{"_id":"618030f0becf7c75ec5b731f","slug":"ayurved-hospital-waiting-for-facilities-etawah-news-knp6617887112","type":"story","status":"publish","title_hn":"सुविधाओं की बाट जोहते आयुर्वेद अस्पताल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सुविधाओं की बाट जोहते आयुर्वेद अस्पताल
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
निवाड़ीकला। प्रशासनिक उपेक्षा और कर्मचारियों की कमी के कारण जिले 27 सरकारी आयुर्वेदिक अस्पताल बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। चिकित्सा की यह पुरातन व्यवस्था अब सिर्फ कागजों और खंडहर में बदलकर रह गई है, जिससे लोगों का इस व्यवस्था से विश्वास हटकर अंग्रेजी दवाओं की ओर बढ़ गया है। जो कहीं न कहीं हमारी परंपरागत चिकित्सा व्यवस्था के लुप्त करने की ओर अग्रसर कर रहा है।
जिले के अधिकतर आयुर्वेदिक संस्थानों की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। कोई अस्पताल खंडहर में चल रहा, तो कहीं बिना डॉक्टर के ही काम चलाया जा रहा है। डॉक्टरों की कमी के कारण अधिकतर केंद्रों पर फार्मासिस्ट ही औषधियों का वितरण कर रहे हैं।
बदहाली और बदइंतजामी के बीच इन केंद्रों से मरीज भी दूरी बनाने लगे है। जनपद के 27 राजकीय आयुर्वेदिक अस्पतालों में से चार की स्थिति काफी अच्छी है। अन्य अस्पताल किराये के मकानों में संचालित है तो किसी में पानी टपकता है।
विज्ञापन
विभाग के अनुसार, दो संस्थान पूठन सकरौली और अजबपुर काफी अच्छी स्थिति में है। विभाग के डॉ. कमल कुशवाह ने बताया कि कोरोना काल सहित बाढ़ के समय पर आयुर्वेद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
वहीं सरकार की ओर से भी आयुर्वेद को पर्याप्त मात्रा में दवायें समय उपलब्ध होती रही।
बाढ़ के समय निभाई थी महत्वपूर्ण भूमिका
यमुना और चंबल क्षेत्र में बीते महीने आई बाढ़ से जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया था। ऐसे में आयुर्वेद ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन दिनों आयुर्वेदिक और यूनानी विभाग के डॉक्टर और सहकर्मियों ने बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में शिविर लगाकर ग्रामीणों को राहत देने का काम किया था, जिसे लोगों ने काफी सराहा भी था।
इसलिए मनाते धनतेरस को आयुर्वेद दिवस
सनातन धर्म के जानकारों की माने तो भगवान धनवंतरि की पूजा करने से असाध्य रोगों से मनुष्य को राहत मिलती है। साथ ही विशेष दिन पर खरीदी गई चल-अचल संपत्ति का एक अलग महत्व है।
यही कारण है कि धनतेरस के दिन विशेष पूजा के साथ-साथ खरीदारी की भी वर्षों पुरानी परंपरा आज भी कायम है। दीपावली से ठीक दो दिन पहले होने वाले धनतेरस के पर्व का इतिहास भी आयुर्वेद से ही जुड़ा हुआ है।
इस दिन ही भगवान धनवंतरि का जन्म हुआ था, जिन्हें भारतीय इतिहास में आयुर्वेद का जनक माना जाता है। इसी कारण आयुर्वेदिक दिवस हर वर्ष धनतेरस को ही मनाया जाता है।
वर्ष 2016 से हर साल राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष छठवां आयुर्वेद दिवस दो नवंबर को मनाया जाएगा।
विज्ञापन
जिले के अधिकतर आयुर्वेदिक संस्थानों की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। कोई अस्पताल खंडहर में चल रहा, तो कहीं बिना डॉक्टर के ही काम चलाया जा रहा है। डॉक्टरों की कमी के कारण अधिकतर केंद्रों पर फार्मासिस्ट ही औषधियों का वितरण कर रहे हैं।
विज्ञापन
बदहाली और बदइंतजामी के बीच इन केंद्रों से मरीज भी दूरी बनाने लगे है। जनपद के 27 राजकीय आयुर्वेदिक अस्पतालों में से चार की स्थिति काफी अच्छी है। अन्य अस्पताल किराये के मकानों में संचालित है तो किसी में पानी टपकता है।
विज्ञापन
विभाग के अनुसार, दो संस्थान पूठन सकरौली और अजबपुर काफी अच्छी स्थिति में है। विभाग के डॉ. कमल कुशवाह ने बताया कि कोरोना काल सहित बाढ़ के समय पर आयुर्वेद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
वहीं सरकार की ओर से भी आयुर्वेद को पर्याप्त मात्रा में दवायें समय उपलब्ध होती रही।
बाढ़ के समय निभाई थी महत्वपूर्ण भूमिका
यमुना और चंबल क्षेत्र में बीते महीने आई बाढ़ से जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया था। ऐसे में आयुर्वेद ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन दिनों आयुर्वेदिक और यूनानी विभाग के डॉक्टर और सहकर्मियों ने बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में शिविर लगाकर ग्रामीणों को राहत देने का काम किया था, जिसे लोगों ने काफी सराहा भी था।
इसलिए मनाते धनतेरस को आयुर्वेद दिवस
सनातन धर्म के जानकारों की माने तो भगवान धनवंतरि की पूजा करने से असाध्य रोगों से मनुष्य को राहत मिलती है। साथ ही विशेष दिन पर खरीदी गई चल-अचल संपत्ति का एक अलग महत्व है।
यही कारण है कि धनतेरस के दिन विशेष पूजा के साथ-साथ खरीदारी की भी वर्षों पुरानी परंपरा आज भी कायम है। दीपावली से ठीक दो दिन पहले होने वाले धनतेरस के पर्व का इतिहास भी आयुर्वेद से ही जुड़ा हुआ है।
इस दिन ही भगवान धनवंतरि का जन्म हुआ था, जिन्हें भारतीय इतिहास में आयुर्वेद का जनक माना जाता है। इसी कारण आयुर्वेदिक दिवस हर वर्ष धनतेरस को ही मनाया जाता है।
वर्ष 2016 से हर साल राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष छठवां आयुर्वेद दिवस दो नवंबर को मनाया जाएगा।