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नलकूप विभाग ने 97 नलकूप किए बंद
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एटा। नलकूप विभाग द्वारा जिले में खराब पड़े 153 नलकूपों में से 97 का परित्याग कर दिया है। यहां से स्टॉफ को हटा दिया है। इन नलकूपों से सबमर्सिबल पंप, वायरिंग, पाइप आदि को खुलवाकर गोदाम में रखवा दिया है। विभाग द्वारा जिले में 392 नलकूपों का संचालन किया जा रहा है।
नलकूप खंड एटा के अधिशासी अभियंता लक्ष्मण प्रसाद ने बताया कि नलकूपों के संचालन की एक मियाद होती है। इसमें नलकूप 17 साल तक चला हो या फिर 17 हजार घंटे चला हो। जिले में 1950 से लेकर 1990 के दशक में बने करीब 153 नलकूप निष्प्रयोज्य हो गए थे।
सर्वे में पता चला कि जलेसर क्षेत्र में एक नलकूप की जमीन पर 70 के दशक में मंदिर बन गया। कई नलकूपों की कोठरियां खंडहर हो चुकी थीं। ऐसे नलकूपों पर डीएम सुखलाल भारती की अध्यक्षता में हुई कमेटी की बैठक में निर्णय लिया गया। इसमें 153 नलकूपों में से 97 का परित्याग, दो सुधारात्मक प्रक्रिया में, 45 फेल और नौ के जांच के बाद में परित्याग करने पर निर्णय लिया है।
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सामान आएगा काम, स्टाफ होगा समायोजित
97 नलकूपों से निकलीं मोटर, पाइप, बायरिंग, बोर्ड सहित अन्य सामान को गोदाम में रखवा दिया है। जो सामान काम का होगा उसे प्रयोग में लाया जाएगा, शेष सामान की नीलामी की जाएगी। वहीं हटाए स्टाफ को दूसरे नलकूपों पर समायोजित किया जाएगा। करीब ढाई सौ नलकूप ऑपरेटर हैं। इनमें एक-एक पर दो-तीन नलकूपों के संचालन का चार्ज है।
छह नलकूप होंगे रीबोर
अधिशासी अभियंता ने बताया कि इस साल जिले में छह नलकूप रीबोर कराए जाएंगे। जलेसर क्षेत्र में खारा पानी होने के कारण वहां विभाग के नलकूप नहीं है। इस वर्ष जिले में एक भी नया नलकूप लगने के लिए बजट नहीं आया है। एक नलकूप पर लगभग 25 लाख रुपये खर्च आता है।
अब बैनामा कराता है विभाग
जिले में आजादी के बाद से लगने वाले नलकूप किसी किसान की निजी जमीन पर होते थे या फिर ग्राम सभा की जमीन पर। ऐसे में जिसकी जमीन पर नलकूप होता था, वह विपक्षी को पानी नहीं लेने देता था और ग्रामीण विभागीय अफसरों को निशाने पर लेेते थे। लक्ष्मण प्रसाद ने बताया कि अब नलकूप लगाते समय विभाग राज्यपाल के पक्ष में किसान से उतनी जमीन का बैनामा करा लेता है। यह बैनामा बिना स्टांप शुल्क दिए केवल बैनामा पंजीकरण के पांच सौ रुपये के शुल्क पर हो जाता है।
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नलकूप खंड एटा के अधिशासी अभियंता लक्ष्मण प्रसाद ने बताया कि नलकूपों के संचालन की एक मियाद होती है। इसमें नलकूप 17 साल तक चला हो या फिर 17 हजार घंटे चला हो। जिले में 1950 से लेकर 1990 के दशक में बने करीब 153 नलकूप निष्प्रयोज्य हो गए थे।
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सर्वे में पता चला कि जलेसर क्षेत्र में एक नलकूप की जमीन पर 70 के दशक में मंदिर बन गया। कई नलकूपों की कोठरियां खंडहर हो चुकी थीं। ऐसे नलकूपों पर डीएम सुखलाल भारती की अध्यक्षता में हुई कमेटी की बैठक में निर्णय लिया गया। इसमें 153 नलकूपों में से 97 का परित्याग, दो सुधारात्मक प्रक्रिया में, 45 फेल और नौ के जांच के बाद में परित्याग करने पर निर्णय लिया है।
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सामान आएगा काम, स्टाफ होगा समायोजित
97 नलकूपों से निकलीं मोटर, पाइप, बायरिंग, बोर्ड सहित अन्य सामान को गोदाम में रखवा दिया है। जो सामान काम का होगा उसे प्रयोग में लाया जाएगा, शेष सामान की नीलामी की जाएगी। वहीं हटाए स्टाफ को दूसरे नलकूपों पर समायोजित किया जाएगा। करीब ढाई सौ नलकूप ऑपरेटर हैं। इनमें एक-एक पर दो-तीन नलकूपों के संचालन का चार्ज है।
छह नलकूप होंगे रीबोर
अधिशासी अभियंता ने बताया कि इस साल जिले में छह नलकूप रीबोर कराए जाएंगे। जलेसर क्षेत्र में खारा पानी होने के कारण वहां विभाग के नलकूप नहीं है। इस वर्ष जिले में एक भी नया नलकूप लगने के लिए बजट नहीं आया है। एक नलकूप पर लगभग 25 लाख रुपये खर्च आता है।
अब बैनामा कराता है विभाग
जिले में आजादी के बाद से लगने वाले नलकूप किसी किसान की निजी जमीन पर होते थे या फिर ग्राम सभा की जमीन पर। ऐसे में जिसकी जमीन पर नलकूप होता था, वह विपक्षी को पानी नहीं लेने देता था और ग्रामीण विभागीय अफसरों को निशाने पर लेेते थे। लक्ष्मण प्रसाद ने बताया कि अब नलकूप लगाते समय विभाग राज्यपाल के पक्ष में किसान से उतनी जमीन का बैनामा करा लेता है। यह बैनामा बिना स्टांप शुल्क दिए केवल बैनामा पंजीकरण के पांच सौ रुपये के शुल्क पर हो जाता है।