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आज ही के दिन तिरंगा लहराते समय शहीद हुए थे शिवराज उर्फ सोना सोनार
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शहीद शिवराज उर्फ सोना सोनार की प्रतिमा।
- फोटो : DEORIA
आज ही के दिन तिरंगा लहराते समय शहीद हुए थे शिवराज उर्फ सोना सोनार
देवरिया। आज ही के दिन 1942 को यूनियन जैक के स्थान पर पहले क्रांतिकारियों ने तिरंगा लहराया तो बौखलाए अंग्रेज अफसरों ने फायरिंग शुरू कर दी थी। इसमें शिवराज उर्फ सोना सोनार समेत चार लोग शहीद हो गए थे। शिवराज ही वह शख्स थे, जिनके कंधे पर चढ़ कर छात्र रामचंद्र विद्यार्थी ने तिरंगा फहराया था।
विकास खंड देसही देवरिया के सहोदर पट्टी निवासी अमर शहीद शिवराज उर्फ सोना सोनार के पिता का नाम धज्जू स्वर्णकार व माता का नाम गांदी देवी था। वह चार भाइयों में दूसरे नंबर के थे। स्वर्णकला में माहिर होने के कारण ही उनका उपनाम सोना पड़ गया। वह बचपन से ही क्रांतिकारी विचारधारा के थे। 24 साल की उम्र में उनका विवाह कुशीनगर जिले के साखोपार भैंसही गांव की कुसुमावती देवी के साथ हुआ था। इनके एक पुत्र श्रद्धा व एक पुत्री इमिरती थीं।
गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तो शिवराज ने क्षेत्र के युवाओं का जत्था लेकर 14 अगस्त 1942 को देवरिया पहुंचे। सभी के मन में देवरिया को अंग्रेजों से मुक्त कराने का भाव था। युवाओं की टोली ने भारत माता की जय, वंदे मातरम का नारा लगाते हुए कचहरी को चारों तरफ से घेर लिया। सोना अन्य साथियों के साथ कचहरी की छत पर चढ़ गए। अंग्रेजों के यूनियन जैक को फाड़ने का प्रयास करने लगे। झंडा ऊंचा होने के चलते झंडा उनकी पहुंच से बाहर था। उन्होंने अपने कंधे पर छात्र रामचंद्र को बैठा लिया। रामचंद्र विद्यार्थी ने यूनियन जैक के झंडे को फाड़ कर तिरंगा को फहरा दिया। इस दौरान अंग्रेज अधिकारियों ने गोली चलाने का आदेश दिया। शिवराज उर्फ सोना सोनार, रामंचद्र विद्यार्थी, गोपी मिश्र व बंधू उर्फ घिन्हू शहीद हो गए।
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देवरिया। आज ही के दिन 1942 को यूनियन जैक के स्थान पर पहले क्रांतिकारियों ने तिरंगा लहराया तो बौखलाए अंग्रेज अफसरों ने फायरिंग शुरू कर दी थी। इसमें शिवराज उर्फ सोना सोनार समेत चार लोग शहीद हो गए थे। शिवराज ही वह शख्स थे, जिनके कंधे पर चढ़ कर छात्र रामचंद्र विद्यार्थी ने तिरंगा फहराया था।
विकास खंड देसही देवरिया के सहोदर पट्टी निवासी अमर शहीद शिवराज उर्फ सोना सोनार के पिता का नाम धज्जू स्वर्णकार व माता का नाम गांदी देवी था। वह चार भाइयों में दूसरे नंबर के थे। स्वर्णकला में माहिर होने के कारण ही उनका उपनाम सोना पड़ गया। वह बचपन से ही क्रांतिकारी विचारधारा के थे। 24 साल की उम्र में उनका विवाह कुशीनगर जिले के साखोपार भैंसही गांव की कुसुमावती देवी के साथ हुआ था। इनके एक पुत्र श्रद्धा व एक पुत्री इमिरती थीं।
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गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तो शिवराज ने क्षेत्र के युवाओं का जत्था लेकर 14 अगस्त 1942 को देवरिया पहुंचे। सभी के मन में देवरिया को अंग्रेजों से मुक्त कराने का भाव था। युवाओं की टोली ने भारत माता की जय, वंदे मातरम का नारा लगाते हुए कचहरी को चारों तरफ से घेर लिया। सोना अन्य साथियों के साथ कचहरी की छत पर चढ़ गए। अंग्रेजों के यूनियन जैक को फाड़ने का प्रयास करने लगे। झंडा ऊंचा होने के चलते झंडा उनकी पहुंच से बाहर था। उन्होंने अपने कंधे पर छात्र रामचंद्र को बैठा लिया। रामचंद्र विद्यार्थी ने यूनियन जैक के झंडे को फाड़ कर तिरंगा को फहरा दिया। इस दौरान अंग्रेज अधिकारियों ने गोली चलाने का आदेश दिया। शिवराज उर्फ सोना सोनार, रामंचद्र विद्यार्थी, गोपी मिश्र व बंधू उर्फ घिन्हू शहीद हो गए।
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