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जानकारी के अभाव में बढ़ रहा ग्लूकोमा
Fri, 15 Mar 2019 11:58 PM IST
प्रतीक दुबे
इटावा, अमर उजाला ब्यूरो
इटावा, अमर उजाला ब्यूरो
Published by: प्रतीक दुबे
Updated Fri, 15 Mar 2019 11:58 PM IST
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ग्लूकोमा सप्ताह में बोलते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डा. राजकुमार। अमर उजाला
- फोटो : amar ujala
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उप्र आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के नेत्र रोग विभाग में विश्व ग्लूकोमा सप्ताह पर विशेष जन जागरुकता व्याख्यान का आयोजन किया गया। कुलपति प्रो. डा. राजकुमार ने कहा कि विश्व में अंधेपन का एक बहुत बड़ा कारण ग्लूकोमा है। आज विश्व में ग्लूकोमा बीमारी की जानकारी न होने के कारण लगभग 50 प्रतिशत लोग अन्धेपन के शिकार हो चुके हैं। यदि समय से ग्लूकोमा का पता लग जाए तो इलाज दवाओं, लेजर चिकित्सा या ऑपरेशन से इलाज संभव है।
उन्होंने कहा कि 40 वर्ष से ऊपर के प्रत्येक वयस्क को एक बार अपने आंखों की जांच अवश्य करानी चाहिए। साथ ही मधुमेह या ब्लड प्रेशर के मरीज भी नियमित रूप से आंखों की जांच करायें। विभागाध्यक्ष नेत्र रोग विभाग डा. रविरंजन ने बताया कि एक बार ग्लूकोमा का पता लगने के बाद नियमित दवाओं से इसे कंट्रोल किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि ग्लूकोमा की बीमारी अनुवांशिक भी हो सकती है। जरूरत है समय से इस बीमारी का पता लगने की। ग्लूकोमा एवं नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. रीना शर्मा ने बताया कि ग्लूकोमा में आमतौर पर कोई आरंभिक लक्षण नहीं होते। यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता है और किसी व्यक्ति की दृष्टि को बहुत ही धीमी गति से समाप्त कर सकता है। उन्होंने बताया कि ग्लूकोमा से ग्रसित मरीज की रोशनी यदि एक बार चली गई तो उसे पुन: वापस नहीं लाई जा सकती। अत: सही समय पर परीक्षण एवं इलाज द्वारा ग्लूकोमा से बचा जा सकता है।
इस अवसर पर नेत्र रोग विभाग के अलावा अन्य विभागों के फेकल्टी मेंबर सीनियर एवं जूनियर रेजिडेंट, विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी अनिल कुमार पांडेय मौजूद रहे।
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उन्होंने कहा कि 40 वर्ष से ऊपर के प्रत्येक वयस्क को एक बार अपने आंखों की जांच अवश्य करानी चाहिए। साथ ही मधुमेह या ब्लड प्रेशर के मरीज भी नियमित रूप से आंखों की जांच करायें। विभागाध्यक्ष नेत्र रोग विभाग डा. रविरंजन ने बताया कि एक बार ग्लूकोमा का पता लगने के बाद नियमित दवाओं से इसे कंट्रोल किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि ग्लूकोमा की बीमारी अनुवांशिक भी हो सकती है। जरूरत है समय से इस बीमारी का पता लगने की। ग्लूकोमा एवं नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. रीना शर्मा ने बताया कि ग्लूकोमा में आमतौर पर कोई आरंभिक लक्षण नहीं होते। यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता है और किसी व्यक्ति की दृष्टि को बहुत ही धीमी गति से समाप्त कर सकता है। उन्होंने बताया कि ग्लूकोमा से ग्रसित मरीज की रोशनी यदि एक बार चली गई तो उसे पुन: वापस नहीं लाई जा सकती। अत: सही समय पर परीक्षण एवं इलाज द्वारा ग्लूकोमा से बचा जा सकता है।
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इस अवसर पर नेत्र रोग विभाग के अलावा अन्य विभागों के फेकल्टी मेंबर सीनियर एवं जूनियर रेजिडेंट, विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी अनिल कुमार पांडेय मौजूद रहे।
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