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दुख भरे दिन बीते रे भइया, अब सुख भरे दिन आयो रे
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अयोध्या। 1990 के दशक में शुरू हुए श्रीराम मंदिर आंदोलन में अयोध्यावासियों ने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। अयोध्या आने वाले कारसेवकों को राह दिखानी हो, चाहे उन्हें आश्रय देना हो। कोई भूखा न रहे इसके लिए भोजन का इंतजाम करना हो चाहे कारसेवा में खुद भागीदारी करनी हो, अयोध्यावासी कभी पीछे नहीं रहे।
रामकाज के लिए अयोध्या के लोगों ने दलों की मर्यादाओं को लांघकर हर संभव सहयोग किया। बुधवार को ढांचा ध्वंस के सभी आरोपियों के बरी होने के फैसले के बाद उनका कहना है कि अब यह आंदोलन समाप्त हो गया। मंदिर निर्माण के फैसले के बाद थोड़ी सी कसक रह गई थी जो अब जाकर पूरी हुई। कहा,दुख भरे दिन बीत गए, अब तो सुख भरे दिन आयो रे।
मां के संघर्ष व त्याग का अब फल मिला
अयोध्या के रायगंज मोहल्ले की निवासी स्व. कृष्णा पांडेय एक संपन्न परिवार से थीं। उस समय वह महिला कांग्रेस की वरिष्ठ पदाधिकारी भी थीं। इसके बावजूद उन्होंने श्रीराम मंदिर आंदोलन में अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी भूमिका निभाई। उस समय उनके तीन मकान संघ व विहिप के बड़े पदाधिकारियों का अड्डा हुआ करते थे। इन सभी के साथ हजारों कारसेवकों के लिए रोजाना भोजन का इंतजाम करना व उनके रहने का इंतजाम अकेले कृष्णा पांडेय स्वयं करतीं थीं। आंदोलन से जुड़े बड़े नेता विनय कटियार ने भी अपने शुरुआती दिन यहीं व्यतीत किए।
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उनके पति रिटायर्ड इंजीनियर जयराम पांडेय, पुत्र चंद्रमणि व चंद्रदीप कहते हैं कि उस समय संघ के बड़े नेता उनके पास सहयोग मांगने के लिए आया करते थे। उन्होंने हरसंभव सहयोग किया। वह रात में ठेले पर पूड़ी-सब्जी लादकर शहर के कोने-कोने में छिपे कारसेवकों में बांटने के लिए अकेले निकल जाती थीं। उन्होंने भगवान राम के मंदिर के निर्माण के लिए करीब 10 वर्षों तक अन्न का त्याग किया था। उनकी अंतिम इच्छा थी कि अयोध्या में मंदिर निर्माण हो। साथ ही ढांचा ध्वंस मामले में विनय कटियार समेत अन्य लोग बरी हों। आज उनकी सभी मनोकामना पूरी हुई। संघर्ष व त्याग अब जाकर फलीभूत हुआ।
परमहंस, अशोक सिंघल समेत बलिदानी कारसेवकों की आत्मा को आज मिला संपूर्ण विश्राम
अयोध्या रेलवे स्टेशन के पास स्थित पटवा मंदिर के पुजारी सत्येंद्र दास भी इस आंदोलन के अहम गवाह हैं। उन्होंने इस आंदोलन में यथासंभव सहयोग किया था। बुधवार को फैसला आने से पूर्व वह सुंदरकांड का पाठ पूरा कर चुके थे। वह कहते हैं कि फैसला आते ही अपने आराध्य के सम्मुख खड़े होकर उनकी आराधना की और कहा प्रभु अब सभी मनोकामना पूरी हो गईं। उनका कहना है कि उस समय की गई तपस्या व त्याग का अब संपूर्ण फल मिला है। मंदिर आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले हमारे पूज्य स्व. परमहंस रामचंद्र दास व अशोक सिंघल के साथ रमेश पांडेय व वासुदेव गुप्त समेत सैकड़ों बलिदानी कारसेवकों की आत्मा को आज पूूर्ण विश्राम मिला होगा।
रामंदिर के लिए सब कुछ गंवाने वाले करोड़ों रामभक्तों को मिला न्याय
