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अयोध्या राम मंदिर के लिए परदेसी राम ने त्याग दी थी वर्दी, बोले- 'अब मिली है असली खुशी'
Wed, 05 Aug 2020 04:36 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो, देवरिया।
अमर उजाला ब्यूरो, देवरिया।
Published by: गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 05 Aug 2020 04:36 PM IST
सार
वर्दी में ही पहुंच गए थे अयोध्या, कंपनी को जानकारी हुई तो कर दिए गए बर्खास्त
तीन दशक से गोरक्षनाथ मंदिर में रहते हैं, राम मंदिर निर्माण से दिल को मिला सुकून
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परदेसी राम
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
कंपनी कमांडर का आदेश नजरअंदाज कर रामजन्मभूमि आंदोलन में शामिल हुए देवरिया के पीएसी जवान परदेसी राम को वर्दी गंवानी पड़ी। लेकिन थोड़ा भी इसका मलाल उन्हें नहीं रहा। तीन दशक बाद इनका सपना साकार होने जा रहा है। अयोध्या न जाने की थोड़ी कसक है। लेकिन राम मंदिर निर्माण से दिल को काफी सुकून मिल रहा है।
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राम मंदिर के लिए संघर्ष करने वाले पिपरा खेमकरन गांव निवासी परदेसी राम की कहानी दिलचस्प है। घर की माली हालत कमजोर होने के बावजूद संघर्षों की बदौलत 15 मई 1981 में पीएसी में भर्ती हुए, लेकिन भगवान राम के प्रति उनके दिल में अपार प्रेम रहा। इनकी तैनाती 26वीं वाहिनी पीएसी में रही। कहीं भी वह ड्यूटी पर रहते थे, लेकिन रामलला के दरबार में रामनवमी के दिन पहुंच जाते थे।
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1988 में इनका कैंप प्रयागराज में था। उस समय में जब रणनीति बनाने की बात आई तो अयोध्या पहुंचे थे। 1989 में इनका कैंप बस्ती के हर्रैया में था। अयोध्या शिला पूजन में जाने वाले कारसेवकों को रोकने की ड्यूटी लगी थी। अफसरों को बिना बताए तीन दिन के लिए अयोध्या चले गए और शिला पूजन में शामिल हुए। वापस आए तो सजा के तौर पर एक सप्ताह का वेतन काटा गया। बावजूद इनकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा।
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वर्ष 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में रथ यात्रा निकली। उस समय इनका कैंप गोरखपुर के सिकरीगंज थाने पर लगा था। 30 अक्तूबर 1990 को यात्रा को अयोध्या पहुंचना था। कंपनी कमांडर से तीन दिन के लिए परदेसी राम ने छुट्टी मांगी। छुट्टी देने से कमांडर ने इनकार कर दिया। 28 अक्तूबर की रात को परदेसी राम पैदल ही वर्दी में अयोध्या के लिए निकल गए।
दर्ज हुआ था राष्ट्रद्रोह का केस
29 की रात में वह अयोध्या पहुंचे और नया घाट पर रात्रि विश्राम किया। शरीर पर वर्दी होने के कारण रास्ते में इनको किसी ने रोका नहीं। 30 अक्तूबर को जब मंदिर की तरफ कारसेवक महंत अवैद्यनाथ और जगत गुरु शंकराचार्य वासुदेवानंद महाराज की अगुवाई में बढ़े तो बावर्दी ही नारेबाजी करते हुए पुुलिस ने परदेसी राम को गिरफ्तार कर लिया और नौकरी भी चली गई।
इनकी इस कार्यशैली से नाराज माता-पिता ने घर से अलग कर दिया। पांच वर्ष तक लंगड़ी देवरिया में एक व्यक्ति के घर रहे। इसके बाद वह गोरखनाथ मंदिर पर चले गए। यहीं पर परिवार के साथ रहते हैं।
छह दिसंबर 1992 में जब ढांचा गिरा तो उसमें भी महंत अवैद्यनाथ के साथ परदेसी राम पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि उन्हें भी पुलिस की लाठियां खानी पड़ीं थीं। कई दिनों तक इलाज हुआ। 30 अक्तूबर 1990 के मंदिर निर्माण आंदोलन में परदेसी गिरफ्तार भी हुए। बावर्दी आंदोलन में शामिल होने पर उनके खिलाफ पीएसी कमांडर ने राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज करा दिया।
उसके बाद परदेसी ने घर छोड़ दिया और छिप-छिप कर आंदोलन में हिस्सा लेने लगे। छह दिसंबर 1992 के आंदोलन में उन्होंने बतौर कारसेवक हिस्सा लिया। 1993 में उन पर दर्ज राष्ट्रद्रोह के मुकदमे को साक्ष्य के अभाव में खारिज कर दिया गया। नौकरी छूटने के बाद परदेसी ने खुद को पूरी तौर पर मंदिर आंदोलन को समर्पित कर दिया। इसके लिए वह गोरखनाथ मंदिर की आंदोलन टीम का हिस्सा हो गए।
इनकी इस कार्यशैली से नाराज माता-पिता ने घर से अलग कर दिया। पांच वर्ष तक लंगड़ी देवरिया में एक व्यक्ति के घर रहे। इसके बाद वह गोरखनाथ मंदिर पर चले गए। यहीं पर परिवार के साथ रहते हैं।
छह दिसंबर 1992 में जब ढांचा गिरा तो उसमें भी महंत अवैद्यनाथ के साथ परदेसी राम पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि उन्हें भी पुलिस की लाठियां खानी पड़ीं थीं। कई दिनों तक इलाज हुआ। 30 अक्तूबर 1990 के मंदिर निर्माण आंदोलन में परदेसी गिरफ्तार भी हुए। बावर्दी आंदोलन में शामिल होने पर उनके खिलाफ पीएसी कमांडर ने राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज करा दिया।
उसके बाद परदेसी ने घर छोड़ दिया और छिप-छिप कर आंदोलन में हिस्सा लेने लगे। छह दिसंबर 1992 के आंदोलन में उन्होंने बतौर कारसेवक हिस्सा लिया। 1993 में उन पर दर्ज राष्ट्रद्रोह के मुकदमे को साक्ष्य के अभाव में खारिज कर दिया गया। नौकरी छूटने के बाद परदेसी ने खुद को पूरी तौर पर मंदिर आंदोलन को समर्पित कर दिया। इसके लिए वह गोरखनाथ मंदिर की आंदोलन टीम का हिस्सा हो गए।