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डकैत पंचम सिंह ने माना दस्यु जीवन सबसे बड़ी भूल
अमर उजाला ब्यूरो इटावा
Updated Tue, 28 Feb 2017 11:18 PM IST
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उदी मोड़ पर आध्यात्मिक गोष्ठी को संबोधित करते पूर्व दस्यु पंचम सिंह चौहान।
- फोटो : amarujala
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सत्संग में वह शक्ति है जो बुरे से बुरे व्यक्ति का भी हृदय परिवर्तन कर सकती है। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के संपर्क में आने से बडे़ से बड़ा दुर्दांत व्यक्ति भी राजयोगी बन जाता है। ये बात यहां उदी मोड़ पर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के तत्वावधान में आयोजित आध्यात्मिक गोष्ठी में पूर्व दस्यु पंचम सिंह चौहान ने कही। उन्होंने दस्यु जीवन को सबसे खराब बता लोगों से देश की मुख्य धारा से जुड़कर आगे बढ़ने का आह्वान किया।
पंचम सिंह चौहान ने कहा कि दस्यु जीवन सबसे खराब है। मैंने गांव की छोटी सी लड़ाई के पीछे जंगल में जाकर कानून को हाथ में लिया। वह हमारे जीवन की सबसे बड़ी भूल थी। गांव में चुनाव को लेकर विवाद हुआ। उस विवाद में मेरा पूरा परिवार घायल हो गया। मैं न्याय के लिए भटकता रहा। बाद में कानून को हाथ में लेकर जंगल की शरण ली। बागी जीवन में कभी चैन से सो नहीं सका। गिरोह में 90 सदस्य थे, खूब हनक थी,धन था परंतु सुख चैन दूर तक नहीं था।
पूरी चंबल घाटी में उस समय 560 डाकू थे। सभी पर मिला कर दो करोड़ का इनाम था। मैंने जयप्रकाश नारायण एवं विनोवा भावे से प्रभावित होकर आत्मसमर्पण कर अत्याचार का रास्ता छोड़ दिया। काफी समय जेल में बिताने के बाद मृत्यु दंड की सजा सुनाई। राष्ट्रपति से जीवन दान मिला। जेल से बाहर आने के बाद से ही मैने योगी बनकर लोगों को बुराई से दूर रहने का संदेश देना शुरू कर दिया। 94वर्ष की उम्र में में अब चिंता मुक्त हूं।
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कार्यक्रम की संयोजक ज्योति ने कहा कि समाज में भटक रहे युवाओं को अपराध से दूर रहकर विकास की मुख्य धारा में जुड़ना चाहिए। उन्होंने लोगो से संस्कारित बनने की अपील की । इस अवसर पर खंड विकास अधिकारी बढ़पुरा प्रदीप सक्सेना, भैरों सिंह भदौरिया, लक्ष्मी नारायन,जयचंद सिंह भदौरिया, सुधा बहन उपस्थित रहे।
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पंचम सिंह चौहान ने कहा कि दस्यु जीवन सबसे खराब है। मैंने गांव की छोटी सी लड़ाई के पीछे जंगल में जाकर कानून को हाथ में लिया। वह हमारे जीवन की सबसे बड़ी भूल थी। गांव में चुनाव को लेकर विवाद हुआ। उस विवाद में मेरा पूरा परिवार घायल हो गया। मैं न्याय के लिए भटकता रहा। बाद में कानून को हाथ में लेकर जंगल की शरण ली। बागी जीवन में कभी चैन से सो नहीं सका। गिरोह में 90 सदस्य थे, खूब हनक थी,धन था परंतु सुख चैन दूर तक नहीं था।
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पूरी चंबल घाटी में उस समय 560 डाकू थे। सभी पर मिला कर दो करोड़ का इनाम था। मैंने जयप्रकाश नारायण एवं विनोवा भावे से प्रभावित होकर आत्मसमर्पण कर अत्याचार का रास्ता छोड़ दिया। काफी समय जेल में बिताने के बाद मृत्यु दंड की सजा सुनाई। राष्ट्रपति से जीवन दान मिला। जेल से बाहर आने के बाद से ही मैने योगी बनकर लोगों को बुराई से दूर रहने का संदेश देना शुरू कर दिया। 94वर्ष की उम्र में में अब चिंता मुक्त हूं।
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कार्यक्रम की संयोजक ज्योति ने कहा कि समाज में भटक रहे युवाओं को अपराध से दूर रहकर विकास की मुख्य धारा में जुड़ना चाहिए। उन्होंने लोगो से संस्कारित बनने की अपील की । इस अवसर पर खंड विकास अधिकारी बढ़पुरा प्रदीप सक्सेना, भैरों सिंह भदौरिया, लक्ष्मी नारायन,जयचंद सिंह भदौरिया, सुधा बहन उपस्थित रहे।