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चुनावी माहौल से गायब हुआ शोर
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निवाड़ीकला। कोरोना के चलते चुनाव प्रचार काफी हाईटेक होता जा रहा है। बुजुर्ग बताते हैं कि उनके समय चुनाव प्रचार में लाउडस्पीकर, तांगा, बड़े-बड़े जुलूस निकलते थे। अब चुनावी शोर काफी हद तक थम गया है।
बुजुर्गों ने बताया कि पहले चुनाव प्रचार में बैलगाड़ी, तांगा, कार का इस्तेमाल होता था। प्रत्याशी और उनके समर्थक अधिक से अधिक मतदाताओं से संपर्क करने थे। कई-कई किलोमीटर पैदल चलते भी थे। रात हो जाने पर वहीं विश्राम करते थे, सुबह उठते ही फिर प्रचार में जुट जाते थे। आज के दौरन में प्रचार के तरीके बदल गए हैं। अब नेता बड़ी-बड़ी गाड़ी में चलते हैं।
सोशल मीडिया पर अब असली चुनाव प्रचार होता है। इनकी मदद से नेता अपनी बात दूर-दूर तक पहुंचाने का काम करते हैं।
निवाड़ीकला निवासी बुजुर्ग गणेश शंकर गुप्ता ने बताया कि पहले चुनावों और अब के चुनावों में जमीन-आसमान का फर्क हैं। पहले रेडियो पर प्रचार होता था, अब नहीं।
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चुनाव प्रचार हाईटेक होने की वजह से अब झंडा और बिल्ला बिल्कुल गायब ही हो गए हैं। वही बैनर भी नहीं दिखाई देते । पहले नेता और उनके समर्थक झंडा और बिल्ला गांव गांव में बांट देते थे छोटे छोटे बच्चे एक साथ कई पार्टियों के बिल्ला लगाकर घूमते नजर आते थे। राजनैतिक जानकार झंडा और होर्डिंग से चुनावी माहौल को भांप लेते थे लेकिन अब किसी की भी छत पर झंडा नही दिखाई देता।
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बुजुर्गों ने बताया कि पहले चुनाव प्रचार में बैलगाड़ी, तांगा, कार का इस्तेमाल होता था। प्रत्याशी और उनके समर्थक अधिक से अधिक मतदाताओं से संपर्क करने थे। कई-कई किलोमीटर पैदल चलते भी थे। रात हो जाने पर वहीं विश्राम करते थे, सुबह उठते ही फिर प्रचार में जुट जाते थे। आज के दौरन में प्रचार के तरीके बदल गए हैं। अब नेता बड़ी-बड़ी गाड़ी में चलते हैं।
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सोशल मीडिया पर अब असली चुनाव प्रचार होता है। इनकी मदद से नेता अपनी बात दूर-दूर तक पहुंचाने का काम करते हैं।
निवाड़ीकला निवासी बुजुर्ग गणेश शंकर गुप्ता ने बताया कि पहले चुनावों और अब के चुनावों में जमीन-आसमान का फर्क हैं। पहले रेडियो पर प्रचार होता था, अब नहीं।
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चुनाव प्रचार हाईटेक होने की वजह से अब झंडा और बिल्ला बिल्कुल गायब ही हो गए हैं। वही बैनर भी नहीं दिखाई देते । पहले नेता और उनके समर्थक झंडा और बिल्ला गांव गांव में बांट देते थे छोटे छोटे बच्चे एक साथ कई पार्टियों के बिल्ला लगाकर घूमते नजर आते थे। राजनैतिक जानकार झंडा और होर्डिंग से चुनावी माहौल को भांप लेते थे लेकिन अब किसी की भी छत पर झंडा नही दिखाई देता।