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महान क्रांतिवीर गेंदालाल के नाम पर डाक टिकट हो जारी
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इटावा। इतिहास के कालखंड से भुला दिए गए महान क्रांतिवीर गेंदालाल दीक्षित का बलिदान शताब्दी वर्ष को यादगार बनाने के लिए चंबल फाउंडेशन ने नुमाइश मैदान पर बैठक की। बोर्ड सदस्य डॉ. कमल कुमार कुशवाहा और रंजीत सिंह ने कहा कि अमर शहीद गेंदालाल दीक्षित ने यमुना चंबल के बीहड़ों में ज्ञान के प्रकाश के साथ आजादी की अलख को जन-जन में रोपित किया था।
उन्होंने कहा कि महान क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित का नाम भारतीय क्रांतिकारी इतिहास की शीर्ष सूची में शामिल है। क्रांतिकारियों के द्रोणाचार्य के नाम से विश्वविख्यात गेंदालाल दीक्षित का जन्म आगरा जिला मुख्यालय से करीब 72 किमी दूर बाह तहसील के मई गांव में 20 नवंबर 1888 को हुआ था। गेंदालाल ने आगरा मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ कर इटावा जिले की औरैया तहसील में डीएवी स्कूल के हेडमास्टर का पदभार संभाला था।
गोरों से मोर्चा लेने के लिए दीक्षित जी ने अपने बलबूते मातृवेदी के 5 हजार लड़ाका सैनिकों और राजस्थान की खारवा रियासत से 10 हजार सैनिकों का बंदोबस्त कर लिया था। वे पंजाब और दिल्ली के क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत का तख्ता पलट देना चाहते थे। पूरी तैयारी हो चुकी थी लेकिन मुखबिरी से सब कुछ बिखर गया। अगर यह एक्शन कामयाब हुआ होता तो 1857 से बड़ी ऐतिहासिक घटना आकार लेती। ये मलाल गेंदालाल दीक्षित को आखिरी वक्त तक रहा। 21 दिसंबर 1920 को दिल्ली के अस्पताल में महान क्रांतिकारी अपनी अंतिम यात्रा पर चले गए। चंबल फाउंडेशन के संस्थापक शाह आलम ने कहा कि अमर बलिदानी का शताब्दी वर्ष शुरू हो चुका है। चंबल फाउंडेशन ने देश के सबसे बड़े गुप्त क्रांतिकारी दल मातृवेदी के महानायक गेंदालाल दीक्षित के बलिदान शताब्दी वर्ष को यादगार बनाने की अपील की है।
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शताब्दी वर्ष में चंबल फाउंडेशन का प्रस्ताव
1. गेंदालाल पर डाक टिकट जारी किया जाए।
2. क्रांतिवीर का शोधपरक जीवन परिचय प्रकाशित किया जाय।
3. गेंदालाल दीक्षित का गौरवशाली इतिहास पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।
4. गेंदालाल जी के जमींदोज हो चुके घर को राष्ट्रीय स्मारक बनाया जाए।
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उन्होंने कहा कि महान क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित का नाम भारतीय क्रांतिकारी इतिहास की शीर्ष सूची में शामिल है। क्रांतिकारियों के द्रोणाचार्य के नाम से विश्वविख्यात गेंदालाल दीक्षित का जन्म आगरा जिला मुख्यालय से करीब 72 किमी दूर बाह तहसील के मई गांव में 20 नवंबर 1888 को हुआ था। गेंदालाल ने आगरा मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ कर इटावा जिले की औरैया तहसील में डीएवी स्कूल के हेडमास्टर का पदभार संभाला था।
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गोरों से मोर्चा लेने के लिए दीक्षित जी ने अपने बलबूते मातृवेदी के 5 हजार लड़ाका सैनिकों और राजस्थान की खारवा रियासत से 10 हजार सैनिकों का बंदोबस्त कर लिया था। वे पंजाब और दिल्ली के क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत का तख्ता पलट देना चाहते थे। पूरी तैयारी हो चुकी थी लेकिन मुखबिरी से सब कुछ बिखर गया। अगर यह एक्शन कामयाब हुआ होता तो 1857 से बड़ी ऐतिहासिक घटना आकार लेती। ये मलाल गेंदालाल दीक्षित को आखिरी वक्त तक रहा। 21 दिसंबर 1920 को दिल्ली के अस्पताल में महान क्रांतिकारी अपनी अंतिम यात्रा पर चले गए। चंबल फाउंडेशन के संस्थापक शाह आलम ने कहा कि अमर बलिदानी का शताब्दी वर्ष शुरू हो चुका है। चंबल फाउंडेशन ने देश के सबसे बड़े गुप्त क्रांतिकारी दल मातृवेदी के महानायक गेंदालाल दीक्षित के बलिदान शताब्दी वर्ष को यादगार बनाने की अपील की है।
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शताब्दी वर्ष में चंबल फाउंडेशन का प्रस्ताव
1. गेंदालाल पर डाक टिकट जारी किया जाए।
2. क्रांतिवीर का शोधपरक जीवन परिचय प्रकाशित किया जाय।
3. गेंदालाल दीक्षित का गौरवशाली इतिहास पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।
4. गेंदालाल जी के जमींदोज हो चुके घर को राष्ट्रीय स्मारक बनाया जाए।