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आजादी की आन : नियाज अहमद जुबैरी ने जंग-ए-आजादी को जिले में दी थी धार
Sun, 10 Aug 2025 01:44 AM IST
आगरा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, एटा
संवाद न्यूज एजेंसी, एटा
Updated Sun, 10 Aug 2025 01:44 AM IST
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एटा। मारहरा कस्बे के नियाज अहमद जुबैरी ने जंग-ए-आजादी को एटा जनपद में धार दी थी। नमक सत्याग्रह में सहभागिता के लिए उन्हें एक साल के लिए जेल में रहना पड़ा।
मारहरा के मोहल्ला कम्बोह निवासी जमींदार हबीब अहमद जुबैरी के घर 25 दिसंबर 1899 को नियाज अहमद का जन्म हुआ था। युवा अवस्था में वह आजादी की लड़ाई में कूद गए थे। रिश्तेदार चौधरी मतीनुज्जमां जुबैरी की चमन कोठी (पीली कोठी) स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों का केंद्र रही थी। यहां पर अक्सर अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम की रणनीति के लिए बैठकें हुआ करती थीं। इनमें नियाज अहमद जुबैरी के अलावा एटा के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी होतीलाल दास, मारहरा के लाला शंकरलाल गोयल, पंडित सूरजभान चौधरी, मोहम्मद इब्राहीम जुबैरी आदि भाग लिया करते थे।
नियाज अहमद जुबैरी के भांजे पूर्व चेयरमैन परवेज जुबैरी ने बताया कि मामू का शुमार राष्ट्रवादी मुसलमानों में हुआ करता था। वह महात्मा गांधी से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। जेल में उनसे पिता का नाम पूछा गया तो उन्होंने महात्मा गांधी बताया था। नियाज अहमद जुबैरी मशहूर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कैलाश नाथ काटजू के साथ एक आंदोलन में मध्य प्रदेश की जेल में भी रहे थे। उनके भाई अजीज अहमद जुबैरी भी बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। पेशे से वकील थे। अजमेर में वकालत किया करते थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू से अजीज अहमद की दोस्ती थी।
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नियाज अहमद जुबैरी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चलाए गए असहयोग आंदोलन, अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन और नमक सत्याग्रह आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में एक वर्ष का कठोर कारावास और 50 रुपये, नमक सत्याग्रह में 9 माह की जेल और 50 रुपये जुर्माने की सजा मिली। उन्होंने जनपद में जगह-जगह घूमकर आंदोलनों को व्यापक बनाने के लिए परिश्रम किया।
चिंतामणि शुक्ला ने एटा जनपद का राजनीतिक इतिहास नामक पुस्तक में उनका महत्वपूर्ण किस्सा लिखा है। इसमें बताया गया है कि 1931 में जब वह एटा जेल में बंद थे तो वहां एक हिंदू कैदी गीता का पाठ कर रहा था। अंग्रेज जेलर ने उसे ठोकर मार दी। इससे गीता नीचे गिर गई। इस बात पर नियाज अहमद जुबैरी को गुस्सा आ गया। उन्होंने जेलर को थप्पड़ मार दिया। इस पर जुबैरी को कालकोठरी की सजा भुगतनी पड़ी। आजादी के बाद 1953 में सिर्फ 53 साल की अल्प आयु में वह दुनिया को अलविदा कह गए।
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मारहरा के मोहल्ला कम्बोह निवासी जमींदार हबीब अहमद जुबैरी के घर 25 दिसंबर 1899 को नियाज अहमद का जन्म हुआ था। युवा अवस्था में वह आजादी की लड़ाई में कूद गए थे। रिश्तेदार चौधरी मतीनुज्जमां जुबैरी की चमन कोठी (पीली कोठी) स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों का केंद्र रही थी। यहां पर अक्सर अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम की रणनीति के लिए बैठकें हुआ करती थीं। इनमें नियाज अहमद जुबैरी के अलावा एटा के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी होतीलाल दास, मारहरा के लाला शंकरलाल गोयल, पंडित सूरजभान चौधरी, मोहम्मद इब्राहीम जुबैरी आदि भाग लिया करते थे।
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नियाज अहमद जुबैरी के भांजे पूर्व चेयरमैन परवेज जुबैरी ने बताया कि मामू का शुमार राष्ट्रवादी मुसलमानों में हुआ करता था। वह महात्मा गांधी से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। जेल में उनसे पिता का नाम पूछा गया तो उन्होंने महात्मा गांधी बताया था। नियाज अहमद जुबैरी मशहूर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कैलाश नाथ काटजू के साथ एक आंदोलन में मध्य प्रदेश की जेल में भी रहे थे। उनके भाई अजीज अहमद जुबैरी भी बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। पेशे से वकील थे। अजमेर में वकालत किया करते थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू से अजीज अहमद की दोस्ती थी।
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नियाज अहमद जुबैरी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चलाए गए असहयोग आंदोलन, अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन और नमक सत्याग्रह आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में एक वर्ष का कठोर कारावास और 50 रुपये, नमक सत्याग्रह में 9 माह की जेल और 50 रुपये जुर्माने की सजा मिली। उन्होंने जनपद में जगह-जगह घूमकर आंदोलनों को व्यापक बनाने के लिए परिश्रम किया।
चिंतामणि शुक्ला ने एटा जनपद का राजनीतिक इतिहास नामक पुस्तक में उनका महत्वपूर्ण किस्सा लिखा है। इसमें बताया गया है कि 1931 में जब वह एटा जेल में बंद थे तो वहां एक हिंदू कैदी गीता का पाठ कर रहा था। अंग्रेज जेलर ने उसे ठोकर मार दी। इससे गीता नीचे गिर गई। इस बात पर नियाज अहमद जुबैरी को गुस्सा आ गया। उन्होंने जेलर को थप्पड़ मार दिया। इस पर जुबैरी को कालकोठरी की सजा भुगतनी पड़ी। आजादी के बाद 1953 में सिर्फ 53 साल की अल्प आयु में वह दुनिया को अलविदा कह गए।