे और 1989 तक लगभग इनका कोरम पूरा रहा। धीरे-धीरे एमपीडब्लू सेवानिवृत्त होते गए और उनके स्थान पर नए लोगों की नियुक्ति नहीं की गई।
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नतीजतन इनकी कमी से ग्रामीण क्षेत्रों में बुखार से पीड़ित रोगियों के नमूने लेकर उनकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर जांच कराने की व्यवस्था पूरी तरह से डगमगा गई। जिले भर में मौजूदा समय में केवल पांच एमपीडब्लू कार्य कर रहे हैं। शेष पद रिक्त चल रहे हैं। गर्मी के मौसम में तैयार हो रही मच्छरों की फौज से लड़ने का विकल्प सरकार और कुछ नहीं खोज पाई।
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सरकार ने एनआरएचएम योजना के तहत सीएमओ को आदेश दिए कि वह आशा बहुओं से बुखार के पीड़ित रोगियों के खून के नमूने लेकर रक्त पट्टिकाओं को जांच के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर एलटी के पास भिजवाए। मलेरिया निकलने पर उन रोगियों को यह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से क्लोरोक्विन और प्रेमाक्विन की गोलियां ले जाकर खिलवाएं। शासन ने ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य की पूरी बागडोर कम पढ़ी लिखी आशा के हाथों में सौंप दी है, जो कि झोलाछाप से कई गुना अधिक खतरनाक साबित हो सकती है।
सीएमओ डा. राकेश कुमार ने बताया कि एमपीडब्लू की जिले में ही नहीं प्रदेश भर में बेहद कमी है। इस कमी को देखते हुए एनआरएचएम योजना के तहत आशा को बुखार से पीड़ित रोगियों की रक्त पट्टिकाएं बनाने का कार्य सौंप दिया गया है। इसके एवज में आशा को प्रति रक्त पट्टिका 15 रुपये के हिसाब से पारिश्रमिक दिया जाएगा।