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सदन में गरीबों की आवाज बुलंद करने वाला हो नेता
फैजाबाद
Updated Sat, 21 Jan 2017 10:54 PM IST
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विधानसभा चुनाव को लेकर मंथन करते शिक्षक व कर्मचारी।
- फोटो : अमर उजाला
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शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों ने सदन में गरीबों की आवाज के धीमी पड़ने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। कहा गया, प्रतिनिधि ऐसा हो जो हाशिए के हक-हकूक को लेकर आवाज बुलंद करे जिससे उनके हित सुरक्षित रहें। हर हाथ को काम देने वाले जनप्रतिनिधि को बेहद जरूरी बताया गया।
बड़े नेताओं का जनता पर से भरोसा किस कदर उठ गया है कि वे दो जगहों से भाग्य आजमाइश करते हैं। जिसके भीतर इतना भी भरोसा न हो, उसके भीतर बड़ा काम करने का साहस आखिर कैसे होगा। दो जगहों से चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध की मांग जोरशोर से उठी।
राजनीति में धनबल और बाहुबल के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए कई वक्ताओं ने मांग की कि इसी के कारण अब स्काईलैब नेताओं की नई नस्ल पैदा हो गई है जिनका आमजन के सरोकारों से कोई मतलब ही नहीं रहता है। पार्टियों से जमीन से जुड़े नेताओं को प्रत्याशी बनाए जाने की मांग की गई।
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शैक्षिक संस्थानों की गिर रही साख पर भी चिंता जताई गई। कहा गया कि जनप्रतिनिधि ऐसा हो जिसकी शिक्षा और रोजगार पर स्पष्ट सोच हो और उसी अनुसार नीति बनाई जाए जिससे बेरोजगारी के संकट का सामना कर रही युवा पीढ़ी को कुछ राहत मिल सके।
चुनाव में ऐसे नेताओं को महत्व देने का स्वर उठा जो जनता के हर दुख-दर्द में साथ दे। यदि जनप्रतिनिधि मतदाताओं के विश्वास पर खरा न उतरे तो उसे वापस बुलाने का अधिकार मिले। तमाम पाबंदियों के बाद भी चुनावी खर्च की बेतहाशा बढ़ोतरी को लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बताया गया।
आखिर इस माहौल में एक शिक्षक, चिकित्सक, किसान इतना पैसा कहां से लाएगा कि वह चुनाव में धनबलियों से दो-दो हाथ कर सके। बहुतेरी समस्याओं के बीच और घटाटोप अंधेरे के बावजूद रोशनी की किरणें अभी फूट रही हैं।
लोगों को भरोसा है कि जो कुछ स्याह दृश्य दिख रहा है, उम्मीद है कि आने वाले समय में बड़ा बदलाव होगा और स्थितियां बेहतर हो जाएंगी। युवाओं की सोच पर लोगों को भरोसा है कि उनके भीतर जाति, धर्म और क्षेत्र की दीवारें नहीं हैं जिसके कारण संवेदनशील और अच्छे विचार के जनप्रतिनिधि का चयन होने की संभावना है।
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बड़े नेताओं का जनता पर से भरोसा किस कदर उठ गया है कि वे दो जगहों से भाग्य आजमाइश करते हैं। जिसके भीतर इतना भी भरोसा न हो, उसके भीतर बड़ा काम करने का साहस आखिर कैसे होगा। दो जगहों से चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध की मांग जोरशोर से उठी।
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राजनीति में धनबल और बाहुबल के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए कई वक्ताओं ने मांग की कि इसी के कारण अब स्काईलैब नेताओं की नई नस्ल पैदा हो गई है जिनका आमजन के सरोकारों से कोई मतलब ही नहीं रहता है। पार्टियों से जमीन से जुड़े नेताओं को प्रत्याशी बनाए जाने की मांग की गई।
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शैक्षिक संस्थानों की गिर रही साख पर भी चिंता जताई गई। कहा गया कि जनप्रतिनिधि ऐसा हो जिसकी शिक्षा और रोजगार पर स्पष्ट सोच हो और उसी अनुसार नीति बनाई जाए जिससे बेरोजगारी के संकट का सामना कर रही युवा पीढ़ी को कुछ राहत मिल सके।
चुनाव में ऐसे नेताओं को महत्व देने का स्वर उठा जो जनता के हर दुख-दर्द में साथ दे। यदि जनप्रतिनिधि मतदाताओं के विश्वास पर खरा न उतरे तो उसे वापस बुलाने का अधिकार मिले। तमाम पाबंदियों के बाद भी चुनावी खर्च की बेतहाशा बढ़ोतरी को लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बताया गया।
आखिर इस माहौल में एक शिक्षक, चिकित्सक, किसान इतना पैसा कहां से लाएगा कि वह चुनाव में धनबलियों से दो-दो हाथ कर सके। बहुतेरी समस्याओं के बीच और घटाटोप अंधेरे के बावजूद रोशनी की किरणें अभी फूट रही हैं।
लोगों को भरोसा है कि जो कुछ स्याह दृश्य दिख रहा है, उम्मीद है कि आने वाले समय में बड़ा बदलाव होगा और स्थितियां बेहतर हो जाएंगी। युवाओं की सोच पर लोगों को भरोसा है कि उनके भीतर जाति, धर्म और क्षेत्र की दीवारें नहीं हैं जिसके कारण संवेदनशील और अच्छे विचार के जनप्रतिनिधि का चयन होने की संभावना है।