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Deoria News: सिर्फ सात पंजीकृत, अन्य अस्पताल अवैध
Fri, 19 Sep 2025 01:21 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
Updated Fri, 19 Sep 2025 01:21 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
देवरिया। शहर से लेकर गांवों तक फैले अवैध अस्पतालों के जाल को खत्म करने के लिए शासन की ओर से अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन निरस्त कर नए सिरे से मौके पर जाकर डॉक्टरों की डिग्रियों की जांच कर रजिस्ट्रेशन करना था, ताकि वैध और अवैध अस्पतालों की सूची स्पष्ट हो सके, मगर सीएमओ कार्यालय के नोडल अफसर के खेल से आवेदन करने वाले निजी अस्पतालों की न तो जांच की गई और न ही इनकी रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी की गई।
इसी के आड़ में अवैध अस्पताल भी संचालित हो रहे हैं। सीएमओ कार्यालय के आंकड़े पर गौर करें तो जिले में अप्रैल तक सिर्फ 127 निजी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन था, मगर 200 से अधिक आवेदन आए हैं, इन अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन जिन डॉक्टरों के नाम पर होगा, उन्हें 24 घंटे अस्पताल पर रहना होगा। अब तक सिर्फ सात निजी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन हो सका है। सीएमओ कार्यालय के जिम्मेदार काम का दबाव और समय अभाव बताकर कन्नी काट रहे हैं।
निजी अस्पतालों में नामी गिरामी डॉक्टरों का बोर्ड लगाकर झोलाछाप इलाज कर रहे हैं। अस्पताल में इलाज के दौरान मरीज की मौत होने के बाद जांच में इसका भंडाफोड़ होता है और अस्पताल को नियम को दरकिनार कर सील कर दिया जाता है, जिसका फायदा अस्पताल संचालकों को मिल जाता है।
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निजी अस्पतालों में लगातार मरीजों की इलाज में लापरवाही से मौत की घटनाएं बढ़ने पर शासन सख्त हुआ और अप्रैल में सभी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन निरस्त करने का निर्देश दिया। उस समय जिले में सिर्फ 172 निजी अस्पताल थे, सभी अस्पताल संचालकों को पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करना था, उस आधार पर सीएमओ की ओर से बनाए गए नोडल अफसर अपने कर्मचारियों के साथ मौके का निरीक्षण कर मानक देखना था और जिस डॉक्टर के नाम पर रजिस्ट्रेशन होना था, उसकी जानकारी लेनी थी, ताकि वैध अस्पतालों अलग हो जाए। जिससे अवैध अस्पतालों को आसानी से चिन्हित कर कार्रवाई किया जा सके।
सीएमओ की उदासीनता से शासन के इस मंशा पर जिले में पानी फिर रहा है। नोडल अफसर हरेंद्र कुमार इसमें रूचि नहीं ले रहे हैं। इसके चलते तीन माह पूर्व रजिस्ट्रेशन व रीनिवल के लिए ऑनलाइन किए गए आवेदकों के अस्पताल का रजिस्ट्रेशन अभी तक नहीं हो सका है, समय अभाव बताकर टाल मटोल किया जा रहा है और इसी की आड़ में निजी अस्पतालों का भी संचालन कराया जा रहा है।
इस खेल में कई सफेदपोश भी शामिल हैं जो इसमे शामिल कर्मचारियों का कार्रवाई की तलवार लटकने पर बचाव भी करते हैं। इससे निजी अस्पतालों में अक्सर इलाज में लापरवाही से मौत का मामला सामने आ रहा है। उच्चाधिकारियों को भी नोडल अफसर की ओर से गुमराह कर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को पूरा करने में विलंब किया जा रहा है।
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देवरिया। शहर से लेकर गांवों तक फैले अवैध अस्पतालों के जाल को खत्म करने के लिए शासन की ओर से अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन निरस्त कर नए सिरे से मौके पर जाकर डॉक्टरों की डिग्रियों की जांच कर रजिस्ट्रेशन करना था, ताकि वैध और अवैध अस्पतालों की सूची स्पष्ट हो सके, मगर सीएमओ कार्यालय के नोडल अफसर के खेल से आवेदन करने वाले निजी अस्पतालों की न तो जांच की गई और न ही इनकी रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी की गई।
इसी के आड़ में अवैध अस्पताल भी संचालित हो रहे हैं। सीएमओ कार्यालय के आंकड़े पर गौर करें तो जिले में अप्रैल तक सिर्फ 127 निजी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन था, मगर 200 से अधिक आवेदन आए हैं, इन अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन जिन डॉक्टरों के नाम पर होगा, उन्हें 24 घंटे अस्पताल पर रहना होगा। अब तक सिर्फ सात निजी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन हो सका है। सीएमओ कार्यालय के जिम्मेदार काम का दबाव और समय अभाव बताकर कन्नी काट रहे हैं।
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निजी अस्पतालों में नामी गिरामी डॉक्टरों का बोर्ड लगाकर झोलाछाप इलाज कर रहे हैं। अस्पताल में इलाज के दौरान मरीज की मौत होने के बाद जांच में इसका भंडाफोड़ होता है और अस्पताल को नियम को दरकिनार कर सील कर दिया जाता है, जिसका फायदा अस्पताल संचालकों को मिल जाता है।
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निजी अस्पतालों में लगातार मरीजों की इलाज में लापरवाही से मौत की घटनाएं बढ़ने पर शासन सख्त हुआ और अप्रैल में सभी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन निरस्त करने का निर्देश दिया। उस समय जिले में सिर्फ 172 निजी अस्पताल थे, सभी अस्पताल संचालकों को पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करना था, उस आधार पर सीएमओ की ओर से बनाए गए नोडल अफसर अपने कर्मचारियों के साथ मौके का निरीक्षण कर मानक देखना था और जिस डॉक्टर के नाम पर रजिस्ट्रेशन होना था, उसकी जानकारी लेनी थी, ताकि वैध अस्पतालों अलग हो जाए। जिससे अवैध अस्पतालों को आसानी से चिन्हित कर कार्रवाई किया जा सके।
सीएमओ की उदासीनता से शासन के इस मंशा पर जिले में पानी फिर रहा है। नोडल अफसर हरेंद्र कुमार इसमें रूचि नहीं ले रहे हैं। इसके चलते तीन माह पूर्व रजिस्ट्रेशन व रीनिवल के लिए ऑनलाइन किए गए आवेदकों के अस्पताल का रजिस्ट्रेशन अभी तक नहीं हो सका है, समय अभाव बताकर टाल मटोल किया जा रहा है और इसी की आड़ में निजी अस्पतालों का भी संचालन कराया जा रहा है।
इस खेल में कई सफेदपोश भी शामिल हैं जो इसमे शामिल कर्मचारियों का कार्रवाई की तलवार लटकने पर बचाव भी करते हैं। इससे निजी अस्पतालों में अक्सर इलाज में लापरवाही से मौत का मामला सामने आ रहा है। उच्चाधिकारियों को भी नोडल अफसर की ओर से गुमराह कर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को पूरा करने में विलंब किया जा रहा है।