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नदियों के पानी में घुला जहर
ब्यूरो अमर उजाला/देवरिया
Updated Mon, 06 Jun 2016 12:45 AM IST
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भटनी नगर का गंदा पानी छोटी गंडक नदी में गिरता है। इसके चलते नदी के पानी से दुर्गंध उठने लगा है।
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देवरिया। अविरल बहने वाली नदियां प्रदूषण की मार झेल रही हैं। पानी की कमी से उनके दायरे भी सिकुड़ते जा रहे हैं। प्रदूषण से कराह रहीं नदियों पर प्रशासनिक मशीनरी की सुस्ती भारी पड़ रही है। बात चाहे घाघरा, राप्ती, गोर्रा या छोटी गंडक नदी की करें, सभी नदियां प्रदूषण का दंश झेल रही हैं। इन नदियों के पानी, पीने की कौन कहे, नहाने योग्य नहीं हैं। राप्ती और छोटी गंडक नदी के पाट सूख रहे हैं। इनका पुरसाहाल लेने वाला कोई नहीं है। नदियों के उद्धार के लिए तारणहार की तलाश है।
बात करते हैं कि कछार क्षेत्र के मध्य से गुजरने वाली जीवनदायिनी गोर्रा की। पचलड़ी, नरायनपुर, डहरौली बुजुर्ग, हड़हा माझा नारायण आदि गांवों के किनारे के लोग जल प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं। रुद्रपुर के रास्ते यह नदी गुजरी है। नदी में गोरखपुर जिले के कल कारखानों से निकला कचरा नालों के जरिए इसमें मिलता है। प्रदूषण के चलते इसका जल काला होता जा रहा है। नदी के जलीय जीव-जंतु अपना अस्तित्व खो रहे हैं। लगातार प्रदूषण बढ़ने से लोग दहशत में हैं। लोगों के मुताबिक, 30 साल पहले इसका पानी साफ-सुथरा हुआ करता था। यह नदी 61 गांवों से होकर गायघाट के पास राप्ती नदी में मिलती है।
रुद्रपुर इलाके से गुजरी राप्ती नदी न केवल प्रदूषण की मार से कराह रही है। बल्कि नदी में पानी का प्रवाह भी घटता जा रहा है। जलीय जीव-जंतु अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। प्रदूषण की देन है कि नदी का पानी नहाने योग्य भी नहीं है। यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की पिछले साल की रिपोर्ट पर गौर करें तो डाउनस्ट्रीम गोरखपुर के पास राप्ती नदी में घुलित आक्सीजन 7.4 मिलीग्राम प्रति लीटर, बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड 4.51 मिलीग्राम प्रति लीटर और टोटल कोलीफार्म 3508 मिलीग्राम प्रति लीटर पाया गया। नदी का पानी पीने योग्य है न ही स्नान करने योग्य। केवल मत्स्य पालन के लायक पाया गया।
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घाघरा नदी भी प्रदूषण से अछूती नहीं रह गई है। बरहज, भागलपुर, लार के पिंडी इलाके से होकर बिहार प्रांत में प्रवेश करने वाली इस नदी का पानी भी पीने योग्य नहीं रहा। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, तुरतीपार के पास पिछले माह अप्रैल में घाघरा नदी के पानी की जांच की गई। इसमें डीओ 7.60 मिलीग्राम प्रति लीटर, बीओडी 2.50 मिलीग्राम प्रति लीटर, कुल कोलीफार्म 1100 एमपीएन प्रति 100 एमएल पाया गया। पिछले साल की रिपोर्ट में पानी का नमूना सी ग्रेड पाया गया। यानी पानी पीने और स्नान करने लायक नहीं मिला। जबकि नदी के जल में घुलित आक्सीजन छह मिलीग्राम प्रति लीटर न्यूनतम, बायो केमिकल आक्सीजन डिमांड दो मिलीग्राम प्रति लीटर अधिकतम और कुल कोलीफार्म 50 मिलीग्राम प्रति लीटर अधिकतम होनी चाहिए।
छोटी गंडक नदी हेतिमपुर के रास्ते जिले में प्रवेश करती है। इसके बाद कोटवा, रामपुर कारखाना, भटनी, मझौलीराज के रास्ते होकर बिहार बॉर्डर पर मेहरौनाघाट के आगे घाघरा नदी में मिल जाती है। नदी में कभी चीनी मिलों से निकलने वाला दूषित पानी गिराया जाता था। लेकिन चीनी मिलों के बंद होने से दूषित पानी का गिराया जाना रुक गया। लेकिन इस नदी का पानी सूखता चला गया। इसके कारण नदी का प्रवाह थम सा गया है। भटनी नगर पंचायत के अलावा तटवर्तीय कई गांवों का दूषित पानी नदी में गिराया जा रहा है। इसके कारण नदी का पानी प्रदूषित हो गया है। नदी में जल का प्रवाह कम होने से दुर्गंध उठ रहा है। इसके चलते नकहनी, जिगिना मिश्र, तेनुआ, बेहराडाबर, कुरमौटा ठाकुर, भरहेचौरा, संवरेजी आदि गांवों के लोगों को दुश्वारियों का सामना करना पड़ रहा है।
