फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Etawah News ›   Described by writers, need for Cultural education

जो संस्कृति से जोड़े, उस शिक्षा की जरूरत

Mon, 22 Dec 2014 12:20 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा Updated Mon, 22 Dec 2014 12:20 AM IST
विज्ञापन
Described by writers, need for Cultural education
हिंदी के सारस्वत सम्मान समारोह में जहां एक ओर हिंदी भाषा और साहित्य से जुड़े मनीषी सम्मानित हुए। वहीं मौजूदा परिवेश में हिंदी की स्थिति पर चिंतन भी हुआ। मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति पंकज मित्तल ने कहा कि हिंदी विश्वयात्रा पर निकल पड़ी है। अब विजयश्री पाकर ही लौटेगी।
विज्ञापन


उन्होंने मैकाले की शिक्षा पद्धति को हिंदी के विकास में सबसे नुकसान दायक बताया। यह पद्धति सृजनात्मक न होकर ब्रिटिश शासन से प्रायोजित रही। आज हमें ऐसी शिक्षा की जरूरत है, जो हमारी संस्कृति से जोड़ सके। समारोह अध्यक्ष पूर्व राज्यपाल टीएन चतुर्वेदी ने कहा कि वह अंग्रेजी के विरोधी नहीं हैं, लेकिन अंग्रेजी का वर्चस्व नहीं रहना चाहिए।
विज्ञापन


विद्यालयों की भाषा मातृभाषा होनी चाहिए। गीतकार डॉ. कुंवर बेचैन ने कहा कि यदि व्यक्ति भाषा के बजाय स्वर में खो जाएं तो भाषा विवाद समाप्त हो सकता है। स्वर ही आत्मा का संगीत होता है। उन्होंने कहा कि लोकरंजन को लोक रंज नहीं बनने देना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन


तमिलनाडु के हिंदी लेखक डॉ. नागेश्वर सुंदरम ने कहा कि तमिलनाडु में हिंदी के विरोध होने की बात कही जाती है। जबकि यह महज राजनैतिक षड्यंत्र है। वहां भी लोग तेजी से हिंदी सीख रहे हैं। दक्षिण भारत के हिंदी इतर भाषी को उत्तर भारत में सम्मानित करने से अच्छा संदेश जाता है।

ऐतिहासिक उपन्यासकार मेवाराम ने एक शोधार्थी के तौर पर कड़ी मेहनत के बाद भी पुस्तक के संयोजन एवं प्रकाशन में आने वाली परेशानी को उकेरा। उन्होंने प्रकाशन के लिए लंबित पड़े उपन्यास का भी जिक्र किया। जिस पर टीएन चतुर्वेदी ने उन्हें आश्वस्त भी किया कि वह इस संबंध में राज्यपाल से बात करेंगे।

डॉ. कृष्ण कुमार ने कहा कि मैकाले शिक्षा पद्धति से भारत में अंग्रेजीयत बढ़ती जा रही है। जब तक हर भारतीय भाषा का सम्मान नहीं होगा, तब तक भारत एक नहीं होगा।


सर्दी के बावजूद जुटे लोग
कंपकंपाती सर्दी के बावजूद कार्यक्रम में काफी लोग जुटे। हालांकि कवर्ड पंडाल होने की वजह से अंदर बैठे लोगों को सर्दी का अहसास बाहर की अपेक्षाकृत कुछ कम रहा। विदेश से आए डा. कृष्ण कुमार ने तो अपने संबोधन में इसका अहसास भी करा दिया। बोले मैं ठंडे प्रदेश से आया हूं, फिर भी यहां आकर उनकी टांगें कांप रही हैं। उपस्थित लोगों से कहा कि आप लोग कैसे बैठे हैं। उन्हें ताज्जुब है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed