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Deoria News: बेल्थरा रोड से आ रही है लाल-पीली बूंदी, भागलपुर में बनता है लड्डू

Mon, 22 Dec 2025 12:46 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया Updated Mon, 22 Dec 2025 12:46 AM IST
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Red and yellow buniya is coming from Belthara Road, laddu is made in Bhagalpur.
देवरिया। सफलता चाहे जैसी हो, बिना लड्डू के जश्न पूरा नहीं होता, लेकिन मिलावटखोरों ने इस खास मिठाई को भी मिलावटी बना दिया। दरअसल बेसन व रिफाइंड की बढ़ती कीमतों को देखते हुए मिलावटखोर बेसन में मैदा व रंग के अलावा मक्के का आटा मिलाने लगे हैं। इसके अलावा चीनी की जगह दुकानों पर बचा पुराने शीरा का इस्तेमाल कर बूंदी तैयार हो रहा है। बलिया जिले के बेल्थरा बाजार में बनने वाला यह बूंदी सलेमपुर तहसील क्षेत्र के भागलपुर बाजार के जरिए पूरे जिले में सप्लाई होता है। इससे लड्डू बनाने का कुल खर्च ही 80 से 90 रुपये बैठ आ रहा है, जबकि इस लड्डू की बिक्री 140 रुपये से लेकर 200 रुपये प्रति किलोग्राम तक है।
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मिठाई बनाने वाले कारीगर संजय मद्धेशिया बताते हैं कि लड्डू शुद्ध रूप से बेसन की मिठाई है। एक किलोग्राम बेसन से लड्डू बनाने के लिए उसमें दो किलोग्राम चीनी और ढाई लीटर रिफाइंड की जरूरत होती है। अगर इस हिसाब से देखें तो 90 रुपये का एक किलोग्राम बेसन, 90 रुपये की दो किलोग्राम चीनी और लगभग 400 रुपये के रिफाइंड तेल की जरूरत होती है। इसके बाद इसे पकाने के लिए रसोई गैस और बनाने वाले कारीगर की मजदूरी को जोड़कर लगभग 500 रुपये का खर्च आता है। इसे बड़ी मात्रा में बनाने पर रिफाइंड तेल की खपत कम हो जाती है, लेकिन अन्य लागत उसी अनुपात में रहती है। इस तरह से एक किलोग्राम लड्डू तैयार करने में लगभग 300 रुपये खर्च होते हैं। दुकानदार अपना मुनाफा रखकर इसे 350 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव बेचते हैं।
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केमिकल वाले कलर से बीमार बनाएगा ये लड्डू

शुद्ध बेसन से बना लड्डू हल्का पीले रंग का होता है। दुकानदार इसे चमकदार और कई रंग का बनाने के चक्कर में जहरीला बना रहे हैं। लड्डू को रंगीन बनाने के लिए इसमें टर्टाजीन के अलग-अलग रंग मिलाए जाते हैं। 10 किलोग्राम लड्डू बनाने में करीब 100 ग्राम कलर का प्रयोग होता है। यह रंग सीधे तौर पर लीवर को प्रभावित करता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि लड्डू या किसी भी प्रकार के खाने में मिला केमिकल वाला रंग पचता नहीं है। रंग वाला केमिकल आहार नाल की दीवारों पर चिपक जाता है। धीरे-धीरे यह रंग शरीर के अंदरूनी हिस्सों में घाव बनाता है, जिससे दूसरी अन्य बीमारियाें का खतरा बढ़ जाता है।
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बची मिठाई को दोबारा बनाते हैं



सलेमपुर, मईल, भागलपुर समेत आसपास के सभी छोटे-बड़े चौराहों पर बनने वाली मिठाइयों को नष्ट कराने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसका नुकसान यह है कि दुकानदार तीसरे-चौथे दिन बची हुई मिठाई को तोड़कर फिर से उसे गर्म कर नए सिरे से तैयार करते हैं। सबसे ज्यादा यह काम लड्डू, बर्फी और पेड़ा में होता है। बची हुई बर्फी व पेड़ा को तोड़कर उसमें दूध मिलाकर गर्म किया जाता है। इसके बाद इसे फिर से नए साइज में काटकर रख दिया जाता है, लेकिन बार-बार यह गर्म करने से नुकसानदेह हो जाता है।
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