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नगर निगम वेबसाइट पर अब भी पालिका
फैजाबाद
Updated Fri, 22 Sep 2017 11:05 PM IST
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नगरनिगम अयोध्या,फैजाबाद।
- फोटो : अमर उजाला
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फैजाबाद व अयोध्या नगर पालिकाओं को मिलाकर नगर निगम अयोध्या बने तीन महीने से ज्यादा का समय बीत गया लेकिन नगर निगम की वेबसाइट पर सीएम, नगर आयुक्त की तस्वीरें तो नई हैं लेकिन इस पर सरपट दौड़ने वाले चित्र नगर पालिका अयोध्या के पूर्व अध्यक्ष की बैठकों और कार्यों के हैं।
पूर्ववर्ती सरकार चली गई लेकिन उसकी योजनाओं का विवरण अब तक अधूरा है। जिला ग्राम्य विकास अभिकरण से संचालित लोहिया आवास के लाभार्थियों की सूची अब भी जिले की वेबसाइट पर 2012-13 और 2013-14 की ही दिखाई पड़ती हैं। इसके बाद लाभार्थियों का चयन हुआ या नहीं, इसे आफीशियल वेबसाइट से नहीं जाता सकता है।
यह तो जिले में ऑफीशियल वेबसाइट के अपडेट को लेकर बरती जा रही लापरवाही का उदाहरण भर है। कई विभागों की वेबसाइट की हालत इससे भी ज्यादा खराब है। किसी पर पुरानी सूचनाएं पड़ी हैं तो किसी पर जो सूचनाएं डाली गई हैं वह सामान्यतया नहीं पढ़ा जा सकता है। राज्य स्तर से अपडेट की जाने वाली साइट की स्थिति भले ही ठीक हो। अब मुख्य सचिव ने इस पर रिपोर्ट मांगी तो यहां भी हलचल महसूस की जा रही है।
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हाईटेक व्यवस्था के जरिए पारदर्शिता, आम लोगों को आसानी से जानकारी उपलब्ध कराने और भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश की है। विभाग से संचालित योजनाओं का अपडेट प्रतिदिन किए जाने की व्यवस्था है। कई ऐसी योजनाएं हैं जिनके डाटा को राज्यस्तर पर फीड किए जाने की व्यवस्था है।
अमूमन इनमें ज्यादातर आंकड़े अपडेट दिखते हैं। इसके साथ ही जिले स्तर पर भी ऑफीशियल वेबसाइट की व्यवस्था की गई है। हालांकि इनमें से ऑनलाइन कुछ ही बताई जाती हैं लेकिन अन्य के लिए डे बाई डे अपडेट की व्यवस्था है।
खासतौर से आम लोगों और लाभार्थियों से जुड़े कार्यक्रमों, लाभार्थियों की सूची आदि को ऑफीशियल साइट पर अपडेट किए जाने की बात बताई गई है। जैसे ट्रांसफार्मरों को बदले जाने, आवास, मनरेगा सहित अन्य शामिल हैं।
कॉरपोरेशन से बदले गए ट्रांसफार्मर की सूची तीन दिन पुरानी दिखी तो विधायक निधि, महामाया आवास की सूची पढ़ने में नहीं आता है। लोहिया आवास की सूची 2013-14 की आफीशियल वेबसाइट पर पड़ी है। इसी तरह दूसरे कई विभागों के आंकड़े लेट लतीफी का शिकार रहते हैं।
ऐसा भी नहीं कि साइट अपडेट नहीं होती हैं। कुछ महीनों पहले शासन के निर्देश पर साइटों से अफसरों की व्यक्तिगत जानकारियां हटाई गई थीं। जिले में यह कार्य एनआईसी से होने के कारण वेब संबंधी कार्य तो कर दिया जाता है लेकिन विभागों से सूचनाएं अपडेट करने में लेटलतीफी आम बात है। विभागों के अफसरों का कहना है कि ज्यादातर सूचनाएं समय पर अपडेट करवाई जाती हैं लेकिन तकनीकी गड़बड़ियाें से देरी होती है।
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पूर्ववर्ती सरकार चली गई लेकिन उसकी योजनाओं का विवरण अब तक अधूरा है। जिला ग्राम्य विकास अभिकरण से संचालित लोहिया आवास के लाभार्थियों की सूची अब भी जिले की वेबसाइट पर 2012-13 और 2013-14 की ही दिखाई पड़ती हैं। इसके बाद लाभार्थियों का चयन हुआ या नहीं, इसे आफीशियल वेबसाइट से नहीं जाता सकता है।
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यह तो जिले में ऑफीशियल वेबसाइट के अपडेट को लेकर बरती जा रही लापरवाही का उदाहरण भर है। कई विभागों की वेबसाइट की हालत इससे भी ज्यादा खराब है। किसी पर पुरानी सूचनाएं पड़ी हैं तो किसी पर जो सूचनाएं डाली गई हैं वह सामान्यतया नहीं पढ़ा जा सकता है। राज्य स्तर से अपडेट की जाने वाली साइट की स्थिति भले ही ठीक हो। अब मुख्य सचिव ने इस पर रिपोर्ट मांगी तो यहां भी हलचल महसूस की जा रही है।
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हाईटेक व्यवस्था के जरिए पारदर्शिता, आम लोगों को आसानी से जानकारी उपलब्ध कराने और भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश की है। विभाग से संचालित योजनाओं का अपडेट प्रतिदिन किए जाने की व्यवस्था है। कई ऐसी योजनाएं हैं जिनके डाटा को राज्यस्तर पर फीड किए जाने की व्यवस्था है।
अमूमन इनमें ज्यादातर आंकड़े अपडेट दिखते हैं। इसके साथ ही जिले स्तर पर भी ऑफीशियल वेबसाइट की व्यवस्था की गई है। हालांकि इनमें से ऑनलाइन कुछ ही बताई जाती हैं लेकिन अन्य के लिए डे बाई डे अपडेट की व्यवस्था है।
खासतौर से आम लोगों और लाभार्थियों से जुड़े कार्यक्रमों, लाभार्थियों की सूची आदि को ऑफीशियल साइट पर अपडेट किए जाने की बात बताई गई है। जैसे ट्रांसफार्मरों को बदले जाने, आवास, मनरेगा सहित अन्य शामिल हैं।
कॉरपोरेशन से बदले गए ट्रांसफार्मर की सूची तीन दिन पुरानी दिखी तो विधायक निधि, महामाया आवास की सूची पढ़ने में नहीं आता है। लोहिया आवास की सूची 2013-14 की आफीशियल वेबसाइट पर पड़ी है। इसी तरह दूसरे कई विभागों के आंकड़े लेट लतीफी का शिकार रहते हैं।
ऐसा भी नहीं कि साइट अपडेट नहीं होती हैं। कुछ महीनों पहले शासन के निर्देश पर साइटों से अफसरों की व्यक्तिगत जानकारियां हटाई गई थीं। जिले में यह कार्य एनआईसी से होने के कारण वेब संबंधी कार्य तो कर दिया जाता है लेकिन विभागों से सूचनाएं अपडेट करने में लेटलतीफी आम बात है। विभागों के अफसरों का कहना है कि ज्यादातर सूचनाएं समय पर अपडेट करवाई जाती हैं लेकिन तकनीकी गड़बड़ियाें से देरी होती है।