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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रमेश चंद्र दीक्षित नहीं रहे

Wed, 17 Aug 2016 01:02 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो इटावा
अमर उजाला ब्यूरो इटावा Updated Wed, 17 Aug 2016 01:02 AM IST
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Ramesh Chandra Dixit are not freedom fighters
लखना के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रमेश चंद्र दीक्षित को श्रद्धांजलि देते चेयरमैन सतीश चंद्र वर्मा - फोटो : अमर उजाला

बकेवर। देश को आजादी दिलाने में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले लखना कस्बे के दीक्षितान मोहल्ला निवासी 97 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रमेश चंद्र दीक्षित आजादी की 70वीं वर्षगांठ मनाने के बाद वह चिरनिद्रा में लीन हो गए।  उनके निधन से लखना और बकेवर में शोक का माहौल है।

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दीक्षितान मोहल्ला निवासी सेवानिवृत्त खंड विकास अधिकारी व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 97 वर्षीय रमेश चंद्र दीक्षित का मंगलवार की सुबह निधन हो गया। उनके निधन की खबर मिलते ही नगर में शोक की लहर दौड़ गई।
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उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा रहा। उनके पुत्र सुशील कुमार दीक्षित ने उनके निधन की सूचना राजस्व विभाग को दी। थानाध्यक्ष भोलू सिंह भाटी पुलिस बल के साथ उनके आवास पर पहुंचे।
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लखना नगरपंचायत अध्यक्ष सतीश चंद्र वर्मा, ईओ शेरबहादुर, योगेश दीक्षित, हरी दीक्षित मौके पर पहुंचे। उनके शरीर को तिरंगे से ढककर सम्मान दिया।  उनकी शवयात्रा में भारी हुजूम उमड़ा। डिभौली यमुना घाट पर उनके ज्येष्ठ पुत्र सुशील दीक्षित ने मुखाग्नि दी।

स्व. रमेश चंद्र दीक्षित नौ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे से प्रभावित होकर 11 अगस्त को ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में आजादी की जंग में कूद गए थे। उन्होंने अपने साथी तुलसीराम, रामसिंह सोनी, रुद्र प्रताप सिंह, प्रभुदयाल, जगत नारायण, छोटे, साधू सिंह, नत्थू, छिद्दू, बाबूराम, प्रयाग नरायन, ज्योति शंकर आदि के साथ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़ते हुए लखना डाकघर को आग के हवाले कर दिया।

टेलीफोन की लाइनें भी उखाड़ फेंकी। लखना व बकेवर को ब्रिटिश प्रशासन से मुक्त करा लिया। इसके बाद 16 मई 1942 को ब्रिटिश पुलिस ने रमेश चंद्र दीक्षित सहित उनके साथियों को स्पेशल मजिस्ट्रेट मनसूद अली की अदालत में पेश किया। जहां उन्हें व उनके साथियों को एक साल का कारावास और पांच सौ रुपये जुर्माने की सजा हुई। जिस समय रमेश चंद्र दीक्षित जेल गए उस समय उनकी उम्र करीब 22 वर्ष की थी। पति के जेल जाने के वियोग में तीन महीने बाद उनकी पत्नी भी चल बसीं। कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया के नेतृत्व में वह आजादी की लड़ाई लड़ते रहे। इंटर पास रमेश चंद्र दीक्षित देश आजाद होने के बाद खंड विकास अधिकारी के रूप में तैनाती पाकर जनता की सेवा में लग गए।


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रमेश चंद्र दीक्षित ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को दी जाने वाली पेंशन लेने से भी इनकार कर दिया था। जिसके चलते वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की लाभ की सूची से हटा दिए गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 15 अगस्त 1972 को कमल पत्र और प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने उन्हें सम्मान प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया था।

 

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