नयाघाट निवासी राम प्रसाद पांडेय, दर्शननगर निवासी ओम प्रकाश पांडेय रज्जू, टेढ़ी बाजार निवासी वीरेश श्रीवास्तव, वासुदेव घाट निवासी लालजी वर्मा, विद्याकुंड निवासी बीएन मिश्रा आदि कहते हैं कि वह मंदिर आंदोलन की शुरुआत से बुधवार तक आए फैसले में हर क्षण के गवाह हैं। 1990 व 1992 में कारसेवकों के आने के दौरान उनको भोजन व पानी उपलब्ध कराने के दौरान पुलिस की लाठियां भी खाईं लेकिन हिम्मत नहीं हारी। कहते हैं दिन बीता, दशक बीते लेकिन मंदिर बनने की मनोकामना जस की तस बनी रही। नवंबर 2019 में मंदिर निर्माण का फैसला आने के बाद जो आनंद मिला उसका वर्णन करना आसान नहीं है। फिर भी एक फांस रह ही गई थी जो अब निकल गई। आज 32 नहीं वरन उन सभी रामभक्तों को न्याय मिल गया जिन्होंने इस आंदोलन के लिए अपनी जान ही नहीं, सब कुछ गंवा दिया था।
रामकाज के लिए किया गया काम अपराध नहीं, परमहंस जी का कथन सत्य साबित हुआ
हनुमानकुंड से भाजपा पार्षद अभय श्रीवास्तव व उनके परिवार ने भी इस आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई थी। उन्होंने अपने बड़े भाई मनोज व छोटे भाई पीयूष व अन्य सहयोगियों के साथ मंदिर निर्माण के लिए विहिप के सभी आंदोलन में भागीदारी की। कारसेवकों को भोजन व नाश्ता उपलब्ध कराने में आगे रहे। फैसला आने के बाद मंदिर में दर्शन पूजन करने के बाद लोगों को मिठाई खिलाते हुए अभय कहते हैं कि हमारे प्रेरणास्रोत दिगंबर अखाड़े के महंत पूज्य स्व. परमहंस दास जी महाराज थे। मंदिर आंदोलन में सहयोग करने के लिए वह हमेशा हमें प्रेरित करते थे। हम सब अक्सर उनके पास बैठते थे। ढांचा ध्वंस में आरोपी बनने को वह अपना सौभाग्य मानते थे। वह कहते थे रामकाज के लिए किया कोई भी कार्य अपराध नहीं है। आज न्यायालय ने भी उनके इस कथन को सत्य मानकर अपना फैसला सुनाया है। अभय कहते हैं कि दुख भरे दिन बीते रे भइया, सुख भरे दिन अब आयो रे।
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रामकाज के लिए अयोध्या के लोगों ने दलों की मर्यादाओं को लांघकर हर संभव सहयोग किया। बुधवार को ढांचा ध्वंस के सभी आरोपियों के बरी होने के फैसले के बाद उनका कहना है कि अब यह आंदोलन समाप्त हो गया। मंदिर निर्माण के फैसले के बाद थोड़ी सी कसक रह गई थी जो अब जाकर पूरी हुई। कहा,दुख भरे दिन बीत गए, अब तो सुख भरे दिन आयो रे।
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मां के संघर्ष व त्याग का अब फल मिला
अयोध्या के रायगंज मोहल्ले की निवासी स्व. कृष्णा पांडेय एक संपन्न परिवार से थीं। उस समय वह महिला कांग्रेस की वरिष्ठ पदाधिकारी भी थीं। इसके बावजूद उन्होंने श्रीराम मंदिर आंदोलन में अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी भूमिका निभाई। उस समय उनके तीन मकान संघ व विहिप के बड़े पदाधिकारियों का अड्डा हुआ करते थे। इन सभी के साथ हजारों कारसेवकों के लिए रोजाना भोजन का इंतजाम करना व उनके रहने का इंतजाम अकेले कृष्णा पांडेय स्वयं करतीं थीं। आंदोलन से जुड़े बड़े नेता विनय कटियार ने भी अपने शुरुआती दिन यहीं व्यतीत किए।
