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मरने के बाद भी नर्सिंग होम आईसीयू का मीटर घूमता रहता
ब्यूरो, अमर उजाला फर्रुखाबाद
Updated Mon, 02 Feb 2015 10:56 PM IST
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नर्सिंग होम मरीजाें की सांस चलने तक तो जेब काटते ही हैं, मौत के बाद भी
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बिल का मीटर चलता रहता है। यह ऑक्सीजन लगाकर मरीज को जिंदा दिखाकर पैसे
बनाते हैं। शहर में कई बार यह मामले सड़क पर भी पहुंच चुके हैं। जानकाराें
की मानें तो आईसीयू में महंगे इंजेक्शन लगाए ही नहीं जाते हैं। इसमें
आईसीयू में तीमारदाराें की नामौजूदगी का फायदा उठाया जाता है।
‘धरती के भगवानों’ की निजी दुकानों में सिर्फ पैसा ही ‘भगवान’ है। इनके यहां थोड़े से भी गंभीर मरीज के आने पर उसे बचाने के लिए आईसीयू (इंटेसिव केयर यूनिट) में दाखिल करने की मजबूरी जताई जाती है। मरीज को आईसीयू में दाखिल होने के बाद तीमारदाराें का उससे संपर्क टूट जाता है। यह आईसीयू की ग्लास विंडाें से मरीज के दर्शन भर कर सकते है।
वह भी 24 घंटे में तीन-चार बार ही। इससे ज्यादा फ टक गए तो समझो स्टाफ का गुस्सा फटा। जानकार बताते हैं कि आईसीयू के नाम पर महंगे इंजेक्शन मंगवाए जाते हैं। मरीज को न लगाक र इन्हें ऐसे ही मेडिकल स्टोर पर वापस कर दिया जाता है। तय कटौती के बाद इन्हें पैसा मिल जाता है। आईसीयू में मरीज के तीमारदार के न होने से वह बेचारे कुछ जान भी नहीं पाते हैं।
नर्सिंग होम में 3 से 5 हजार रु पये की नौकरी करने वाले कर्मचारियों के ठाठ के पीछे की वजह भी यही मानी जाती है।
मरीज के मरने के बाद उसके ऑक्सीजन मास्क लगा दिया जाता है। इससे तीमारदाराें को मरीज के जिंदा रहने का भरोसा बना रहता है। मरीज को वेंटीलेटर पर रख कर दाम कमाना भी यहां खास अदा है। मरीज के जिंदा होने के नाटक को मजबूत करने के लिए दवाइयां भी मंगाई जाती हैं।
कई बार सड़काें पर आ चुके मामले
मरने के बाद आईसीयू में मरीज को रखने पर कई बार हंगामे हो चुके हैं। 24 दिसंबर को एटा जिले के जैथरा थाना के गांव कसरौलिया निवासी शकुंतला क ी मौत के बाद आईसीयू में रखने को लेकर बवाल हो चुका है। बाद में इसमें परिजनाें ने एफआईआर दर्ज कराई थी। शहर के ही एक नर्सिंग होम में नवजात की लापरवाही में मौत होने पर कांग्रेस नेता ने स्वास्थ्य व पुलिस विभाग से कार्रवाई की मांग की थी। बाद में नवजात बच्ची का शव निकालकर पोस्टमार्टम हुआ था। इसमें भी एफ आईआर दर्ज कराई गई थी।
24 घंटे का चार्ज तीन हजार
आईसीयू में 24 घंटे का किराया 3 हजार रुपया है। आक्सीजन, वेंटीलेटर, इन्फ्यूजन पंप, एबीजी जांच करवाई गई तो यह खर्च 10 हजार रुपये के करीब पहुंच जाता है।
‘धरती के भगवानों’ की निजी दुकानों में सिर्फ पैसा ही ‘भगवान’ है। इनके यहां थोड़े से भी गंभीर मरीज के आने पर उसे बचाने के लिए आईसीयू (इंटेसिव केयर यूनिट) में दाखिल करने की मजबूरी जताई जाती है। मरीज को आईसीयू में दाखिल होने के बाद तीमारदाराें का उससे संपर्क टूट जाता है। यह आईसीयू की ग्लास विंडाें से मरीज के दर्शन भर कर सकते है।
वह भी 24 घंटे में तीन-चार बार ही। इससे ज्यादा फ टक गए तो समझो स्टाफ का गुस्सा फटा। जानकार बताते हैं कि आईसीयू के नाम पर महंगे इंजेक्शन मंगवाए जाते हैं। मरीज को न लगाक र इन्हें ऐसे ही मेडिकल स्टोर पर वापस कर दिया जाता है। तय कटौती के बाद इन्हें पैसा मिल जाता है। आईसीयू में मरीज के तीमारदार के न होने से वह बेचारे कुछ जान भी नहीं पाते हैं।
नर्सिंग होम में 3 से 5 हजार रु पये की नौकरी करने वाले कर्मचारियों के ठाठ के पीछे की वजह भी यही मानी जाती है।
मरीज के मरने के बाद उसके ऑक्सीजन मास्क लगा दिया जाता है। इससे तीमारदाराें को मरीज के जिंदा रहने का भरोसा बना रहता है। मरीज को वेंटीलेटर पर रख कर दाम कमाना भी यहां खास अदा है। मरीज के जिंदा होने के नाटक को मजबूत करने के लिए दवाइयां भी मंगाई जाती हैं।
कई बार सड़काें पर आ चुके मामले
मरने के बाद आईसीयू में मरीज को रखने पर कई बार हंगामे हो चुके हैं। 24 दिसंबर को एटा जिले के जैथरा थाना के गांव कसरौलिया निवासी शकुंतला क ी मौत के बाद आईसीयू में रखने को लेकर बवाल हो चुका है। बाद में इसमें परिजनाें ने एफआईआर दर्ज कराई थी। शहर के ही एक नर्सिंग होम में नवजात की लापरवाही में मौत होने पर कांग्रेस नेता ने स्वास्थ्य व पुलिस विभाग से कार्रवाई की मांग की थी। बाद में नवजात बच्ची का शव निकालकर पोस्टमार्टम हुआ था। इसमें भी एफ आईआर दर्ज कराई गई थी।
24 घंटे का चार्ज तीन हजार
आईसीयू में 24 घंटे का किराया 3 हजार रुपया है। आक्सीजन, वेंटीलेटर, इन्फ्यूजन पंप, एबीजी जांच करवाई गई तो यह खर्च 10 हजार रुपये के करीब पहुंच जाता है।