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अवध के आंगन में जमकर बरसे रंग
अमर उजाला ब्यूरो/फैजाबाद
Updated Thu, 24 Mar 2016 11:10 PM IST
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होली खेलते बच्चे
- फोटो : अमर उजाला
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होली का रंग सुबह से लेकर दोपहर दो-ढाई बजे तक नगर से गांव तक चटख दिखा। बृहस्पतिवार को चौराहों, सड़कों के किनारे और होलिकादहन स्थल के निकट बजते फिल्मी और भोजपुरी गीतों की धुनों पर थिरकती युवाओं की टोली आते-जाते लोगों पर पिचकारी से सतरंगी बौछारें करती रहीं।
चौक, चौराहों से लेकर गलियों तक एक दूसरे पर रंग उड़ेले जाते और अबीर-गुलाल उड़ते रहे। सुबह से शुरू होली का जश्न देर रात तक युवाओं की टीम मनाती रही। तेज आवाज में डीजे पर बजते होली गीतों पर थिरकते युवकों को देखने लोगों की भीड़ उमड़ी। किसी पर भंग की मस्ती थी, तो कोई रंग से सराबोर था।
सड़कें चौराहे और गलियां लाल-हरी, नीली-पीली हो र्गइं। बाजार बंद रहने से पर्व में हर किसी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। किसी ने एक दूसरे से रंग खेला और तो किसी ने गले मिलकर और अबीर-गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं दीं।
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इससे पूर्व बुधवार की सुबह और शाम का धुंधलका गहराया तो लोगों की भीड़ चौराहों पर सजे होलिका के आसपास एकत्र हो गई। वैदिक विधान से पूजन अर्चन के बाद होलिका में आग लगी तो सजे गुब्बारे फूटने लगे। सुबह हुई तो शहर से गांव तक चहुंओर होली के जश्न का माहौल बन गया।
सड़कों पर बच्चों व युवाओं की टोलियां पिचकारियों के साथ उतर पड़ीं। बुरा न मानो होली है, के बीच सड़क से गुजरने वालों के कपड़े पिचकारी से निकले रंगों से सराबोर होते रहे। चेहरे पर रंग और कालिख पोते जाने से लोगों की पहचान मुश्किल थी।
रिकाबगंज, चौक, नाका, साहबगंज, मोदहा, गुदड़ीबाजार, फतेहगंज के साथ ही रामनगरी के चौक-चौराहों पर ड्रम में घुले लाल-हरे, नीले-पीले रंगों के घोल एक नहीं कई थे। किसी को पिचकारी की चाह थी तो कुछ जग, लोटे गिलास से ही उलीच रहे थे। शायद ही कोई ऐसा रहा हो, जो इनकी नजरों से बच सके।
दोपहर तक सड़क पर जश्न का ऐसा माहौल रहा कि कोई भी इससे अछूता न रह सका। बच्चों के साथ बड़ों में ने भी अबीर-गुलाल उड़ाए और चेहरों पर मलकर बधाइयां दीं। दोपहर बाद रंगों की बौछार थमीं तो नहा-धोकर नए कपड़े पहनकर लोग एक दूसरे को गले लगाने और बधाइयां देने घरों से बाहर निकल पड़े।
महिलाओं और पुरुषों की टोलियां एक जगह से दूसरी जगह, एक घर से दूसरे घरों तक देर रात तक पहुंचती रहीं। टीम का लोग, गुझिया, चिप्स, पापड़ और मिठाइयां खिलाकर स्वागत करते रहे।
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चौक, चौराहों से लेकर गलियों तक एक दूसरे पर रंग उड़ेले जाते और अबीर-गुलाल उड़ते रहे। सुबह से शुरू होली का जश्न देर रात तक युवाओं की टीम मनाती रही। तेज आवाज में डीजे पर बजते होली गीतों पर थिरकते युवकों को देखने लोगों की भीड़ उमड़ी। किसी पर भंग की मस्ती थी, तो कोई रंग से सराबोर था।
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सड़कें चौराहे और गलियां लाल-हरी, नीली-पीली हो र्गइं। बाजार बंद रहने से पर्व में हर किसी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। किसी ने एक दूसरे से रंग खेला और तो किसी ने गले मिलकर और अबीर-गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं दीं।
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इससे पूर्व बुधवार की सुबह और शाम का धुंधलका गहराया तो लोगों की भीड़ चौराहों पर सजे होलिका के आसपास एकत्र हो गई। वैदिक विधान से पूजन अर्चन के बाद होलिका में आग लगी तो सजे गुब्बारे फूटने लगे। सुबह हुई तो शहर से गांव तक चहुंओर होली के जश्न का माहौल बन गया।
सड़कों पर बच्चों व युवाओं की टोलियां पिचकारियों के साथ उतर पड़ीं। बुरा न मानो होली है, के बीच सड़क से गुजरने वालों के कपड़े पिचकारी से निकले रंगों से सराबोर होते रहे। चेहरे पर रंग और कालिख पोते जाने से लोगों की पहचान मुश्किल थी।
रिकाबगंज, चौक, नाका, साहबगंज, मोदहा, गुदड़ीबाजार, फतेहगंज के साथ ही रामनगरी के चौक-चौराहों पर ड्रम में घुले लाल-हरे, नीले-पीले रंगों के घोल एक नहीं कई थे। किसी को पिचकारी की चाह थी तो कुछ जग, लोटे गिलास से ही उलीच रहे थे। शायद ही कोई ऐसा रहा हो, जो इनकी नजरों से बच सके।
दोपहर तक सड़क पर जश्न का ऐसा माहौल रहा कि कोई भी इससे अछूता न रह सका। बच्चों के साथ बड़ों में ने भी अबीर-गुलाल उड़ाए और चेहरों पर मलकर बधाइयां दीं। दोपहर बाद रंगों की बौछार थमीं तो नहा-धोकर नए कपड़े पहनकर लोग एक दूसरे को गले लगाने और बधाइयां देने घरों से बाहर निकल पड़े।
महिलाओं और पुरुषों की टोलियां एक जगह से दूसरी जगह, एक घर से दूसरे घरों तक देर रात तक पहुंचती रहीं। टीम का लोग, गुझिया, चिप्स, पापड़ और मिठाइयां खिलाकर स्वागत करते रहे।