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‘उर्दू भाषा को धर्म वर्ग से जोड़ना गलत’
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा
Updated Sun, 08 Mar 2015 11:31 PM IST
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शम्सी पयामी अंजुमन हिंद के तत्वावधान में मदरसा अरबिया कुरानया में आयोजित कौमी उर्दू कांफ्रेंस में माईनॉरिटी बीएड कॉलेज कोलकाता के पूर्व प्राध्यापक प्रोफेसर मुजफ्फर अली ने कहा कि उर्दू हिंदुस्तानी जुबान है। यह उन चंद जुबानों में हैं, जो भारत में पैदा हुई। आज भारत में कहीं भी चले जाएं, उर्दू पढ़ने और बोलने वाले मिल जाएंगे।
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श्री अली ने कहा कि आज तकनीक का दौर है, इसलिए उर्दू को नई तकनीक से जोड़े बिना तरक्की नहीं दी जा सकती। अपनी नई नस्ल को उर्दू सिखाने के लिए घरों में इंतजाम करने होंगे। उन्होंने कहा कि उर्दू को किसी धर्म, वर्ग और क्षेत्र से जोड़ना गलत है।
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यह देश की एकता और संस्कृति की भाषा है। उर्दू पढ़ाना, उसको तरक्की देना और उसकी हिफाजत करना हर सच्चे हिंदुस्तानी की जिम्मेदारी है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उर्दू के प्रख्यात विद्वान मेहर इलाही नदीम ने कहा कि महात्मा गांधी ने आजादी के बाद ऐलान किया था कि इस मुल्क की राष्ट्रभाषा हिंदुस्तानी यानि उर्दू होगी, लेकिन उसके साथ ज्यादती की गई।
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आज उर्दू को उसका हक नहीं मिल पा रहा है। इसलिए हम सब को मिलजुलकर एकता के साथ उर्दू को उसका जायज हक दिलाने की कोशिश करनी होगी। अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय के कृषि संकाय के डीन प्रो. डा. शमीम अहमद ने कहा कि जिंदा कौमें वो होती हैं जो अपनी जुबान को जिंदा रखती हैं।
उर्दू किताबों को नई नस्ल तक पहुंचाने के लिए उनका डिजिटलाइजेशन किया जाना चाहिए। मौलाना डॉ. उबैद इकबाल आसिम ने कहा कि मदरसों व मकतबों से ही उर्दू हिंदुस्तान में जिंदा है। इन इदारों से जुड़े हुए लोग उर्दू अदब की खिदमत कर रहे हैं।
वहीदुल्लाह खां सईदी ने कहा कि जब सरकार ने इस पूरी शिक्षा से उर्दू मीडियम खत्म करके उसे तबाह करने की कोशिश की तो इन मदरसों ने ही इसे सहारा दिया। इस मौके पर सपा जिलाध्यक्ष अशोक यादव, मुफ्ती मोहम्मद रेहान, मौलाना अब्दुल माजिद, जुनैद अहमद, शमशाद अहमद आदि ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय उर्दू भाषा परिषद के सहयोग से किया गया।