{"_id":"64c00fb8f310627b6302f657","slug":"kargil-day-shaheed-faizabad-news-c-97-1-ayo1002-279-2023-07-25","type":"story","status":"publish","title_hn":"Ayodhya News: देश के लिए रामसूरत ने दी थी प्राणों की आहुति","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Ayodhya News: देश के लिए रामसूरत ने दी थी प्राणों की आहुति
Tue, 25 Jul 2023 11:38 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Tue, 25 Jul 2023 11:38 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अयोध्या। बीकापुर तहसील अंतर्गत डेहरियावा ग्राम पंचायत के विश्वनोहरपुर निवासी रामसूरत यादव का बलिदान अयोध्यावासियों को हमेशा गौरवान्वित करता रहेगा। 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस है। रामसूरत यादव को कारगिल शहीद होने का दर्जा प्राप्त है।
डेहरियावा गांव को सैनिकों का गांव भी कहा जाता है। ग्राम पंचायत के तमाम लोग सेना में भर्ती होकर विभिन्न पदों पर सरहद की रक्षा कर रहे हैं। कुछ सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। कारगिल शहीद रामसूरत यादव की चर्चा आते ही गांव के लोगों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। विश्वनोहरपुर गांव में 12 दिसंबर 1968 को जन्मे रामसूरत यादव का रुझान शुरू से ही सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करने का था। स्नातक की परीक्षा के दौरान ही सेना में भर्ती होकर 1987 में पहली प्रारंभिक ट्रेनिंग नासिक में की। रामसूरत कारगिल युद्ध के दौरान वहां तैनात थे। लेकिन इसी दौरान असम में उल्फा उग्रवादियों से लोहा लेने के लिए उन्हें भेज दिया गया था। 12 अगस्त 1999 को 38 वर्ष की उम्र में वे देश सेवा करते हुए शहीद हो गए। बाद में उन्हें कारगिल शहीद का दर्जा मिला। 13 वर्ष तक उन्होंने सेना में देश की रक्षा की। 16 अगस्त को उनका पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव विश्वनोहरपुर बीकापुर पहुंचा। गांव में ही घर के समीप उनका अंतिम संस्कार भी किया गया। वहां पर बना कारगिल शहीद रामसूरत का स्मारक आज भी गांव और क्षेत्र को गौरवान्वित करता है। कारगिल शहीद रामसूरत यादव के छोटे भाई राममूरत यादव ने बताया कि उनके भाई की पुण्यतिथि 16 अगस्त को शहीद स्मारक पर मनाई जाती है।
शहीद के नाम पर स्थापित पीएचसी बदहाल
बीकापुर,अयोध्या। शहीद रामसूरत यादव चार बहनों और दो भाइयों में दूसरे नंबर पर थे। रामसूरत यादव के नाम से शासन ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कोछा बाजार का नामकरण किया है। पर्याप्त चिकित्सीय संसाधन उपलब्ध न होने के चलते अस्पताल बदहाली का शिकार है। सिर्फ ओपीडी के दौरान दिन में गिनती के नाममात्र मरीज ही पहुंचते हैं। रात में यहां कोई स्वास्थ्य कर्मी निवास नहीं करता है। अस्पताल में प्रसूताओं के लिए प्रसव की सुविधा तक नहीं है। शहीद के गांव और उनके स्मारक पर जाने के लिए सिर्फ खड़ंजा मार्ग है।
विज्ञापन
विज्ञापन
डेहरियावा गांव को सैनिकों का गांव भी कहा जाता है। ग्राम पंचायत के तमाम लोग सेना में भर्ती होकर विभिन्न पदों पर सरहद की रक्षा कर रहे हैं। कुछ सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। कारगिल शहीद रामसूरत यादव की चर्चा आते ही गांव के लोगों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। विश्वनोहरपुर गांव में 12 दिसंबर 1968 को जन्मे रामसूरत यादव का रुझान शुरू से ही सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करने का था। स्नातक की परीक्षा के दौरान ही सेना में भर्ती होकर 1987 में पहली प्रारंभिक ट्रेनिंग नासिक में की। रामसूरत कारगिल युद्ध के दौरान वहां तैनात थे। लेकिन इसी दौरान असम में उल्फा उग्रवादियों से लोहा लेने के लिए उन्हें भेज दिया गया था। 12 अगस्त 1999 को 38 वर्ष की उम्र में वे देश सेवा करते हुए शहीद हो गए। बाद में उन्हें कारगिल शहीद का दर्जा मिला। 13 वर्ष तक उन्होंने सेना में देश की रक्षा की। 16 अगस्त को उनका पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव विश्वनोहरपुर बीकापुर पहुंचा। गांव में ही घर के समीप उनका अंतिम संस्कार भी किया गया। वहां पर बना कारगिल शहीद रामसूरत का स्मारक आज भी गांव और क्षेत्र को गौरवान्वित करता है। कारगिल शहीद रामसूरत यादव के छोटे भाई राममूरत यादव ने बताया कि उनके भाई की पुण्यतिथि 16 अगस्त को शहीद स्मारक पर मनाई जाती है।
विज्ञापन
शहीद के नाम पर स्थापित पीएचसी बदहाल
बीकापुर,अयोध्या। शहीद रामसूरत यादव चार बहनों और दो भाइयों में दूसरे नंबर पर थे। रामसूरत यादव के नाम से शासन ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कोछा बाजार का नामकरण किया है। पर्याप्त चिकित्सीय संसाधन उपलब्ध न होने के चलते अस्पताल बदहाली का शिकार है। सिर्फ ओपीडी के दौरान दिन में गिनती के नाममात्र मरीज ही पहुंचते हैं। रात में यहां कोई स्वास्थ्य कर्मी निवास नहीं करता है। अस्पताल में प्रसूताओं के लिए प्रसव की सुविधा तक नहीं है। शहीद के गांव और उनके स्मारक पर जाने के लिए सिर्फ खड़ंजा मार्ग है।
विज्ञापन