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रुद्रपुर के नरेश को मिला था काला पानी
ब्यूरो अमर उजाला/ देवरिया
Updated Sun, 17 Apr 2016 10:35 PM IST
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रुद्रपुर में स्थित सतासी राज का पैलेस।
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आजादी की जंग में जो स्थान मेवाड़ का है वहीं स्थान उत्तर भारत में रुद्रपुर के सतासी एस्टेट का है। यहां का बुलंद किला सतासी राज पैलेस 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन का जीता जागता उदाहरण है। इसी किले से राजा उदित प्रताप नारायण सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ी थी। इसके चलते रुद्रपुर के नरेश को अंग्रेजों ने काला पानी की सजा दी।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ अंसतोष और क्रोध की जो ज्वाला मंगल पांडेय ने बैरकपुर में जलाई उसकी लपट गोरखपुर तक पहुंची। क्रांतिकारी नेता जाफर मुहम्मद हसन ने क्रांतिकारियों की मदद को सतासी राज के नरेश राजा उदित प्रताप नारायण सिंह के पास अपना दूत भेजा था। उस दौरान देश के प्रमुख राजे-रजवाड़ों ने अंग्रेज सरकार के सामने घुटना टेक दिए थे। लेकिन सतासी राज के राजा ने देश की आजादी के लिए क्रांतिकारी हसन मोहम्मद का साथ दिया।
उन्होंने हसन के दूत से कहा कि न कोई हिंदू है न कोई मुसलमान है। हम सभी हिंदुस्तानी हैं। हमारा लक्ष्य इन अंग्रेजों को देश से बाहर निकालना है। राप्ती नदी के तट पर मुहम्मद हसन का सतासी राज के सैनिक स्वागत करेंगे। जब मोहम्मद हसन की क्रांतिकारी सेना राप्ती नदी के किनारे पहुंची तो सतासी राज के सैनिक उनका साथ देने को तैयार मिले।
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उस समय गोरखपुर के तत्कालीन वानट मजिस्ट्रेट मिस्टर वर्ड ने प्रयास किया कि राप्ती नदी में नावों को डुबो दिया जाए ताकि हसन की सेना गोरखपुर सदर में दाखिल न हो पाए। पर वर्ड को सफलता नहीं मिल पाई क्योंकि नावों पर मल्लाहों की जगह सतासी राज के सैनिक तैनात थे। मोहम्मद हसन ने सतासी राज की मदद से गोरखपुर पर कब्जा कर लिया।
कुछ दिन तक गोरखपुर पर क्रांतिकारियों का कब्जा रहा। अंग्रेजों ने नेपाल के राजा वंश बहादुर के नेतृत्व में बड़ी संख्या में गोरखा सैनिकों को अंग्रेज ब्रिगेडियर फ्रैंक फ्रेडार के साथ गोरखपुर पर आक्रमण करने के लिए भेजा। गोरखपुर के क्रांतिकारियों के पास सैनिक साधन कम होने के कारण गोरखपुर पर फिर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। सतासी नरेश राजा उदित प्रताप नारायण वीरता से लड़े किंतु उन्हें हारना पड़ा।
अंग्रेजों ने उन्हेें गिरफ्तार कर काला पानी की सजा दे दी। कालापानी की सजा के दौरान ही उनकी मौत हो गई। उदित नारायण ने भारत माता को आजाद कराने के लिए बलिदान देकर रुद्रपुर के सतासी एस्टेट की माटी को अमर कर दिया।
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प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ अंसतोष और क्रोध की जो ज्वाला मंगल पांडेय ने बैरकपुर में जलाई उसकी लपट गोरखपुर तक पहुंची। क्रांतिकारी नेता जाफर मुहम्मद हसन ने क्रांतिकारियों की मदद को सतासी राज के नरेश राजा उदित प्रताप नारायण सिंह के पास अपना दूत भेजा था। उस दौरान देश के प्रमुख राजे-रजवाड़ों ने अंग्रेज सरकार के सामने घुटना टेक दिए थे। लेकिन सतासी राज के राजा ने देश की आजादी के लिए क्रांतिकारी हसन मोहम्मद का साथ दिया।
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उन्होंने हसन के दूत से कहा कि न कोई हिंदू है न कोई मुसलमान है। हम सभी हिंदुस्तानी हैं। हमारा लक्ष्य इन अंग्रेजों को देश से बाहर निकालना है। राप्ती नदी के तट पर मुहम्मद हसन का सतासी राज के सैनिक स्वागत करेंगे। जब मोहम्मद हसन की क्रांतिकारी सेना राप्ती नदी के किनारे पहुंची तो सतासी राज के सैनिक उनका साथ देने को तैयार मिले।
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उस समय गोरखपुर के तत्कालीन वानट मजिस्ट्रेट मिस्टर वर्ड ने प्रयास किया कि राप्ती नदी में नावों को डुबो दिया जाए ताकि हसन की सेना गोरखपुर सदर में दाखिल न हो पाए। पर वर्ड को सफलता नहीं मिल पाई क्योंकि नावों पर मल्लाहों की जगह सतासी राज के सैनिक तैनात थे। मोहम्मद हसन ने सतासी राज की मदद से गोरखपुर पर कब्जा कर लिया।
कुछ दिन तक गोरखपुर पर क्रांतिकारियों का कब्जा रहा। अंग्रेजों ने नेपाल के राजा वंश बहादुर के नेतृत्व में बड़ी संख्या में गोरखा सैनिकों को अंग्रेज ब्रिगेडियर फ्रैंक फ्रेडार के साथ गोरखपुर पर आक्रमण करने के लिए भेजा। गोरखपुर के क्रांतिकारियों के पास सैनिक साधन कम होने के कारण गोरखपुर पर फिर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। सतासी नरेश राजा उदित प्रताप नारायण वीरता से लड़े किंतु उन्हें हारना पड़ा।
अंग्रेजों ने उन्हेें गिरफ्तार कर काला पानी की सजा दे दी। कालापानी की सजा के दौरान ही उनकी मौत हो गई। उदित नारायण ने भारत माता को आजाद कराने के लिए बलिदान देकर रुद्रपुर के सतासी एस्टेट की माटी को अमर कर दिया।