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उनके पति रिटायर्ड इंजीनियर जयराम पांडेय, पुत्र चंद्रमणि व चंद्रदीप कहते हैं कि उस समय संघ के बड़े नेता उनके पास सहयोग मांगने के लिए आया करते थे। उन्होंने हरसंभव सहयोग किया। वह रात में ठेले पर पूड़ी-सब्जी लादकर शहर के कोने-कोने में छिपे कारसेवकों में बांटने के लिए अकेले निकल जाती थीं। उन्होंने भगवान राम के मंदिर के निर्माण के लिए करीब 10 वर्षों तक अन्न का त्याग किया था। उनकी अंतिम इच्छा थी कि अयोध्या में मंदिर निर्माण हो। साथ ही ढांचा ध्वंस मामले में विनय कटियार समेत अन्य लोग बरी हों। आज उनकी सभी मनोकामना पूरी हुई। संघर्ष व त्याग अब जाकर फलीभूत हुआ।
परमहंस, अशोक सिंघल समेत बलिदानी कारसेवकों की आत्मा को आज मिला संपूर्ण विश्राम
अयोध्या रेलवे स्टेशन के पास स्थित पटवा मंदिर के पुजारी सत्येंद्र दास भी इस आंदोलन के अहम गवाह हैं। उन्होंने इस आंदोलन में यथासंभव सहयोग किया था। बुधवार को फैसला आने से पूर्व वह सुंदरकांड का पाठ पूरा कर चुके थे। वह कहते हैं कि फैसला आते ही अपने आराध्य के सम्मुख खड़े होकर उनकी आराधना की और कहा प्रभु अब सभी मनोकामना पूरी हो गईं। उनका कहना है कि उस समय की गई तपस्या व त्याग का अब संपूर्ण फल मिला है। मंदिर आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले हमारे पूज्य स्व. परमहंस रामचंद्र दास व अशोक सिंघल के साथ रमेश पांडेय व वासुदेव गुप्त समेत सैकड़ों बलिदानी कारसेवकों की आत्मा को आज पूूर्ण विश्राम मिला होगा।
रामंदिर के लिए सब कुछ गंवाने वाले करोड़ों रामभक्तों को मिला न्याय
नयाघाट निवासी राम प्रसाद पांडेय, दर्शननगर निवासी ओम प्रकाश पांडेय रज्जू, टेढ़ी बाजार निवासी वीरेश श्रीवास्तव, वासुदेव घाट निवासी लालजी वर्मा, विद्याकुंड निवासी बीएन मिश्रा आदि कहते हैं कि वह मंदिर आंदोलन की शुरुआत से बुधवार तक आए फैसले में हर क्षण के गवाह हैं। 1990 व 1992 में कारसेवकों के आने के दौरान उनको भोजन व पानी उपलब्ध कराने के दौरान पुलिस की लाठियां भी खाईं लेकिन हिम्मत नहीं हारी। कहते हैं दिन बीता, दशक बीते लेकिन मंदिर बनने की मनोकामना जस की तस बनी रही। नवंबर 2019 में मंदिर निर्माण का फैसला आने के बाद जो आनंद मिला उसका वर्णन करना आसान नहीं है। फिर भी एक फांस रह ही गई थी जो अब निकल गई। आज 32 नहीं वरन उन सभी रामभक्तों को न्याय मिल गया जिन्होंने इस आंदोलन के लिए अपनी जान ही नहीं, सब कुछ गंवा दिया था।
रामकाज के लिए किया गया काम अपराध नहीं, परमहंस जी का कथन सत्य साबित हुआ
हनुमानकुंड से भाजपा पार्षद अभय श्रीवास्तव व उनके परिवार ने भी इस आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई थी। उन्होंने अपने बड़े भाई मनोज व छोटे भाई पीयूष व अन्य सहयोगियों के साथ मंदिर निर्माण के लिए विहिप के सभी आंदोलन में भागीदारी की। कारसेवकों को भोजन व नाश्ता उपलब्ध कराने में आगे रहे। फैसला आने के बाद मंदिर में दर्शन पूजन करने के बाद लोगों को मिठाई खिलाते हुए अभय कहते हैं कि हमारे प्रेरणास्रोत दिगंबर अखाड़े के महंत पूज्य स्व. परमहंस दास जी महाराज थे। मंदिर आंदोलन में सहयोग करने के लिए वह हमेशा हमें प्रेरित करते थे। हम सब अक्सर उनके पास बैठते थे। ढांचा ध्वंस में आरोपी बनने को वह अपना सौभाग्य मानते थे। वह कहते थे रामकाज के लिए किया कोई भी कार्य अपराध नहीं है। आज न्यायालय ने भी उनके इस कथन को सत्य मानकर अपना फैसला सुनाया है। अभय कहते हैं कि दुख भरे दिन बीते रे भइया, सुख भरे दिन अब आयो रे।