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मतदाताओं की चुप्पी से माहौल का अंदाजा नहीं
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निवाड़ीकला। मतदान के अब छह दिन ही शेष है। राजनीतिक जानकार चुप्पी के कारण इस बार मतदाताओं का रुख नहीं भांप पा रहे हैं। मतदाताओं के किसी का भी खुला समर्थन न करने के कारण माहौल का पता नहीं लग पा रहा है।
कोरोना संक्रमण के बीच हो रहे विधानसभा चुनाव में इस बार जनसभाएं और सड़कों पर नारेबाजी नहीं हो रही है। सभी दलों के प्रत्याशी घर-घर जनसंपर्क करने में जुटे हैं। मतदाता है कि पूरी तरह मौन है। प्रत्याशियों को मतदाताओं की खामोशी रास नहीं आ रही है। मतदाताओं की चुप्पी मतदान के दिन ही टूटेगी लेकिन तब प्रत्याशी कोई कसर नहीं छोड़ना चाह रहे है। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि इस बार मतदाता भी चालाकी दिखा रहा है। जिस दल का प्रत्याशी अपने पक्ष में मतदान की बात करता है। मतदाता भी हां में हां मिला देता है। यहां तक की मतदाता प्रत्येक दल के नेताओं और समर्थकों को संतोषजनक जवाब देकर उन्हें दुखी नहीं कर रहे है।
ग्रामीण क्षेत्र के मतदाताओं का कहना है कि अभी तक नेता जी ही आश्वासन देते थे। अब हम लोग दे रहे हैं तो इसमें हर्ज क्या है। राजनीतिक जानकार डॉ. राजेश कुमार का कहना है कि डिजिटल प्रचार ने मतदाताओं का रुख भांपने वाले कयासों पर काफी हद तक रोक लगाई है। अब तो दो तीन चरणों के मतदान प्रतिशत को देखकर ही कुछ कयास लगाए जा सकते है। पहले जनसभाओं और रैलियों में भीड़ से अंदाजा लग जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाता है।
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कोरोना संक्रमण के बीच हो रहे विधानसभा चुनाव में इस बार जनसभाएं और सड़कों पर नारेबाजी नहीं हो रही है। सभी दलों के प्रत्याशी घर-घर जनसंपर्क करने में जुटे हैं। मतदाता है कि पूरी तरह मौन है। प्रत्याशियों को मतदाताओं की खामोशी रास नहीं आ रही है। मतदाताओं की चुप्पी मतदान के दिन ही टूटेगी लेकिन तब प्रत्याशी कोई कसर नहीं छोड़ना चाह रहे है। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि इस बार मतदाता भी चालाकी दिखा रहा है। जिस दल का प्रत्याशी अपने पक्ष में मतदान की बात करता है। मतदाता भी हां में हां मिला देता है। यहां तक की मतदाता प्रत्येक दल के नेताओं और समर्थकों को संतोषजनक जवाब देकर उन्हें दुखी नहीं कर रहे है।
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ग्रामीण क्षेत्र के मतदाताओं का कहना है कि अभी तक नेता जी ही आश्वासन देते थे। अब हम लोग दे रहे हैं तो इसमें हर्ज क्या है। राजनीतिक जानकार डॉ. राजेश कुमार का कहना है कि डिजिटल प्रचार ने मतदाताओं का रुख भांपने वाले कयासों पर काफी हद तक रोक लगाई है। अब तो दो तीन चरणों के मतदान प्रतिशत को देखकर ही कुछ कयास लगाए जा सकते है। पहले जनसभाओं और रैलियों में भीड़ से अंदाजा लग जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाता है।
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