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बात करते हैं कि कछार क्षेत्र के मध्य से गुजरने वाली जीवनदायिनी गोर्रा की। पचलड़ी, नरायनपुर, डहरौली बुजुर्ग, हड़हा माझा नारायण आदि गांवों के किनारे के लोग जल प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं। रुद्रपुर के रास्ते यह नदी गुजरी है। नदी में गोरखपुर जिले के कल कारखानों से निकला कचरा नालों के जरिए इसमें मिलता है। प्रदूषण के चलते इसका जल काला होता जा रहा है। नदी के जलीय जीव-जंतु अपना अस्तित्व खो रहे हैं। लगातार प्रदूषण बढ़ने से लोग दहशत में हैं। लोगों के मुताबिक, 30 साल पहले इसका पानी साफ-सुथरा हुआ करता था। यह नदी 61 गांवों से होकर गायघाट के पास राप्ती नदी में मिलती है।
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रुद्रपुर इलाके से गुजरी राप्ती नदी न केवल प्रदूषण की मार से कराह रही है। बल्कि नदी में पानी का प्रवाह भी घटता जा रहा है। जलीय जीव-जंतु अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। प्रदूषण की देन है कि नदी का पानी नहाने योग्य भी नहीं है। यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की पिछले साल की रिपोर्ट पर गौर करें तो डाउनस्ट्रीम गोरखपुर के पास राप्ती नदी में घुलित आक्सीजन 7.4 मिलीग्राम प्रति लीटर, बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड 4.51 मिलीग्राम प्रति लीटर और टोटल कोलीफार्म 3508 मिलीग्राम प्रति लीटर पाया गया। नदी का पानी पीने योग्य है न ही स्नान करने योग्य। केवल मत्स्य पालन के लायक पाया गया।
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घाघरा नदी भी प्रदूषण से अछूती नहीं रह गई है। बरहज, भागलपुर, लार के पिंडी इलाके से होकर बिहार प्रांत में प्रवेश करने वाली इस नदी का पानी भी पीने योग्य नहीं रहा। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, तुरतीपार के पास पिछले माह अप्रैल में घाघरा नदी के पानी की जांच की गई। इसमें डीओ 7.60 मिलीग्राम प्रति लीटर, बीओडी 2.50 मिलीग्राम प्रति लीटर, कुल कोलीफार्म 1100 एमपीएन प्रति 100 एमएल पाया गया। पिछले साल की रिपोर्ट में पानी का नमूना सी ग्रेड पाया गया। यानी पानी पीने और स्नान करने लायक नहीं मिला। जबकि नदी के जल में घुलित आक्सीजन छह मिलीग्राम प्रति लीटर न्यूनतम, बायो केमिकल आक्सीजन डिमांड दो मिलीग्राम प्रति लीटर अधिकतम और कुल कोलीफार्म 50 मिलीग्राम प्रति लीटर अधिकतम होनी चाहिए।
छोटी गंडक नदी हेतिमपुर के रास्ते जिले में प्रवेश करती है। इसके बाद कोटवा, रामपुर कारखाना, भटनी, मझौलीराज के रास्ते होकर बिहार बॉर्डर पर मेहरौनाघाट के आगे घाघरा नदी में मिल जाती है। नदी में कभी चीनी मिलों से निकलने वाला दूषित पानी गिराया जाता था। लेकिन चीनी मिलों के बंद होने से दूषित पानी का गिराया जाना रुक गया। लेकिन इस नदी का पानी सूखता चला गया। इसके कारण नदी का प्रवाह थम सा गया है। भटनी नगर पंचायत के अलावा तटवर्तीय कई गांवों का दूषित पानी नदी में गिराया जा रहा है। इसके कारण नदी का पानी प्रदूषित हो गया है। नदी में जल का प्रवाह कम होने से दुर्गंध उठ रहा है। इसके चलते नकहनी, जिगिना मिश्र, तेनुआ, बेहराडाबर, कुरमौटा ठाकुर, भरहेचौरा, संवरेजी आदि गांवों के लोगों को दुश्वारियों का सामना करना पड़ रहा है।