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श्रद्धा से मनाया गुरु तेगबहादुर का बलिदान दिवस
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गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड में सजा गुरु ग्रंथ साहब का दरबार।
- फोटो : FAIZABAD
अयोध्या। गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड में नवम गुरु तेगबहादुर का 344 वां बलिदान दिवस श्रद्धा के साथ मनाया गया। गुरुद्वारे के मुख्यग्रंथी ज्ञानी गुुरुजीत सिंह व महंत बलजीत सिंह के संयोजन में विभिन्न धार्मिक आयोजन हुए।
इस अवसर पर गुरु ग्रंथ साहब का अखंड पाठ हुआ तो, लखनऊ से आए जत्थे ने गुरु तेगबहादुर को लयबद्ध शबद कीर्तन से नमन किया।
ब्रह्मकुंड गुरुद्वारे के मुख्य ग्रंथी ज्ञानी गुरुजीत सिंह ने बताया कि गुरु तेगबहादुर के संपूर्ण जीवन और बलिदान से प्रेरणा लेना होगा। विक्रम संवत 1725 में असम से पंजाब जाते समय गुरु तेग बहादुर अयोध्या के ब्रह्मकुंड गुरुद्वारे में ठहरे थे तथा दो दिनों तक लगातार तप किया था। उनके चरण पादुका आज भी गुरुद्वारे में रखे है।
मुख्य ग्रंथी ज्ञानी गुरुजीत सिंह ने कहा कि गुरु के बलिदान के मूल में यह चेतना थी कि इस जीवन के अलावा एक महाजीवन भी है जो मृत्यु के बाद भी प्रवाहमान रहता है। इसके लिए बड़ी से बड़ी कीमत चुकाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि गुरु तेगबहादुर के जीवन से त्याग, समर्पण और परहित की सीख लेनी चाहिए।
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उन्होंने कहा, संतत्व अपने आप तक सीमित होना नहीं है, बल्कि लोकहित के स्वयं को समर्पित करने का नाम है। जिस दिन मनुष्य प्राण देकर भी न्यास और सत्य की प्रतिष्ठा के लिए तैयार होगा, उस दिन मानवता अन्याय-अनाचार से मुक्ति होगी।
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इस अवसर पर गुरु ग्रंथ साहब का अखंड पाठ हुआ तो, लखनऊ से आए जत्थे ने गुरु तेगबहादुर को लयबद्ध शबद कीर्तन से नमन किया।
ब्रह्मकुंड गुरुद्वारे के मुख्य ग्रंथी ज्ञानी गुरुजीत सिंह ने बताया कि गुरु तेगबहादुर के संपूर्ण जीवन और बलिदान से प्रेरणा लेना होगा। विक्रम संवत 1725 में असम से पंजाब जाते समय गुरु तेग बहादुर अयोध्या के ब्रह्मकुंड गुरुद्वारे में ठहरे थे तथा दो दिनों तक लगातार तप किया था। उनके चरण पादुका आज भी गुरुद्वारे में रखे है।
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मुख्य ग्रंथी ज्ञानी गुरुजीत सिंह ने कहा कि गुरु के बलिदान के मूल में यह चेतना थी कि इस जीवन के अलावा एक महाजीवन भी है जो मृत्यु के बाद भी प्रवाहमान रहता है। इसके लिए बड़ी से बड़ी कीमत चुकाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि गुरु तेगबहादुर के जीवन से त्याग, समर्पण और परहित की सीख लेनी चाहिए।
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उन्होंने कहा, संतत्व अपने आप तक सीमित होना नहीं है, बल्कि लोकहित के स्वयं को समर्पित करने का नाम है। जिस दिन मनुष्य प्राण देकर भी न्यास और सत्य की प्रतिष्ठा के लिए तैयार होगा, उस दिन मानवता अन्याय-अनाचार से मुक्ति होगी।